[डॉ. रहीस सिंह]। ‘हम जवान हैं, लेकिन हम यह जानते हैं कि अगर अपने अधिकारों के लिए खड़े नहीं होंगे तो हम अपने अधिकारों को खो देंगे।’ ये विचार हैं हांगकांग के एक छात्र के जो हांगकांग को हांगकांग के रूप में ही देखना चाहता है न कि ‘सोशलिज्म विद चाइनीज कैरेक्टिरिस्टिक्स’ के रूप में। लेकिन बीजिंग और शी चिनफिंग भी क्या ऐसा ही चाहते हैं? बिल्कुल नहीं, जिस तरह से पिछले कुछ समय से शेन्झेन बे स्पोर्ट्स सेंटर पर पीपुल्स आम्र्ड पुलिस (चीनी अर्धसैनिक बल) का जमावड़ा बढ़ रहा है, उसे देखते हुए तो यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है। तो क्या वास्तव में हांगकांग अपनी लड़ाई जीत पाएगा? या फिर बीजिंग हांगकांग में थ्येनआनमन स्क्वायर जैसा कोई इतिहास दोहरा सकता है?

लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा 
दरअसल स्वतंत्रता की भी अपनी विशेषता होती है, वह जहां भी है वहां दिखना चाहती है, लेकिन दूसरी तरफ तानाशाही है जो विभिन्न नामों और चरित्रों के साथ निर्णायक स्थिति हासिल कर स्वतंत्रता को हर कीमत पर खत्म करना चाहती है। ऐसा ही इस समय हांगकांग और चीन के बीच दिख रहा है। हांगकांग अपने मूल्यों पर आगे बढ़ना चाहता है जिसमें स्वतंत्रता है, शासन की एक अलग व्यवस्था है, मूल्य हैं और लोकतंत्र है, जबकि दूसरी तरफ चीन है जहां एकदलीय व्यवस्था है और एक आजीवन राष्ट्रपति पद पर रह सकने वाला एक व्यक्ति शी चिनफिंग। इन्हीं के इर्दगिर्द देश की सभी ताकतें निहित हैं और ये स्वतंत्रता, लोकतंत्र एवं बहुलतावाद से डरते हैं।

महत्वपूर्ण बात यह है कि लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए हांगकांग द्वारा लड़ी जा रही लड़ाई में हांगकांग के साथ वह दुनिया खड़ी दिखाई नहीं देती जिसने लोकतंत्र की रक्षा के बहाने बड़ी सभ्यताएं और मानवीय मूल्य ध्वंस कर दिए, वजहें चाहे जो हों। हां हांगकांग में कुछ के हाथों में अमेरिकी झंडे अवश्य दिखाई दे रहे हैं और अमेरिकी कांग्रेस द्वारा आंदोलनकारियों के प्रति अपना समर्थन भी व्यक्त किया गया है। अब इनके मायने क्या हो सकते हैं, यह बता पाना अभी थोड़ा मुश्किल है।

विवाद की मूल वजह
दरअसल यह विवाद प्रत्यर्पण कानून में लाए गए बदलाव को लेकर उत्पन्न हुआ। प्रस्तावित कानून के अनुसार यदि व्यक्ति अपराध करके हांगकांग भाग जाता है तो उसे जांच प्रक्रिया में शामिल होने के लिए चीन भेज दिया जाएगा। यह कानून चीन को उन देशों के संदिग्धों को प्रत्यर्पित करने और उनकी संपत्ति का अधिग्रहण करने की अनुमति देगा जिनके साथ हांगकांग के समझौते नहीं है। जबकि अभी तक हांगकांग ब्रिटिशकालीन कॉमन लॉ सिस्टम से काम कर रहा था और उसकी 1997 से पहले जिन देशों के साथ प्रत्यर्पण संधि थी, उन्हीं को ही वह वांछित अपराधियों को प्रत्यर्पित करता था जिसमें अमेरिका, ब्रिटेन और सिंगापुर जैसे देश शामिल हैं। अब उसे सभी को चीन को प्रत्यर्पित करना पड़ेगा। इससे हांगकांग के लोगों में यह भय पनपने लगा है कि चीन इस कानून के जरिये किसी भी ऐसे व्यक्ति को जो राजनीतिक आंदोलन से जुड़ा है, हांगकांग से प्राप्त कर लेगा और इस तरह से हांगकांग के लोगों के सभी राजनीतिक अधिकार समाप्त हो जाएंगे। हांगकांग के लोगों का यह डर वाजिब है, क्योंकि नया कानून निश्चित रूप से स्वतंत्र, लोकतांत्रिक दौर का अंत कर देगा और इसके बाद कानून हांगकांग के नियंत्रण में न होकर चीन के नियंत्रण में हो जाएगा।

वन कंट्री-टू सिस्टम
यह भी संभव है कि इसी के साथ चीन ‘एक देश-दो व्यवस्था’ (वन कंट्री-टू सिस्टम) का भी ध्वंस कर दे, जबकि वर्ष 1997 में ब्रिटेन ने हांगकांग को चीन को हस्तांतरित करते समय यह गारंटी हासिल की थी कि चीन ‘वन कंट्री-टू सिस्टम’ के तहत कम से कम वर्ष 2047 तक लोगों की स्वतंत्रता और अपनी कानूनी अवस्था को बनाए रखेगा। वैसे तो चीन की कम्युनिस्ट सरकार इस गारंटी का निर्वहन 20 वर्ष भी नहीं कर सकी, जिसका परिणाम यह हुआ कि वर्ष 2014 में हांगकांग में लोकतंत्रवादियों ने 79 दिनों तक ‘अंब्रेला मूवमेंट’ चलाया और 2019 में फिर लोग सड़कों पर हैं। यह अलग बात है कि इन आंदोलनों से बीजिंग के शासक डरते दिखे थे।

लोकतांत्रिक आंदोलन
अब बात करें बीजिंग और शी चिनफिंग की तो इतना तय है कि ये दोनों हांगकांग के लोकतांत्रिक आंदोलन को लोकतांत्रिक आंदोलन के रूप में कदापि नहीं स्वीकार करेंगे जिससे कि हांगकांग के आंदोलन को वैश्विक समर्थन हासिल हो सके। बल्कि इस बात की अधिक संभावनाएं हैं कि वे इसे चीन के कम्युनिस्ट शासन के विरुद्ध सुनियोजित संघर्ष या विद्रोह ही करार देंगे। ध्यान रहे कि हांगकांग में जिन युवा आंदोलनकारियों की गिरफ्तारियां हुई हैं उनके खिलाफ जिस अदालती कार्रवाई की तैयारी हो रही है उसमें बहुत से छिपे हुए संदेश आंदोलन एवं आंदोलनकारियों के लिए निहित हैं।

बीजिंग के सरकारी अधिकारी आंदोलनकारियों के कृत्यों को ‘आतंकवाद’ के रूप में पेश करना चाह रहे हैं, न कि राजनीतिक या अधिकारों के मांगने वाले एक जनआंदोलन के रूप में। एक बात और यह कि बीजिंग अभी यह मानकर चल रहा है कि हांगकांग के संघर्ष पर वह आसानी से नियंत्रण स्थापित कर लेगा। लेकिन जिस दिन उसे ऐसा महसूस होगा कि हांगकांग उसके नियंत्रण से निकल रहा है, उस दिन बीजिंग हांगकांग पर सैन्य कार्रवाई करने से नहीं चूकेगा। शायद अभी बीजिंग यह भी मानकर चल रहा है कि वह हांगकांग में नियुक्त अपने अधिकारियों और अदालतों के जरिये आंदोलन को कुचलने में कामयाब हो जाएगा। और इसके लिए वह पूरी तैयारी भी कर चुका है।

थियानमेन स्‍क्‍वायर का इतिहास
इसका मतलब यह हुआ कि यदि वह इसमें असफल रहा तो फिर थ्येनआनमन स्क्वायर का इतिहास भी दोहरा सकता है। इस मामले में उसका एक पक्ष तो मजबूत है ही यानी वह एक बड़ी आर्थिक और सैनिक ताकत है और वह चाहता है कि दुनिया को इसका एहसास होता रहे। जाहिर है वह इसके लिए किसी हद तक जा सकता है। इसमें संशय नहीं कि 1989 के चीन और 2019 के चीन में बड़ा अंतर आ चुका है और चीन दुनिया की एक ऐसी ताकत बन चुका है जिसके पीछे दुनिया के देश लामबंद हैं और कोई भी उसका खुलकर विरोध करने की क्षमता नहीं रखता। लेकिन इस सबके बावजूद हांगकांग में बीजिंग की सैन्य कार्रवाई जोखिम भरी हो सकती है।

चीन की अर्थव्यवस्था
चीन की अर्थव्यवस्था इस समय संकट से गुजर रही है। उसमें कुछ बड़े-बड़े बुलबुले भी निर्मित हो चुके हैं। ध्यान रहे कि चीनी अर्थव्यवस्था निर्यातों पर निर्भर है और अमेरिका-चीन ट्रेड वार आर्थिक शीतयुद्ध की शुरुआत करता प्रतीत हो रहा है। ऐसी स्थिति में चीन के सामने जल्द बड़ा संकट आ सकता है। यदि बीजिंग हांगकांग में सैन्य कार्रवाई के विकल्प को चुनता है तो यह भी संभव है कि दुनिया चीन पर विशेष प्रकार के आर्थिक प्रतिबंध लगा दे जिससे चीन के उत्पादों का वैश्विक निर्यात ठप हो जाए। यदि ऐसा हुआ तो चीन की अर्थव्यवस्था दम तोड़ने के कगार पर पहुंच जाएगी। यह स्थिति बीजिंग को हांगकांग में सैन्य कार्रवाई के विकल्प का चुनाव करने की इजाजत नहीं देती।

बहरहाल हांगकांग इस समय थ्येनआनमन स्क्वायर इतिहास की परिधि पर खड़ा दिख रहा है, बस कभी लगता है कि उल्टी गिनती (काउंट डाउन) की शुरुआत हो चुकी है, कभी लगता है कि अभी शायद विलंब है। ऐसा इसलिए कि शी चिनफिंग हांगकांग में चल रहे घटनाक्रम का शायद आकलन कर रहे हैं। वर्तमान हालात को देखते हुए ऐसा नहीं लगता है कि बीजिंग हांगकांग में सैन्य कार्रवाई करेगा, लेकिन यदि राष्ट्रपति शी जिनपिंग किसी कारणवश इस निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं कि हांगकांग में चीन की संप्रभुता खतरे में है, तो वे सैन्य कार्रवाई का विकल्प चुनने में संकोच नहीं करेंगे। फिलहाल देखना यह है कि हांगकांग लोकतांत्रिक मूल्यों को स्थापित करने में सफल होगा या फिर बीजिंग सैन्य कार्रवाई के लिए विवश।
[अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार]

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Posted By: Sanjay Pokhriyal

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