[डॉ. अश्विनी महाजन]। Coronavirus Outbreak: आज पूरी दुनिया एक महामारी के दौर से गुजर रही है। वर्ष 1918 के स्पेनिश फ्लू के एक सदी बाद दुनिया एक ऐसे मोड़ पर आकर खड़ी हुई है, जहां अमेरिका, इटली, फ्रांस, स्पेन, जर्मनी और कनाडा जैसे विकसित देशों के लोग भी लगभग असहाय स्थिति में पहुंच चुके हैं। दुनिया भर में दस लाख लोगों के कोरोना वायरस से संक्रमित होने के साथ ही साठ हजार से भी ज्यादा लोग अपनी जान से हाथ धो चुके हैं।

चीन के वुहान शहर में सबसे पहले दिखा। हालांकि चीन ने पूरे प्रांत में तालाबंदी करते हुए इस वायरस पर लगभग विजय पा ली है, लेकिन उसके बाद बड़े-बड़े देश इस वायरस की चपेट में बुरी तरह फंस चुके हैं। चीन में हालांकि इस वायरस से 81,500 लोग संक्रमित हुए और 3,300 लोग जान गंवा चुके हैं, जबकि इटली में इस रोग से संक्रमित होने वालों की संख्या एक लाख तक पहुंच चुकी है और मरने वालों की संख्या बारह हजार तक पहुंच चुकी है।

अमेरिका के हालात तो और भी खराब हैं। इस बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन से यह अपेक्षा थी कि वह विश्व को इस महामारी से बचाने के लिए अग्रणी भूमिका निभाएगा, मात्र एक ‘टॉकिंग शॉप’ बनकर रह गया है। इससे बेहतर तो हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं जिन्होंने पहले दक्षिण एशियाई क्षेत्र के शासनाध्यक्षों के साथ मिलकर और बाद में जी-20 देशों के शासन अध्यक्षों के साथ बात करते हुए साझा लड़ाई की रणनीति बनाने का प्रयास तो किया। जहां डब्ल्यूएचओ चीन के पाप को छिपाते हुए दुनिया को गुमराह करने का काम करता रहा, वहीं भारतीय नेतृत्व ने अपने बलबूते देश में प्रभावी लॉकडाउन करते हुए इस चीनी वायरस के प्रकोप को कम करने का काम शुरू कर दिया है।

सही नहीं हैं डरावने आंकड़े: जहां दुनिया भर की सरकारें इस महामारी से जूझने का प्रयास कर रही हैं, कुछ सांख्यिकी विशेषज्ञ, जो मेडिकल विशेषज्ञ नहीं हैं वे कुछ ऐसे आंकड़े प्रस्तुत कर रहे हैं जिससे दुनिया में खौफ का माहौल बन रहा है। एक 14 सदस्यों वाले अध्ययन दल के अनुसार मई माह के मध्य तक भारत में एक लाख से तेरह लाख तक संक्रमित मामले सामने सकते हैं। ये आंकड़े संक्रमण की दर के वैश्विक अनुमानों के आधार पर परिकलित किए गए हैं। हालांकि वैश्विक अनुभवों के आधार पर ये आंकड़े सैद्धांतिक रूप से सही हो सकते हैं, लेकिन व्यावहारिक स्तर पर भारत के संदर्भ में ये सही नहीं हैं। जब ये आंकड़े प्रकाशित हुए थे तब तक भारत में लॉकडाउन का निर्णय नहीं लिया गया था।

चीन समेत अधिकांश देशों में संक्रमण तीसरी स्टेज तक फैलने के बाद ही लॉकडाउन का निर्णय लिया गया, लेकिन भारत में अच्छी बात यही रही कि यह निर्णय दूसरी स्टेज पर ही ले लिया गया। जब यह निर्णय लिया गया तब तक भारत में संक्रमित लोगों की संख्या लगभग 500 थी। आइसीएमआर के आकलन के अनुसार समाज में एक दूसरे से शारीरिक दूरी बनाकर इस संक्रमण को दो-तिहाई तक कम किया जा सकता है, और अंतोतगत्वा इस पर विजय पाई जा सकती है। यही कारण है कि पूर्व में संक्रमित लोगों के परिवार और निकट के लोगों को छोड़कर सामुदायिक स्तर पर यह संक्रमण नहीं फैला। स्वाभाविक ही है कि सांख्यिकी विशेषज्ञों के इस मॉडल को भारत पर लागू नहीं किया जा सकता।

स्वस्थ होने के संकेत: आज दुनिया में कुल संक्रमितों की संख्या दस लाख का आंकड़ा पार कर गई है। हालांकि बड़ी संख्या में मौत होने के बावजूद तमाम लोग इसके चंगुल से बच निकलने में सफल भी हो रहे हैं। सर्वविदित है कि मानव शरीर की विशेषता है कि उसमें रोग के विरुद्ध लड़ने की क्षमता होती है या रोग होने पर यह प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है। कोरोना संक्रमण के बाद सांख्यिकी विशेषज्ञों के मॉडल को चुनौती देते हुए ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय द्वारा प्रस्तुत मॉडल में कहा गया है कि वास्तव में महामारी अपने अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। इस मॉडल के अनुसार यह संक्रमण ब्रिटेन की आधी जनसंख्या तक पहुंच चुका है, लेकिन अधिकांश लोगों में इसका कोई लक्षण नहीं है अथवा कम ही लक्षण हैं। इसलिए इस बीमारी से डरने की जरूरत नहीं है। अध्ययन हालांकि लॉकडाउन का समर्थन भी करता है ताकि जो भी थोड़ा बहुत संक्रमण बचा हो, वह भी पूरी तरह से खत्म हो जाए।

चीन, अमेरिका, इटली, फ्रांस, जर्मनी समेत कई देशों में इस बीमारी के भीषण प्रकोप के चलते वहां की अति विकसित स्वास्थ्य व्यवस्थाएं भी चरमराई सी दिखाई देती हैं। भारी संख्या में मौतों की भयावहता को देखने से ही विश्व घबराया हुआ है। ऐसे में भारत जैसे कम संसाधन संपन्न देश जहां विश्व की दूसरी सबसे बड़ी जनसंख्या रहती है, यह महामारी कितनी तबाही मचा सकती है इसकी कल्पना भी भयभीत करने वाली है। पूरे देश को लॉक करने का एक कठिन निर्णय देश ने लिया है।

हालांकि अधिकांश तौर पर लॉकडाउन सफल है, लेकिन प्रवासी मजदूरों का अपने गांवों में पलायन इस लॉकडाउन की सबसे कमजोर कड़ी बन चुकी है। केंद्र और राज्यों की सरकारें, पुलिस एवं नागरिक प्रशासन, स्वयंसेवी संगठन एवं संस्थाएं इस समस्या के समाधान और कुल मिलाकर लॉकडाउन को सफल बनाने में जुट चुकी हैं। इन सब प्रयासों के चलते भारत दुनिया में इस महामारी के प्रकोप को रोकने की मुहिम में अभी तक सफल दिखाई देता है।

भारत में संक्रमितों की संख्या अभी तीन हजार से कुछ ज्यादा है और उसकी वृद्धि दर में तब्लीगी जमात से इसके फैलने वाले कारण को छोड़ दें तो कुल मिलाकर हालात नियंत्रण में हैं। ऐसे में अगले एकाध सप्ताह तक जिम्मेदारी से और सावधानी बरतते हुए हमें भौतिक रूप से लोगों के बीच दूरी बनाए रखते हुए लॉकडाउन का पालन करना होगा। भारत का यह प्रयास दुनिया के लिए पथ प्रदर्शक सिद्ध हो सकता है।

[एसोसिएट प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय]

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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