[प्रमोद भार्गव]। Bihar Flood And Weather Update: मौसम के अनुमानों को गलत साबित करते हुए पिछले सप्ताह मूसलाधार बारिश ने बिहार के विभिन्न क्षेत्रों समेत राजधानी पटना को अपनी चपेट में ले लिया। पटना के करीब 80 प्रतिशत आवासीय इलाकों में पानी भर गया। यहां की सड़कों पर नावें चल रही हैं। लोगों का सामान्य जनजीवन बुरी तरह से प्रभावित है। हालात किस कदर भयावह हो चुके थे इसे इस बात से ही समझा जा सकता है कि जिस मोहल्ले में राज्य के उप-मुख्यमंत्री का निवास है वहां इतना पानी जमा हो गया कि उप-मुख्यमंत्री सुशील मोदी को जलजमाव के तीन दिनों बाद किसी तरह से घर से बाहर निकाल कर सुरक्षित स्थान तक ले जाया गया।

बारिश ने पिछले 102 वर्षों का रिकॉर्ड तोड़ा 

दरअसल इस बार सितंबर में बारिश ने पिछले 102 वर्षों का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। इतना ही नहीं, पटना समेत राज्य के अधिकांश जिलों में अभी भी मानसून की वापसी के संकेत नहीं मिले हैं। देश भर में इस बार अब तक कुल 910 मिमी बारिश हो चुकी है, जबकि समान्य बारिश का औसत 860 मिमी है। इस बार मौसम विज्ञान विभाग सटीक भविष्यवाणी करने में पूरी तरह असफल रही है। शुरू में मौसम विभाग ने 98 प्रतिशत बारिश होने की संभावना जताई थी, जो बाद में 96 फीसद कर दी थी। एक अन्य निजी संगठन की भविष्यवाणी भी कुछ यही थी।

बारिश के अनुमान गलत क्यों साबित हुए, इसका तार्किक जवाब मौसम विभाग के पास नहीं है। उनका कहना है कि प्रशांत महासागर में अलनीनो के प्रकट हो जाने से शुरू में इसने मानसून को बरसने नहीं दिया। इसलिए जुलाई में कम बारिश हुई। इसी समय हिंद महासागर में मानसून के अनुकूल वातावरण तैयार हुआ। नतीजन बंगाल की खाड़ी में कम दबाव का क्षेत्र बना, जिससे अगस्त-सितंबर में कई राज्यों में भारी बारिश हुई। असंतुलित बारिश ने कई राज्यों में जहां बाढ़ के हालात उत्पन्न कर दिए, वहीं इन्हीं राज्यों के कई क्षेत्रों में सूखे के हालात हैं।

प्राकृतिक आपदा पर किसी का नियंत्रण नहीं

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का कहना है कि प्राकृतिक आपदा पर किसी का नियंत्रण नहीं है। परंतु हकीकत इससे जुदा है। इस आपदा को आमंत्रित हम और हमारी नीतियां अनियोजित शहरीकरण व पर्यावरण के विनाश की पीठ पर आधुनिक विकास करके बढ़ा रहे हैं। इसलिए बाढ़ की त्रासदी देश में नियमित हो गई है। जो जल जीवन के लिए जीवनदायी वरदान है, वही अभिशाप साबित हो रहा है। इन आपदाओं के बाद केंद्र और राज्य सरकारें आपदा प्रबंधन पर अरबों रुपये खर्च करती हैं। करोड़ों रुपये बतौर मुआवजा देती हैं, बावजूद आदमी है कि आपदा का संकट झेलते रहने को मजबूर बना हुआ है। जबकि जल निकासी और उसके संग्रह के उपाय ठीक से कर दिए जाएं तो नगर बाढ़ की त्रासदी से बच सकते हैं।

प्रकृति जलवायु परिवर्तन का संकेत

सूखे के देखते-देखते अतिवृष्टि हो जाना इस बात का प्रतीक है कि प्रकृति जलवायु परिवर्तन का संकेत दे रही है। यह इस बात की भी चेतावनी है कि हमारे नीति-नियंता, देश और समाज के जागरूक प्रतिनिधि के रूप में दूरदृष्टि से काम नहीं ले रहे हैं। पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के मसलों के परिप्रेक्ष्य में वे चिंतित नहीं हैं। ध्यान रहे कि वर्ष 2031 तक भारत की शहरी आबादी 20 करोड़ से बढ़कर 60 करोड़ हो जाएगी, जो देश की कुल आबादी की 40 प्रतिशत होगी।

ऐसे में शहरों की क्या नारकीय स्थिति बनेगी, इसकी कल्पना मुश्किल है? वैसे, धरती के गर्म और ठंडे होते रहने का क्रम उसकी प्रकृति का हिस्सा है। इसका प्रभाव पूरे जैवमंडल पर पड़ता है जिससे जैविक विविधता का अस्तित्व बना रहता है। लेकिन कुछ वर्षों से पृथ्वी के तापमान में वृद्धि की रफ्तार बहुत तेज हुई है। इससे वायुमंडल का संतुलन बिगड़ रहा है। यह स्थिति प्रकृति में अतिरिक्त मानवीय दखल से पैदा हो रही है। इसलिए इस पर नियंत्रण संभव है।

कीटनाशक दवाओं से निष्प्रभावी

संयुक्त राष्ट्र की जलवायु परिवर्तन समिति के वैज्ञानिकों ने तो यहां तक कहा था कि तापमान में वृद्धि न केवल मौसम का मिजाज बदल रही है, बल्कि कीटनाशक दवाओं से निष्प्रभावी रहने वाले विषाणुओं-जीवाणुओं, गंभीर बीमारियों, सामाजिक संघर्षों और व्यक्तियों में मानसिक तनाव बढ़ाने का काम भी कर रही है। साफ है, जो लोग बाढ़ और सूखे का संकट झेलने को अभिशप्त होते हैं, वे लंबे समय तक तनाव की भीषण त्रासदी भोगने को अभिशप्त हो जाते हैं।

पर्यावरण के असंतुलन के कारण गर्मी, बारिश और ठंड का संतुलन भी बिगड़ता है। इसका सीधा असर मानव स्वास्थ्य और खेती की पैदावार और फसल की पौष्टिकता पर पड़ता है। यदि मौसम में आ रहे बदलाव से पांच साल के भीतर घटी प्राकृतिक आपदाओं और संक्रामक रोगों की पड़ताल की जाए तो वे हैरानी में डालने वाले हैं। तापमान में उतार-चढ़ाव से ‘हिट स्ट्रेस हाइपरथर्मिया’ जैसी समस्याएं दिल व सांस संबंधी रोगों से मृत्युदर में इजाफा हो सकता है।

दुनिया में करीब 30 करोड़ लोग दमा के शिकार 

पश्चिमी यूरोप में वर्ष 2003 में दर्ज रिकॉर्ड उच्च तापमान से 70 हजार से अधिक मौतों का संबंध था। बढ़ते तापमान के कारण प्रदूषण में वृद्धि दमा का कारण है। दुनिया में करीब 30 करोड़ लोग इसी वजह से दमा के शिकार हैं। पूरे भारत में पांच करोड़ लोग दमा के मरीज हैं। बाढ़ के दूषित जल से डायरिया व आंख के संक्रमण का खतरा बढ़ता है। भारत में डायरिया से हर साल करीब 18 लाख लोगों की मौत हो रही है। बाढ़ के समय रुके दूषित जल से डेंगू और मलेरिया के मच्छर पनपकर कहर ढाते हैं। बाढ़ थमने के बाद, बाढ़ प्रभावित शहरों को बहुआयामी संकटों का सामना करना होगा।

बहरहाल जलवायु में आ रहे बदलाव के चलते यह तो तय है कि प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति बढ़ रही है। इस लिहाज से जरूरी है कि शहरों के पानी का ऐसा प्रबंध किया जाए कि उसका जलभराव नदियों और बांधों में हो, जिससे आफत की बरसात के पानी का उपयोग जल की कमी से जूझ रहे क्षेत्रों में किया जा सके। साथ ही शहरों की बढ़ती आबादी को नियंत्रित करने के लिए कृषि आधारित देशज ग्रामीण विकास पर ध्यान दिया जाए, क्योंकि ये आपदाएं स्पष्ट संकेत दे रही हैं कि अनियंत्रित शहरीकरण और कामचलाऊ तौर-तरीकों से समस्याएं घटने की बजाय बढ़ेंगी ही।

[वरिष्ठ पत्रकार]

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Posted By: Sanjay Pokhriyal

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