नई दिल्ली (डॉ. भरत झुनझुनवाला)। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वाशिंग मशीन और सौर ऊर्जा के पैनलों पर अतिरिक्त कर लगा दिया है। अमेरिकी उत्पादकों ने शिकायत की थी कि दूसरे देशों द्वारा सस्ता माल बेचे जाने के कारण उनका धंधा ठप हो रहा है। इसके बाद उन्होंने स्टील और एल्युमीनियम पर भी क्रमश: 25 एवं 10 प्रतिशत अतिरिक्त कर लगा दिया है। इन आयात करों का भारत पर सीधा प्रभाव कम ही पड़ेगा। मेरिका द्वारा आयातित स्टील और एल्युमीनियम में भारत का हिस्सा मात्र 2 प्रतिशत है, परंतु पूरी आशंका है कि यह नीति फैलती ही जाएगी और विश्व व्यापार का संकुचन होगा। तब भारत के तमाम निर्यात जैसे बासमती चावल और गलीचे भी संरक्षणवाद की चपेट में आ जाएंगे। इसलिए हमें अपनी नीतियां तत्काल दुरुस्त कर लेनी चाहिए।

व्यापार मामले में अमेरिकी नीति बदली

अमेरिका अब तक खुले विश्व व्यापार का पक्षधर रहा है, लेकिन अब परिस्थितियां बदल गई हैं। नब्बे के दशक में अमेरिका में विंडोज सॉफ्टवेयर, इंटरनेट, जीन परिवर्तित कपास के बीज, कैंसर रोधी दवाओं आदि का ईजाद हो रहा था। 1996 में जब मैं अमेरिका गया था तो डेस्कटॉप कंप्यूटर के लिए डायल-अप मोडेम लेकर आया था। इन नई हाइटेक सामग्री के उत्पादन में अमेरिका में रोजगार के वसर सृजित हो रहे थे। फलस्वरूप अमेरिका में श्रमिकों के वेतन ऊंचे थे। इन ऊंचे वेतनों के कारण वहां कपड़े और कारों के उत्पादन की लागत ज्यादा आ रही थी। भारत के कपड़े और चीन की कार सस्ती पड़ती थी। इसलिए उस समय खुला विश्व बाजार अमेरिका के लिए दोहरे लाभ का सौदा था। मॉनसेंटों जैसी कंपनियों को भारत में जीन परिवर्तित कपास के बीज बेचने का वसर मिल रहा था, साथ ही भारत में बने सस्ते कपड़े अमेरिकी उपभोक्ताओं को उपलब्ध हो रहे थे।

हाइटेक रोजगार में आई कमी

आज परिस्थिति बदल गई है। विंडोज सॉफ्टवेयर जैसा दूसरा क्रांतिकारी आविष्कार अमेरिका में नहीं हुआ है। जीन-परिवर्तित बीज बनाने जैसी तकनीक का फैलाव हो गया है और आज हमारी कंपनियां भी इनका उत्पादन करने लगी हैं। अमेरिका के हाइटेक उत्पादों का निर्यात कम हुआ है। इन हाइटेक क्षेत्रों में अमेरिका में रोजगार नहीं बन रहे हैं। वेतन कम होने के कारण विनिर्माण गतिविधियों का भी मेरिका से भारत और चीन को स्थानांतरण हो चुका है। अमेरिकी नागरिक पस्त हैं। ट्रंप ने वाशिंग मशीन आदि पर आयात कर बढ़ाए हैं जिससे इन वस्तुओं का उत्पादन वापस अमेरिका की और लौटे और इनके उत्पादन से अमेरिका में रोजगार उत्पन्न हों। जब तक अमेरिका में नए क्रांतिकारी उत्पादों का आविष्कार नहीं होता तब तक अमेरिका में हाइटेक माल के उत्पादन में रोजगार नहीं बनेंगे और अमेरिकी सरकार का झुकाव अपने उद्योगों को संरक्षण देने का होगा। फिलहाल यही संकेत नजर आ रहे हैं कि यह नीति ही आगे जोर पकड़ेगी।

किसानों की स्थिति भी खराब

इस पृष्ठभूमि में अमेरिकी संरक्षणवाद का हम भारत पर प्रभाव का आकलन कर सकते हैं। मेरे आकलन में नब्बे के दशक में भारत द्वारा खुले विश्व व्यापार को अपनाना नुकसानदेह रहा। बीते 20 वर्षो के दौरान देश में संगठित क्षेत्र में रोजगार घटे हैं और किसान की स्थिति और खराब हुई है। छोटे उद्योग चीन के सस्ते माल से परेशान हुए हैं। श्रमिक की दिहाड़ी अवश्य बढ़ी है, परंतु इसका श्रेय मनरेगा को जाता है, न कि खुले विश्व व्यापार को। यह दुरूह स्थिति तब पैदा हुई है जब अमेरिका द्वारा खुले व्यापार को बढ़ावा दिया जा रहा था। अमेरिकी विदेशी निवेश आ रहा था और अमेरिका से हमारे निर्यात बढ़ रहे थे। जिस प्रकार गांव में नहर का पानी आने के बाद भी किसान आत्महत्या कर रहे हैं उसी प्रकार विदेशी निवेश आने और भारत के कपड़ों का निर्यात बढ़ने के बावजूद भारतीय नागरिक परेशान है। ट्रंप द्वारा संरक्षण की नीति पनाने से हमारी परिस्थिति और विकट हो जाएगी। नहर में पानी आना भी बंद हो जाए तो पहले से ही पस्त किसान पूर्णतया धराशायी हो जाता है।

विदेशी निवेश के प्रति कड़ा रुख

ट्रंप की संरक्षणवादी नीति से अमेरिकी कंपनियों में उत्साह है। ट्रंप ने कारपोरेट टैक्स की दर भी कम कर दी है जिससे मेरिकी कंपनियां वापस पने वतन वापसी कर रही हैं। अमेरिका में ब्याज दरों में वृद्धि हुई है। परिणामस्वरूप विदेशी निवेशकों को पने ही घर में समुचित आय मिल रही है। उनका विदेशी निवेश के प्रति रुख कड़ा हुआ है। आने वाले समय में हमें विदेशी निवेश कम ही मिलने की संभावना है। ट्रंप द्वारा आयात कर बढ़ाने से हमारे निर्यात भी दबाव में आएंगे। वर्तमान में ये आयात कर चुनिंदा माल जैसे वाशिंग मशीन और स्टील पर बढ़ाए गए हैं, परंतु इनका विस्तार सुनिश्चित है। स्टील पर आयात कर बढ़ाने से अमेरिका में स्टील का दाम बढ़ जाएगा। स्टील का बर्तन बनाने वाली मेरिकी कंपनी को महंगा स्टील खरीदना होगा। अमेरिकी बर्तन महंगा हो जाएगा। चीन में बने स्टील के बर्तन के सामने मेरिकी बर्तन निर्माता खड़ा नहीं हो सकेगा। इसलिए ट्रंप को धीरे-धीरे अन्य तमाम वस्तुओं पर भी आयात कर बढ़ाने होंगे। जिस प्रकार केवल उत्तम कोटि का उर्वरक डालने से फसल उत्तम नहीं हो जाती। इसके साथ उत्तम बीज, सिंचाई आदि की भी जरूरत होती है, वैसे ही केवल स्टील पर आयात कर बढ़ाने से अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सुधार नहीं होगा।

भारत ले सीख

स्पष्ट होता है कि खुले विश्व व्यापार के अमेरिकी नागरिकों पर दो विपरीत प्रभाव पड़ रहे हैं। इससे अमेरिकी श्रमिक के रोजगार का हनन हो रहा है। जैसे अमेरिकी वाशिंग मशीन निर्माता के धंधे के ठप होने में दिखता है जबकि अमेरिकी उपभोक्ता को सस्ती वाशिंग मशीन मिल रही है। ट्रंप को चयन करना था कि वह अपने नागरिक के रोजगार को बचाएं थवा उसे सस्ती वाशिंग मशीन दिलवाएं। उन्होंने रोजगार को बचाने का निर्णय लिया है जो मेरी समझ से सही है। दुकान के शो केस में रखी वाशिंग मशीन किस काम की यदि जेब में उसे खरीदने के लिये रकम न हो। हमारी स्थिति अमेरिकी जैसी ही है। जिस प्रकार अमेरिकी वाशिंग मशीन निर्माता चीन में बनी वाशिंग मशीन से त्रस्त थे उसी प्रकार भारत में खिलौने और एलईडी लाइट के निर्माता चीन के माल से त्रस्त हैं। यदि ट्रंप ने अमेरिकी वाशिंग मशीन के उत्पादन को बचाने के लिए आयात कर बढ़ाने का निर्णय लिया है तो क्या भारत को अपने खिलौना निर्माताओं को बचाने के लिए आयात कर नहीं बढ़ाना होगा?

वास्तव में हमारे लिए संरक्षण को अपनाना ज्यादा जरूरी है, क्योंकि हम पर घटते विदेशी निवेश और निर्यातों की मार भी पड़ेगी। ट्रंप के संरक्षणवाद से विश्व पूंजी का पलायन अमेरिका की ओर होगा। भारत को विदेशी निवेश भी कम मिलेगा और भारत की पूंजी भी मेरिका का रुख करेगी। ट्रंप द्वारा वाशिंग मशीन पर आयात कर बढ़ाने से भारत के लिए कपड़ों का निर्यात करना भी कठिन हो जाएगा। यदि अमेरिका के लिए संरक्षण की नीति लाभप्रद है तो भारत के लिए और भी ज्यादा फायदेमंद है। हमें तत्काल चेतना चाहिए। हमारी नहर का पानी आना बंद ही नहीं हो गया है, बल्कि वह उल्टा बहने लगा है। खुले व्यापार से देश की चुनिंदा बड़ी कंपनियों को लाभ हो सकता है, देश के आम नागरिक को नहीं।

(लेखक वरिष्ठ अर्थशास्त्री एवं आइआइएम बेंगलुरु के पूर्व प्रोफेसर हैं)

By Srishti Verma