[ प्रो. कपिल कपूर ]: विश्वव्यापी कोरोना संकट में भारतीय लोगों की सहज प्रतिरोधक क्षमता को लेकर भी चर्चा हो रही है। कुछ जानकार भारतीयों की प्रतिरोधक क्षमता का श्रेय भारत में शाकाहार तथा प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवनशैली को देते हैं। वस्तुत: योग, आयुर्वेद ही नहीं, व्याकरण, नाट्य-शास्त्र से लेकर खगोल-शास्त्र तक संपूर्ण भारतीय ज्ञान-परंपरा में सामंजस्य और एकत्व भावना है। जहां पश्चिम में ज्ञान को सत्ता का माध्यम समझा गया, नॉलेज इज पावर कहा गया वहीं भारतीय परंपरा में ज्ञान मात्र सूचनाओं का भंडार नहीं। न यह मनुष्य की सुख-सुविधा को प्रोत्साहित करने के लिए जरूरी माध्यम है। यह प्रकृति और दूसरे मनुष्यों पर विजय पाने के लिए जरूरी चीज भी नहीं है।

भारत में धर्म-बोध के माध्यम से दिया जाने वाला ज्ञान पश्चिमी ज्ञान-परंपरा से भिन्न है

यहां ज्ञान शाश्वत सत्य का ज्ञान है। जो कभी नष्ट न होने वाला है। जो नित्य सुख सुविधाओं से परे मनुष्य के आंतरिक उल्लास को जगाता है। जो मनुष्य को क्षुद्र अहं की सीमाओं से पार कराता है। भारत में धर्म-बोध के माध्यम से दिया जाने वाला ज्ञान पश्चिमी ज्ञान-परंपरा से भिन्न है। भारतीय ज्ञान के अनुसार सारी सृष्टि एकात्म है। उसमें एक अभेद अवस्था है, जिसमें अपने-पराए की भावना नहीं है। इसका लक्ष्य सबके कल्याण के लिए शारीरिक-मानसिक क्षमताओं का विकास है।

पश्चिमी ज्ञान-परंपरा में ज्ञान मुख्यत: उपयोगितावादी रहा

पश्चिमी ज्ञान-परंपरा में ज्ञान मुख्यत: उपयोगितावादी रहा है। उसके विचारों में प्रमुख है: मनुष्य केंद्रित विश्व। मनुष्य के हितों का वर्चस्व। उसमें सुख-सुविधा पूर्ण जीवन हासिल करने का उद्देश्य रहा है। इसी अनुरूप मानवीय गतिविधियां भी होती रही हैं। उसी हिसाब से साइंस और सोशल साइंस के लक्ष्य निर्धारित होते हैं। इस प्रकार पश्चिमी ज्ञान प्रकृति और समाज पर नियंत्रण और हितों के संघर्ष में लगा रहा। अगले कदम में यही पश्चिमी समाज के हितों के वर्चस्व का विचार भी बन जाता है। फलत: पश्चिमी विचारों में मनुष्य के हितों का किसी न किसी से विरोध भी दिखता रहा है। उसके सामने ऐसा कोई न कोई विरोध उपस्थित रहता है, जिसे मनुष्य के हित में या तो हराना है या नियंत्रित करना है।

पश्चिमी ज्ञान-परंपरा में एक समय में एक ही सत्य का वर्चस्व मिलता है

पश्चिमी ज्ञान-परंपरा में एक समय में एक ही सत्य का वर्चस्व मिलता है। यह सत्य अनुभव से अधिक किसी न किसी सत्ता के अधिकार से थोपे हुए होते हैं। लोकतांत्रिक युग में इसे जबरन नहीं थोपा जाता, किंतु नियमित प्रचार और समाज पर वर्चस्व रखने वाले लोगों, संस्थाओं के माध्यम से इसे स्वीकार कराया जाता है। वहां धर्म, विज्ञान, नीतिशास्त्र, सौंदर्यशास्त्र आदि के बदलते प्रतिमान इसके उदाहरण हैं। इसके विपरीत भारतीय विचार प्रणाली में ज्ञान का उद्देश्य किसी सत्ता का प्रदर्शन न होकर मनुष्य की मुक्ति का प्रयत्न यानी मोक्ष रहा है। अपने विचारों की जीत स्थापित करने के साधन के बदले भारतीय संरचना में ज्ञान मनुष्य मात्र की मुक्ति का माध्यम माना गया है। भारतीय ज्ञान विशेषत: सांख्य-दर्शन मोक्ष को दुख से मुक्ति बताता है, किंतु यह सामाजिक कल्याण की कीमत पर किसी मनुष्य का मोक्ष नहीं है।

भारत में ज्ञान-चर्चा की पद्धति सभी प्रणालियों में एक जैसी मिलती है

भारत में ज्ञान-चर्चा की पद्धति सभी प्रणालियों में एक जैसी मिलती है। यह किसी विशिष्ट वर्ग की गतिविधि नहीं है जिसे लोगों की परवाह नहीं। न ही यह मनुष्य की आवश्यकताओं, दुखों, कष्टों को अनदेखा करती है। मानव जीवन के मुख्य कार्यों में अर्थ तथा काम की सांसारिक आवश्यकताएं स्वीकार की गई हैं। भारतीय ज्ञान में अर्थ को धर्म से और काम को मोक्ष से मर्यादित करके देखा गया। इस तरह चार तरह के पुरुषार्थ पाए गए? धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। यदि धर्म और मोक्ष हटा दिए जाएं तो मानव जीवन इच्छाओं एवं कामनाओं का खेल भर रह जाता है। इसका अंत विफलता या निराशा ही होता है।

मोक्ष का माध्यम सामूहिक कल्याण का ज्ञान

भारतीय ज्ञान-परंपरा मनुष्य और समाज के बीच एक सातत्य स्थापित करती है। मनुष्य की सच्ची मुक्ति या स्वतंत्रता के लिए मोक्ष ही एकमात्र लक्ष्य है, परंतु मोक्ष का माध्यम ज्ञान है, पर किस प्रकार का ज्ञान? वह ज्ञान जो धर्म को प्रोत्साहित करे। मनुष्य को वह ज्ञान चाहिए, जो गीता के अनुसार लोक-संग्रह अर्थात सामूहिक कल्याण का ज्ञान है। धर्म ही मनुष्य और समाज को आपस में सद्भाव से जोड़कर रखता है।

संपूर्ण भारत में अद्वैत वेदांत की शिक्षा 

हाल के युग में एक भ्रामक मान्यता प्रचलित की गई है कि भारत में ज्ञान पर कुछ ही लोगों का एकाधिकार था। वस्तुत: ऐसा कभी नहीं था, न आज है। भारत में शास्त्रीय ज्ञान-परंपरा के साथ, लौकिक ज्ञान-परंपरा भी थी। यह शास्त्रीय ज्ञान की ही सरल व्याख्या की समानांतर परंपरा रही है। जो कथा-प्रवचन, नाट्य, लोकोक्ति आदि माध्यमों से घर-घर पहुंचती रही है। महान विद्वान आदि शंकराचार्य गहन बौद्धिक ग्रंथों के रचयिता होने के साथ साथ प्रवचनकर्ता और लोकप्रिय संत भी थे। उन्होंने संपूर्ण भारत में उत्तर से लेकर दक्षिण तथा पूर्व से पश्चिम तक पैदल यात्रा की तथा सर्वत्र घूमकर लोगों को अद्वैत वेदांत की शिक्षा दी। इसी प्रकार श्रीरामानुजाचार्य के शिष्य भी संपूर्ण भारत में फैले। भारत में महान एवं प्रबुद्ध चिंतन ऐसे ही लोकप्रिय आदान-प्रदान से समृद्ध हुआ है।

भारतीय ज्ञान-परंपरा में कोई भी लौकिक या अलौकिक विषय अछूता नहीं

भारतीय ज्ञान-परंपरा में कोई भी लौकिक या अलौकिक विषय अछूता नहीं है। यह वेदों से ही स्पष्ट देखा जा सकता है। सामान्य दैनिक जीवन की गतिविधियां भोजन से लेकर आभूषण, रसायन से लेकर अस्त्र-शस्त्र और पारिवारिक संबंध एवं राजकीय दायित्वों तक, सब कुछ ज्ञान-चिंतन के घेरे में रहा है। सभी विषयों में किसी मत, फेथ के बजाय तथ्य, विवेक और अनुभव को महत्व दिया गया है। किसी भी ज्ञानी की बात पर अन्य ज्ञानी या सामान्य जन प्रश्न उठा सकते हैं।

हजारों वर्ष पहले से भारत में प्रश्नोत्तर की विचार-परंपरा मिलती है

हजारों वर्ष पहले से भारत में प्रश्नोत्तर की विचार-परंपरा मिलती है। उपनिषद इसके सर्वोत्तम प्रमाण हैं। जिस सत्य का निरूपण उपनिषदों में है उसी की लौकिक प्रस्तुति गुरुनानक, कबीर या तुलसीदास के वचनों में भी है। कथा, रूपक, व्याख्या, सत्यापन, चित्रण, गायन आदि माध्यमों से ज्ञान-परंपरा के विकास में उनका समान योगदान रहा है। गुरुद्वारों के शब्द-कीर्तन में इसका बड़ा सुंदर उदाहरण मिलता है।

भारत में ज्ञान की शब्दावली भारत के सामान्य जन की भाषा में रही

भारत में ज्ञान की शब्दावली भारत के सामान्य जन की भाषा में रही है। भारत में विचारों का सच्चा लोकतंत्र रहा है। इसी ने ज्ञान को भारत का विशिष्ट सभ्यतात्मक मूल्य बनाया है।

दुर्भाग्य से स्वतंत्र भारत में भारतीय शिक्षा ज्ञान से दूर होती गई

दुर्भाग्य से स्वतंत्र भारत में ही भारतीय शिक्षा ज्ञान से दूर होती गई है। हमें पुन: अपनी ज्ञान-परंपरा से जुड़ना चाहिए। यह आज संपूर्ण विश्व की आवश्यकता है।

( लेखक जवाहरलाल नेहरू विवि के प्रो वाइस चांसलर रहे हैं )

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