[ गोपालकृष्ण गांधी ]: बहुत से गम हो चले हैं जमाने में, बहुत से डर हमें घेरे हुए हैं। पहले चोरी-डकैती, मुस्टंडों के हाथ चोट, खून भी...। आज ये पुराने डरावने डर, ये पुराने जुर्म सब मौजूद हैं, लेकिन कई नए तरह के डर भी आ गए हैं। साइबर क्राइम का नाम हमारे पुरखों ने कभी नहीं सुना था। आज वह एक बड़ा खतरा है। जूनोटिक मर्ज करके भी कोई चीज होती है, हमारे बाप-दादा कौन जानते थे? आज वह हकीकत है। एपिडेमिक को जानते थे वे, आज पेंडेमिक को हम झेल रहे हैं। कोढ़ पर नियंत्रण है, चेचक कहते हैं कि अब करीब-करीब पुरानी कहानी है। तराइयों से पैदा होकर फासिद (विकार पैदा करने वाली)हवा मच्छरों को लाती थी, मलेरिया से जानें जंग करती थीं। कभी जीत लेतीं, कभी मात खातीं, लेकिन मच्छर, वही या वैसे ही मच्छर डेंगू नाम का एक बदमाश मर्ज लाएंगे, फिर चिकनगुनिया...यह कौन जानता था? और इतना ही नहीं, अब ऐसे कीटाणु, ऐसे वायरस मर्ज का ऐसा जहरी माद्दा फैला रहे हैं कि उसका न कोई नाम है और न ही इलाज।

अस्पतालों में, कहते हैं ऐसे सुपर बग उत्पन्न हो गए हैं कि वे किसी भी एंटीबायोटिक से खत्म नहीं किए जा सकते। अगर यह विश्वव्यापी स्थिति है तो हमारे देश की, हमारी अपनी, हालत कोई बेहतर नहीं। एक से एक बुरी खबर मिलती रहती है-खौफनाक, डरावनी। समाचार पत्र मायूस कर छोड़ते हैं, इंतहा दुखी। और फिर इंसानी डर। कहीं किसी बेचारी, बेसहारा बुढ़िया का खून तो कहीं किसी महिला का अपमान, दुष्कर्म, कहीं कोई बच्चा गायब। विश्वसनीय सूत्रों के मुताबिक भारत में, हमारे प्यारे, रोशन, महान भारत में रोज तकरीबन 180 बच्चे गुम हो जाते हैं। बच्चे और बच्चियां। ट्रैफिकिंग से बुरा जुर्म सोचा नहीं जा सकता।

ऐसी परिस्थिति में, उदासी को, गम को, मायूसी को दूर करने वाली कोई खबर मिल जाए तो खुदा का अहसान है, ईश्वर की कृपा। उस खबर को पैदा करने वाला, उसको फैलाने वाला धर्मात्मा है। और मिली ऐसी ही खबर, ऐसा ही आशीर्वाद-समान समाचार।

कैसा समाचार? कहां से?

खेल जगत से।

उद्धार किया हम पर, एशियन गेम्स में हमारे खिलाड़ियों ने। सिर्फ हमारे खेल-प्रांगण, क्रीड़ांगन के लिए नहीं, हमारे जमाने के लिए, हमारे दिल-ओ-दिमाग के लिए, हमारे मिजाज के लिए, अंग्रेजी में कहना हो तो हमारी सैनिटी के लिए।

जिन्सन जॉन्सन, तेरा भला हो भाई।

ईश्वर तुझे सुखी, सेहतमंद, संपन्न रखे। और तुझे गतिवान बनाए रखे।

कैसा भागा वह बच्चा हमारा!

अगर इन पंक्तियों के किसी पाठक ने अपने टेलीविजन पर या ऑनलाइन इस खेल-पुत्र को एशियाई खेल की 1500 मीटर की दौड़ में भागता न देखा हो तो इस स्तंभ को पढ़ना इस क्षण छोड़ें और सीधे लैपटॉप या कंप्यूटर पर जाएं, गूगल करें, जिन्सन जॉन्सन, रेस वीडियो और फिर उस जिंदादिल नजारे को देखें।

नीली पोशाक में खड़ा है वह लाइन में, एशिया के और नौजवानों के साथ। पोशाक पर लिखा है-आइएनडी यानी इंडिया। हमारे राष्ट्र का नाम। उसके चेहरे पर न कोई घबराहट है और न फिक्र। एकदम निश्चल है वह युवक। और एकाग्र। दौड़ शुरू होती है। सारे दौड़ने वाले चलायमान हो जाते हैं, एक साथ बढ़ते हैं। टांगें पहिए बन जाती हैं। सब अग्रसर सर्र...सर्र...सर्र, हवा की तरह। जिन्सन दूसरे नंबर पर है।

भाग जिन्सन भाग!

लगता है कि मिल्खा सिंह का हाथ है उसके कंधे पर। जिन्सन दूसरे नंबर पर टिका हुआ है।

पीछे नहीं पड़ना है तुझे, जिन्सन। गति बनाए रखना है। शायद तेरे आगे जो है, पहले नंबर पर, वह शायद धीमा पड़ जाए और तू...। पीछे नहीं रहना है तुझे, अच्छा? जिन्सन, क्यों धीमे पड़ रहा है? अर्रर्र...तीसरे नंबर पर आ गया तू! वह तेरे पीछे वाला...। वह तेरे बराबर हो गया है। बिल्कुल बराबर! और...। अब तू चौथे नंबर पर आ गया। जिन्सन... मिल्खा की कसम। तुझे पीछे नहीं रहना है।

भाग जिन्सन भाग!

वाह मेरे बच्चे! अब तीसरे पर आ गया तू। जरा दम लगा। वाह... फिर दूसरे नंबर पर आ गया।...जीत सकता है तू। पहले पर आ सकता है तू। बिल्कुल! जरा जोर...। जरा और जिन्सन।

दर्जन लोग पीछे पड़ गए हैं। सिर्फ तू तीर समान भाग रहा है। तीर समान! जिन्सन, यकीन नहीं होता। तेरे और पहले नंबर के बीच का फासला पिघल रहा है। तू उस फासले को निगल रहा है। सिर्फ चार कदम का फासला है अब। दो कदम का। मिल गया तू उससे अब। जिन्सन, यू आर लेवल विद हिम। मिल्खा की कसम, अब...अब...अब, आगे है तू उससे। आगे। बने रह जिन्सन, बने रह। यस...यस...! तुमने कर दिखाया, जिन्सन! जय हिंद!

जिन्सन स्वर्ण जीत गया है। तिस पर भी उसके चेहरे पर घंमड नहीं, सिर्फ चेतन है। वह घूमकर पैवेलियन की ओर जाता है। हमारा प्यारा तिरंगा उसको दिया जाता है। वह उसको अत्यंत आदरभाव से स्वीकारता है। भारत को गौरव दिया है जिन्सन के साथ हमारी बच्चियों ने - हिमा, सरिता, पूवम्मा, विस्मया। धन्य हैं ये सब। परीक्षा में उत्तीर्ण हुए हैं भारत के ये लाल। परीक्षा में।

मुंशी प्रेमचंद की कहानी है एक- परीक्षा। उसमें खेल का एक हल्का-सा वर्णन है। हल्का पर अविस्मरणीय।

हॉकी के एक मैच का वर्णन करते हैं मुंशी जी- खेल बड़े उत्साह से जारी था। धावे के लोग जब गेंद को लेकर तेजी से उड़ते तो ऐसा जान पड़ता कि कोई लहर बढ़ती चली आती है, लेकिन दूसरी ओर के खिलाड़ी इस बढ़ती हुई लहर को इस तरह रोक लेते थे कि मानो लोहे की दीवार है।

क्या गजब वर्णन किया है मुंशी जी ने।

मानो वे खुद हॉकी के खिलाड़ी रहे हों।

पर बात यहां समाप्त नहीं होती।

जिन्सन जॉन्सन से जब पूछा गया कि आपको कैसा लग रहा है तो उसने कहा कि मैं ईश्वर का शुक्रिया अदा करना चाहता हूं। आय वाज प्रेइंग ऑल द टाइम, ईश्वर ने ही मुझे जिताया है।

यह सुनकर मेरा दिल भर आया।

आजकल लोग ईश्वर को तब ही याद करते हैं, जब मुसीबत में होते हैं, तकलीफ में। यहां जीत के शिखर में, जीतने वाले ने ईश्वर को याद किया है। ऐसा नहीं कि जिन्सन को अपने कोच या कहें कि शिक्षक की याद नहीं थी या अपने घरवालों की। वे सब थीं अपनी-अपनी जगहों पर, लेकिन यह शुक्रिया खुदा के लिए। अपने में अजीब-ओ-गरीब लगा मुझको। और यह ख्याल अपने आप आया कि है हमारा जमाना गमों का, तकलीफों का, दर्द का। पर कहीं न कहीं ऊपरवाला भी है, जो उद्धार कर सकता है हमारा।

ईश्वर उनका भी उद्धार कर, जिनका सब कुछ लुट गया है। जो जिंदगी की दौड़ में, उसकी होड़ में, हार गए हैं। खो गए हैं। गुमशुदाओं को घर ले आ, ऊपरवाले!

उन पर भी हमारा तिरंगा चढ़ा दे!

[ राजनयिक एवं राज्यपाल रहे लेखक वर्तमान में अध्यापक हैं ]

Posted By: Bhupendra Singh