मुप्पवरपु वेंकैया नायडू। आज भारत विभिन्न कृषि और कृषि संबंधी उत्पादों का अग्रणी उत्पादक है। इनमें से कुछ उत्पादों का तो निर्यातक भी है। यह तमाम अनिश्चितताओं के बीच किसानों के अथक श्रम का फल है। हमारे किसान, भगवान कृष्ण के निष्काम कर्म के उस आदर्श को वास्तव में चरितार्थ करते हैं जो उन्होंने कुरुक्षेत्र की रणभूमि में दिया था-फल की इच्छा से मुक्त कर्म करो। वे दिन-रात, जाड़ा-गर्मी, बारिश-सूखे, पर्याप्त आमदनी होगी या नहीं-इन सबकी चिंता से निस्पृह रह कर अथक श्रम करते हैं, लेकिन उन्हें अपने ही श्रम का मूल्य तय करने का अधिकार नहीं है। किसान का बेटा होने के कारण मैं किसानों की अनेक चुनौतीपूर्ण कठिनाइयों का स्वयं साक्षी रहा हूं।

यदि हमारी अर्थव्यवस्था के किसी एक वर्ग को अपना व्यवसाय करने के संवैधानिक अधिकार से वंचित रखा गया तो वे किसान हैं। हमारे संविधान में मूल अधिकारों पर विवेकपूर्ण सीमाएं और बंधन लगाने का प्रावधान है, लेकिन हमारे किसानों पर तो अन्यायपूर्ण प्रतिबंध लगाए गए। उन्हें अपने पड़ोस में भी अपने कृषि उत्पाद को बेचने का हक नहीं। खेती से उनकी आमदनी बाजार, बिचौलियों और साहूकारों की कृपा पर निर्भर है। किसान द्वारा कमाए हर एक रुपये पर पूरी आपूíत श्रृंखला के अन्य खिलाड़ियों द्वारा उससे कई गुना लाभ कमाया जाता है। कृषि उत्पाद की इस शोषणकारी बिक्री और खरीद की व्यवस्था में उत्पादक किसानों और उपभोक्ताओं, दोनों का दोहन होता है।

किसानों पर शोषणकारी बंधनों की जड़ें 1943 के अकाल, द्वितीय विश्व युद्ध, 1960 के दशक में पड़े सूखे और अनाज के संकट में हैं। आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 और राज्यों के कृषि उत्पाद मंडी समिति अधिनियम कृषि उत्पाद बेचने के किसानों के विकल्पों को सीमित करते रहे। किसान बाजार में खरीददार की कृपा पर निर्भर होकर रह गया। प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक डॉ. एमएस स्वामीनाथन का मत रहा है कि किसान को अपने उत्पाद को अपनी इच्छा अनुसार बेचने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।

कोल्ड स्टोरेज, भंडारण और खराब हो सकने वाली वस्तुओं के लिए परिवहन जैसी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में देश को कृषि उत्पादों के लिए एक दक्ष और सुदृढ़ आपूर्ति श्रृंखला विकसित करने में अभी समय लगेगा। किसान हमारे देश की खाद्य सुरक्षा की नींव हैं और उन्होंने यह सुरक्षा अपनी कड़ी मेहनत से सुनिश्चित की है। आज हम कृषि उत्पादन में अग्रणी हैं, लेकिन इसके बदले में किसानों को उनका हक नहीं मिला। इसके बावजूद किसानों ने कभी भी हड़ताल का सहारा नहीं लिया। देश की विषमताओं को देखते हुए उपभोक्ताओं का संरक्षण आवश्यक है, लेकिन क्या यह किसान की कीमत पर होना चाहिए?

भारत में कृषि नीतियों पर आइसीआरआइआर और ओईसीडी द्वारा किए गए अध्ययन के सह लेखक और प्रख्यात कृषि अर्थशास्त्री डॉ. अशोक गुलाटी ने चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। अध्ययन के अनुसार कृषि बाजार पर बंधनों के कारण किसानों पर छिपा हुआ कर लगता रहा है। 2000-01 से 2016-17 की अवधि में किसानों ने 45 लाख करोड़ कीमत का यह छिपा हुआ अंतíनहित कर चुकाया। यानी 2.56 लाख करोड़ प्रतिवर्ष। किसानों के लिए अपना उत्पाद बेचने के बंधनों को दूर करने की दिशा में किसी ठोस कदम की घोषणा पहली बार इस कोरोना काल में की गई।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने के लिए घोषित 20 लाख करोड़ रुपये के पैकेज के तहत कृषि और कृषि संबंधी क्षेत्रों के लिए राहत की घोषणा वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण की ओर से की गई। कृषि और कृषि संबंधी क्षेत्रों में ढांचागत सुधार और ऋण के लिए 4 लाख करोड़ रुपये की सहायता राशि के अलावा सबसे महत्वपूर्ण सराहनीय बिंदु है आवश्यक वस्तु अधिनियम और एपीएमसी नियमों में बदलाव किए जाने का संकल्प। इससे किसानों को उनके उत्पाद का लाभकारी मूल्य प्राप्त करने का रास्ता साफ हो जाएगा और उन्हें बिक्री और बाजार के वे विकल्प उपलब्ध होंगे जिनसे वे वंचित रहे।

यह किसानों के लिए दूसरी आजादी होगी, जो कड़ी मेहनत कर देश का पेट भरते हैं। लंबे समय प्रतीक्षित इस परिवर्तन को नितांत सावधानी और जिम्मेदारी के साथ लागू किया जाना चाहिए। नए प्रावधानों की आड़ में फिर से किसानों का शोषण हो, ऐसा कोई अवसर नहीं आना चाहिए।

ये संशोधन जल्द अमल में लाए जाने चाहिए। अधिक से अधिक खरीददारों को सीधे किसान से उसके कृषि उत्पाद खरीदने का अधिकार होना चाहिए, लेकिन सशक्त कृषि उत्पाद संगठनों के व्यापक तंत्र का विस्तार किया जाना भी जरूरी है, ताकि किसानों की मोलभाव करने की सामूहिक शक्ति बढ़े, वे मोलभाव करने में सक्षम हों और एक अकेले किसान के शोषण की संभावना को समाप्त किया जा सके। किसानों की आमदनी बढ़ाने, कृषि में निजी निवेश बढ़ाने और ठेके पर खेती के लिए एक प्रभावी कानून बनाया जाना जरूरी है।

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चरल एक्सटेंशन मैनेजमेंट के अध्ययन से ज्ञात होता है कि किसानों द्वारा की गई 3500 आत्महत्या की घटनाओं में से किसी भी किसान के पास डेयरी या मुर्गी पालन जैसा आमदनी का कोई अतिरिक्त स्नेत नहीं था। किसानों की आमदनी के स्नेतों को बढ़ाने की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए ही पैकेज में पशुपालन और मत्स्य पालन को प्रोत्साहित करने के लिए बड़ी सहायता दी गई है।

मुझे 1977 याद आता है जब राष्ट्र को खाद्यान्न की दृष्टि से एक ही क्षेत्र घोषित कर दिया गया था। इससे किसानों और उपभोक्ताओं, दोनों को लाभ हुआ। समय आ गया है कि हम अपने किसानों को विकल्प दें और यह निर्णय करने की छूट दें कि वे अपना लाभ देखते हुए देश में कहीं भी अपना उत्पाद बेच सकें। कृषि विपणन कानूनों के संशोधन में और उसके बाद उन्हें प्रभावी रूप से लागू करने में सभी हितधारकों को साथ लिया जाना आवश्यक है, तभी उनके उद्देश्यों को उनकी मूल भावना सहित प्राप्त किया जा सकेगा।

कोरोना काल में बहुत से लोग घर से ही काम कर रहे हैं, लेकिन किसान के पास ऐसा कोई विकल्प नहीं। उसे तो खेतों में ही काम करना है। लॉकडाउन के बावजूद गेंहू, धान, दलहन आदि की बुआई, रोपाई पिछले वर्ष की तुलना में अधिक हुई है।

(लेखक भारत के उपराष्ट्रपति हैं)

Posted By: Shashank Pandey

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