मुकुल श्रीवास्तव। लॉकडाउन में बहुत से लोगों के लिए टिकटॉक वीडियो समय बिताने का अच्छा जरिया बने। इसी दौरान यू-ट्यूब और टिकटॉक यूजर्स के बीच हुए विवाद से साइबर मीडिया में काफी सुर्खियां बनीं और पूरा सोशल मीडिया तकरीबन दो हिस्सों में बंटा हुआ भी दिखा। इसी विवाद ने अब तक सुर्खियों से दूर से चल रहे टिकटॉक वीडियो एप को चर्चा के केंद्र में ला दिया।

कहा जाता है कि अगर भारत को समझना है तो उसके गांवों को समङिाए, उसी तरह से भारत क्या कर रहा है और भारत के लोगों में कितना हुनर है, ये आपको फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया एप नहीं बताएंगे, इसके लिए आपको टिकटॉक पर आना होगा। असल में टिकटॉक की सफलता में छोटे शहरों, कस्बों व गांवों का बड़ा योगदान है, जहां कुछ भी बनावटी नहीं है। ऐसी जगहों के लोगों के पास ऐसा कोई प्लेटफॉर्म नहीं था जहां लोगों को वो जैसे हैं, वैसे ही उनकी नादानियों, उनकी समस्याओं के साथ स्वीकार किया जाए।

कैसे टिकटॉक बन गया एक बड़ी चुनौती : दरअसल इसकी सफलता का राज दुनिया के दूसरे सबसे बड़े और सबसे तेजी से बढ़ते इंटरनेट यूजरबेस को होस्ट करने वाले देश में सही समय पर आना है। भारत में हर कोई कैमरे के सामने सेलेब्रिटी बनना चाहता है, जहां फिल्में और उनके संवाद और गीत हमारे जीवन में इस हद तक घुसे हुए हैं कि उसके बगैर जीवन की कल्पना करना मुश्किल है, वहां टिकटॉक जैसे माध्यमों की सफलता आश्चर्यजनक नहीं है। वर्ष 2016 में रिलायंस जियो के लांच होने के बाद सस्ते डाटा की मेहरबानी ने टिकटॉक को भारत में पांव पसारने का बेहतरीन मौका दिया। स्मार्टफोन इंटरनेट कनेक्शन के साथ कोई भी अपना नाचता गाता वीडियो बना सकता है। दिल्ली स्थित एक मार्केट इंटेलिजेंस फर्म के आंकड़ों के अनुसार पिछले अगस्त तक इस एप को एक-तिहाई भारतीय स्मार्टफोन पर डाउनलोड किया जा चुका था।

दरअसल अन्य देश के लोगों की तुलना में भारतीय लोग एप पर अधिक समय बिताते हैं। एक भारतीय औसत रूप में सबसे ज्यादा 34 मिनट टिकटॉक पर बिता रहा है, जबकि इंस्टाग्राम पर 23 मिनट जो लोकप्रियता में तीसरे नंबर पर है। टिकटॉक से कमाई का अभी तक कोई सीधा फामरूला सार्वजनिक नहीं है, पर बहुत से लोग इससे ठीक-ठाक पैसे कमा रहे हैं। स्टेटिस्टा के आंकड़ों के मुताबिक भारत में फेसबुक के तीस करोड़ उपभोक्ता हैं, वहीं टिकटॉक के बीस करोड़ं। युवाओं और किशोरों में टिकटॉक की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि अगली सोशल मीडिया कंपनी अमेरिका से न होकर चीन से हो सकती है। बढ़ती फेक न्यूज की आमद और चारित्रिक हनन की कोशिशों के बीच ट्विटर और फेसबुक पर अनुभव अब उतना अच्छा नहीं रहा। ऐसे में वे उपभोक्ता जो समाचार और राजनीति से इतर कारणों से सोशल मीडिया पर थे, उन्हें एक विकल्प की तलाश हुई जो टिकटॉक पर जाकर पूरी हुई।

भारत में लोकप्रियता का कारण : अनुमान है कि निकट भविष्य में भारत में बीस से चालीस करोड़ तक लोग इंटरनेट से जुड़ेंगे। उसमें वे अपने जीवन के महत्वपूर्ण पलों को अपने दोस्तों और परिवार के साथ बांटने के लिए जिस एप का चुनाव करेंगे वो टिकटॉक होगा। आमतौर पर फेसबुक, स्नैपचैट और ट्विटर का इंटरफेस पश्चिम के उपभोक्ताओं की रुचियों को ध्यान में रखकर बनाया गया था, जबकि टिकटॉक एक अलग अनुभव देता है। मानवीय मनोविज्ञान के आधार पर इसने उन लोगों को सेलेब्रिटी स्टेटस दे दिया जो अपने जीवन के संघषों में ऐसे उलङो हैं कि वे कैमरे पर नाचते गाते मुस्कुराते कभी आ ही नहीं सकते थे, पर इस एप ने उन्हें कुछ सेकेंड के लिए ही सही, सेलेब्रिटी बनने का मौका दे दिया।

देश में अधिकांश इंटरनेट उपयोगकर्ता अंग्रेजी नहीं बोलते और अंग्रेजी में बोलने वाले लोग काफी पहले ही इंटरनेट से जुड़ चुके हैं। अब जितने भी नए उपभोक्ता इंटरनेट से जुड़ रहे हैं, ज्यादातर अंग्रेजी भाषी नहीं। बाजार के लिहाज से अब मुनाफा छोटे शहरों और गांव-कस्बों में है। यह एप 10 भारतीय भाषाओं में उपलब्ध है, जो भारत की भाषाई विविधता को देखते हुए उपभोक्ताओं को अपनी भाषा में वीडियो बनाने का एक अच्छा विकल्प देता है। हैश टैग का इस्तेमाल उपभोक्ताओं को कंटेंट पहचानने में मदद करता है कि चुटकुले या किस अन्य फॉर्मेट में बनाए गए वीडियो लोग देखना पसंद कर रहे हैं, लेकिन इससे ये समस्याएं भी पैदा हुई हैं कि टिकटॉक पर बिना किसी रोक-टोक के वीडियो डाले जा रहे हैं जो इसके दामन को दागदार बनाते हैं।

टिकटॉक वीडियो बनाते हुए होने वाली दुर्घटनाएं आम हैं जिनमें कई लोगों की जान भी जा चुकी है। इसी कारण पिछले साल अप्रैल में गूगल प्ले स्टोर से इस एप को हटा लिया गया था, क्योंकि अदालत ने फैसला दिया था कि यह अश्लीलता को बढ़ावा दे रहा है। अदालत ने दो सप्ताह बाद इस प्रतिबंध को हटा लिया जब एप के प्रभावों की जांच करने के लिए नियुक्त किए गए वकील ने कहा कि प्रतिबंध समाधान नहीं और वैध उपयोगकर्ताओं के अधिकारों को संरक्षित करने की दरकार है। हालांकि भारत जैसे देश में जहां अभी लोगों को इंटरनेट मैनर्स सीखने हैं, वहां दीर्घकाल में इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि ये कदम कितने प्रभावी साबित होते हैं। तब तक इन एप के बीच वर्चस्व की जंग जारी रहेगी।

[प्रोफेसर, लखनऊ विश्वविद्यालय]

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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