देश की जनभावना यही है कि राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार कानून के तहत आना चाहिए। जिन राजनीतिक दलों को वे बहुमूल्य वोट देकर अपना जनप्रतिनिधि चुनते हैं, उनकी आमदनी और खर्च का ब्यौरा जानने का उन्हें अधिकार मिलना ही चाहिए। अगर हमारे राजनीतिक वर्ग इस जनभावना के खिलाफ जाकर खुद को आरटीआइ के दायरे से बाहर निकालने के लिए इस प्रभावी कानून को कमजोर कर रहा है तो यह एकदम अनुचित और अलोकतांत्रिक है। उन्हें मनमाने रूप से अपने संविधान प्रदत्ता अधिकार का बेजा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

किसी कानून को बनने में अंतिम मुहर राष्ट्रपति की लगती है। भले ही महामहिम इस बिल के खिलाफ जनभावना से वाकिफ हों, लेकिन वे संवैधानिक कायदों से बंधे हुए हैं। यह जरूरी नहीं है कि वह इस पर अपनी सहमति दें। वे उसे वापस भी कर सकते हैं लेकिन वापस करने की स्थिति में फिर वही बिल उनके पास भेजा जा सकता है। इस तरह के कई मसले हमारी संसदीय प्रणाली के सामने आ चुके हैं। नौंवी लोकसभा की बात है। सदस्यों के वेतन, भत्तो से संबंधित एक बिल दोनों सदनों में सर्वसम्मति से पारित किया गया। इसमें प्रावधान था कि एक साल की सेवा के बाद भी ताउम्र पेंशन दी जाएगी। राष्ट्रपति आर वेंकटरमण ने इस पर अपनी सहमति नहीं दी। इसी तरह पोस्टल बिल को भी राष्ट्रपति की सहमति नहीं मिली।

भले ही हमारे राजनेता जनता के हित से जुड़े मुद्दों पर आपस में मारामारी करें, एक दूसरे पर छींटाकशी करें, लेकिन जब इनके हित से जुड़ी बात आती है तो सब एक हो जाते हैं। हम अपने जनप्रतिनिधियों से यह अपेक्षा जरूर करते हैं कि वहां पहुंचकर ये अपने आचार, विचार और व्यवहार से आदर्श स्थापित करें जिसका आम लोग अनुकरण करें। लेकिन ऐसी अपेक्षा करते समय हम अक्सर यह भुला देते हैं कि राजनेता भी हमारे समाज से ही आए हैं। जैसा समाज होगा वैसे ही नेता होंगे। इसके लिए पहले समाज को ठीक होना होगा। तब स्वहित और परहित का भेद मिट पाएगा।

[संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप से अरविंद चतुर्वेदी की बातचीत पर आधारित]

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