प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस सप्ताह श्रीलंका में राष्ट्रमंडल देशों के शासनाध्यक्षों के सम्मेलन (चोगम) में भाग लेने नहीं जा रहे हैं। प्रधानमंत्री का यह फैसला एक राजनेता के साथ ही सरकार के मुखिया की हैसियत से लिया गया एक सुलझा हुआ निर्णय है। मीडिया के एक वर्ग द्वारा चोगम में प्रधानमंत्री के भाग न लेने को अनुचित ठहराना और इसे राजनीतिक दबाव में राष्ट्रीय हितों की बलि करार देना बिल्कुल गलत है। प्रधानमंत्री से सबसे पहली और महत्वपूर्ण अपेक्षा देश को चलाने की होती है और देश चलाते हुए उन्हें निर्वाचन प्रक्रिया से अपनी पार्टी को मिले जनादेश पर बराबर ध्यान रखना पड़ता है। निर्वाचन प्रक्त्रिया ही केंद्र में सरकार का स्वरूप निर्धारित करती है। ऐसे में सरकार पर गठबंधन के सहयोगी विभिन्न क्षेत्रीय दलों का प्रभाव स्वाभाविक ही है।

विदेश में भारत के राष्ट्रीय हितों और घरेलू राजनीतिक दबाव में अंतर्विरोध जरूरी नहीं है। किसी भी सूरत में कोई भी ऐसा राष्ट्रीय हित संभव नहीं है, जिसका घरेलू स्तर पर समर्थन न हो अथवा जिससे क्षेत्रीय अपेक्षाएं पूरी न होती हों। भारत का अंग्रेजीभाषी, विदेशों में भ्रमण करने वाला अभिजात्य वर्ग क्षेत्रीय पार्टियों को यह कहकर खारिज कर देता है कि उन्हें वैश्रि्वक क्षितिज पर भारत की वृहत्तार भूमिका की समझ नहीं है। किंतु ये लोग विदेश में भारत की लोकतांत्रिक पहचान का तर्ब ंढढोरा नहीं पीट पाएंगे अगर भारत एक तरफ तो अमेरिका के साथ संधियों को बढ़ावा दे और साथ ही बात जब पड़ोसियों के साथ संबंधों के मुद्दे पर आए तो श्रीनगर, गुवाहाटी, कोलकाता या चेन्नई के हितों को नजरंदाज कर दे। यही नहीं, श्रीलंका के मुद्दे पर तमिल राजनीतिक दल जिनमें सत्तारूढ़ दल व विपक्ष दोनों शामिल हैं, प्रधानमंत्री के श्रीलंका के दौरे के विरोध में एकजुट हैं। हमें इस तथ्य की अनदेखी नहीं करनी चाहिए कि श्रीलंका के मसले पर तमिलनाडु का पूरा राजनीतिक वर्ग एकमत है।

यह सही है कि भारत-बांग्लादेश संबंध पश्चिम बंगाल सरकार के अल्पकालिक राजनीतिक समीकरणों के कारण बंधक बन गए थे, किंतु श्रीलंका में तमिल मुद्दे पर भारत के फैसले को घरेलू चिंताओं से इतर अन्य कारणों से भी उचित ठहराने के अनेक कारण हैं। एक पहलू इस सवाल में निहित है कि क्या भारत के विदेश सामरिक हितों के परिप्रेक्ष्य में चोगम में भाग न लेने का प्रधानमंत्री का फैसला सही है? इस सवाल के जवाब के कई आयाम हैं-भारत-श्रीलंका संबंध और तमिल समस्या, भारत के क्षेत्रीय हित और राष्ट्रमंडल जैसे बहुपक्षीय संगठनों में भाग लेने से इन हितों को साधने में मिलने वाली मदद। दरअसल, भारत-श्रीलंका संबंध अनेक स्तरों पर करीबी हैं। इनमें राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य संबंध शामिल हैं। अनेक स्तरों पर भारत के सहयोग के बिना कोलंबों में महिंदा राजपक्षे की सरकार लिट्टे का सफाया नहीं कर सकती थी। और इसलिए श्रीलंका प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कोलंबो न जाने के मुद्दे को भारत के खिलाफ लंबे समय में शायद ही इस्तेमाल करें।

दूसरा पहलू यह है कि लिट्टे पर जीत और फिर राष्ट्रपति पद पर पुनर्निर्वाचन के बाद राजपक्षे ने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ और श्रीलंका में स्वतंत्रता के अन्य मामलों पर कड़ा रुख अपनाया। इससे न तो श्रीलंका के लोकतांत्रिक मूल्यों की सही तस्वीर सामने आती है और न ही दक्षिण एशिया में भारत की भूमिका स्थापित होती है। तमिल नागरिकों को समान अधिकार देने के लिए राजपक्षे ने श्रीलंका के संविधान में 13वें संशोधन का जो वायदा किया था वह भी पूरा नहीं किया। मनमोहन सिंह का कोलंबो और इसके बाद जाफना का दौरा राजपक्षे की नीतियों और अन्य ज्यादतियों पर मुहर ही लगाता और इससे तमिल अल्पसंख्यकों की मांगों की अनदेखी करने के लिए राजपक्षे का हौसला बढ़ता।

तीसरा पक्ष यह है कि कुछ शंकालू लोग यह भी कह सकते हैं कि क्योंकि मनमोहन सिंह ने चोगम सम्मेलन में भाग न लेकर मेजबान के रूप में राजपक्षे की छवि खराब की है इसलिए अब श्रीलंका के राष्ट्रपति तमिल समस्या पर और कड़ा रुख अपना सकते हैं। सबसे पहला खतरा तो यही है कि भारत के पड़ोसी देशों में अपना प्रभाव बढ़ाकर भारत की घेराबंदी कर रहे चीन का अब श्रीलंका में दखल और बढ़ सकता है। एक हद तक यह संभव है, किंतु नई दिल्ली श्रीलंका में चीनी उपस्थिति को तब तक कम करने की स्थिति में नहीं है जब तक आर्थिक और व्यावसायिक रूप से यह दोनों देशों के हित में है। और इस मुद्दे पर भी, श्रीलंका भारतीय अर्थव्यवस्था से कहीं अधिक घुला-मिला है, बनिस्बत चीनी अर्थव्यवस्था के। राजपक्षे इतने चतुर जरूर हैं कि उन्हें चीनी सीमाओं का भान है और वह समझते हैं कि श्रीलंका का विशाल पड़ोसी भारत उसके लिए बेहतर व्यापार साझेदार हो सकता है। यही नहीं, जहां तक चीन का संबंध है, श्रीलंका इतना छोटा खिलाड़ी है कि वह उसके लिए भारत से नहीं उलझ सकता या भारत में अपने हितों को दांव पर नहीं लगा सकता। इस प्रकार राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक दृष्टिकोण से भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बहुत सोच-विचार कर फैसला लिया है।

जहां तक क्षेत्रीय संगठनों में भारत की भागीदारी का सवाल है, यह स्मरण रहना चाहिए कि चोगम उन अनेक बहुपक्षीय मंचों में से एक है जिनका भारत अंग है और संभवत: यह सबसे महत्वपूर्ण मंच नहीं है। हालांकि चोगम प्रधानमंत्री को भारत के पड़ोसी देशों से अधिक अनेक छोटे कैरेबियन और अफ्रीकी देशों के साथ, जिनसे भारत का नियमित व्यवहार नहीं है, मेल-जोल बढ़ाने का एक सुअवसर जरूर उपलब्ध कराता। इस दृष्टिकोण से जरूर भारत ने एक अवसर गंवाया है। भारत को बहुपक्षीय सहभागिता के अलग-अलग मंचों का अपना दायरा बढ़ाना चाहिए, ताकि इस प्रकार के किसी एक सम्मेलन में किसी भी कारण से भाग न ले पाने से होने वाली क्षति दूसरे मंचों से पूरी कर ली जाए। यह विदेश नीति का प्रधान नियम होना चाहिए कि सारे अंडे एक ही टोकरी में न रखे जाएं।

[लेखक जबिन टी. जैकब, विदेश मामलों के विशेषज्ञ हैं]

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