ऋषि राज। भारत के राष्ट्रीय खेल हॉकी में एक युग का अंत हो गया। हॉकी के महान खिलाड़ी बलबीर सिंह सीनियर नहीं रहे। आज की युवा पीढी भले ही उन्हें ज्यादा न जानती हो, लेकिन उन्होंने भारत को ओलंपिक में तीन बार स्वर्ण पदक दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। बलबीर सिंह का स्थान भारतीय हाकी में शीर्ष पर रहा है। उन्होंने तमाम मुकाबलों में भारत का नाम कई बार रोशन किया है। उन्हें भारत के सर्वश्रेष्ठ सेंटर फॉरवर्ड के रूप में जाना जाता है।

वर्ष 1948 में हुए लंदन ओलंपिक में अंग्रेजों को उनकी ही जमीन पर फाइनल मुकाबले में हराना उनके जीवन का अत्यंत गौरवमयी क्षण था। हो भी क्यों नहीं, आखिर दो सौ वर्षो तक जिन अंग्रेजों ने भारत पर राज किया उन्हें, उन्हीं की धरती पर हराना किसी सौगात से कम नहीं था।

‘जीत के बाद तिरंगा फहराया गया और जब तिरंगा ऊपर जा रहा था उस समय लगा कि मैं भी उस तिरंगे के साथ ऊपर जा रहा था।’ यह वाकया सुनाते समय उनकी आंखों में एक चमक सी आ जाती थी, जो राष्ट्र के प्रति उनके नैसर्गिक प्रेम को उजागर करती थी। वर्ष 1948 के लंदन ओलंपिक में बलबीर जी ने कुल आठ गोल किए थे। आजाद हिंदुस्तान का हॉकी में वह पहला स्वर्ण पदक था। उसके बाद 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में बलबीर जी ने नौ गोल किए थे और भारत को स्वर्ण पदक दिलवाया था।

बलबीर जी ने इस ओलंपिक के फाइनल में हॉलैंड के खिलाफ छह में से पांच गोल दाग कर न केवल इतिहास रच दिया, बल्कि गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज करवा लिया। वर्ष 1956 के मेलबर्न ओलंपिक में भी भारत को हॉकी में स्वर्ण पदक दिलवाने में उनकी निर्णायक भूमिका रही थी। मेलबर्न ओलंपिक में उन्होंने कुल पांच गोल किए थे। आजादी के बाद भारतीय हॉकी को छह में से पांच स्वर्ण पदक दिलवाने में बलबीर सिंह ने निर्णायक भूमिका निभाई थी। वर्ष 1957 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के हाथों पद्मश्री पुरस्कार मिला। इस नागरिक सम्मान को हासिल करने वाले वह देश के पहले खिलाड़ी थे।

यहां एक और घटना का उल्लेख करना बहुत जरूरी है जो बलबीर जी के व्यक्तित्व की जीवटता से परिचय कराती है। हुआ यूं कि वर्ष 1975 में हॉकी विश्व कप के लिए बलबीर सिंह का बतौर कोच के रूप में चुनाव हुआ। टीम को तैयार करने के लिए वह जी-जान से जुटे हुए थे। उस टूर्नामेंट की तैयारी के दौरान ही बलबीर सिंह के पिता का देहांत हो गया। बलबीर जी ने कैंप से केवल आधे दिन की छुट्टी ली और पिता के अंतिम संस्कार से निवृत्त होकर तुरंत टीम को तैयार करने में जुट गए। उसी मेहनत और जोश की बदौलत देश आज तक का अपना इकलौता हॉकी विश्व कप खिताब हासिल कर सका। यह दृष्टांत इस बात को दर्शाता है कि उनके भीतर किस प्रकार की खेल भावना और उससे भी कहीं अधिक राष्ट्र को विश्व कप में स्वर्ण पदक दिलाने की तमन्ना थी। उसी दौरान उनकी पत्नी को भी ब्रेन हैमरेज हो गया, लेकिन वे केवल रात के समय ही अस्पताल जाते थे। वह भी जब दिन की ट्रेनिंग पूरी हो जाती थी।

ऐसी लगन, मेहनत और जच्बे को तो ईश्वर भी सम्मान देते हैं। और हुआ भी ऐसा ही। भारत ने वर्ष 1975 के हॉकी विश्व कप को अपने नाम कर लिया। 12 अगस्त 2018 को लंदन ओलंपिक में जीत की खुशी में चंडीगढ़ प्रेस क्लब में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में हॉकी के नामी गिरामी सितारे शामिल हुए और बलबीर सिंह साहब को विशेष तौर पर सम्मानित किया गया। देश के प्रति उनके प्रेम को देखते हुए पहले तिरंगा फहराया गया और फिर बलबीर सिंह साहब ने उस ऐतिहासिक जीत को याद करते हुए अपना व्याख्यान दिया। उनका संबोधन युवा पीढ़ी को सदा ही प्रेरित करता रहेगा। इतिहास याद रखेगा कि भारत में ऐसे जुनूनी खिलाड़ी भी पैदा हुए जिन्होंने हॉकी के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।

वर्ष 2015 में बलबीर सिंह सीनियर को भारतीय हॉकी फेडरेशन ने लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित करते हुए 30 लाख रुपये का चेक दिया, लेकिन उन्होंने बड़ी विनम्रता से उस चेक को ठुकरा दिया। उन्होंने कहा कि इस राशि का इस्तेमाल भारत में हॉकी के विकास के लिए लगाया जाए। ऐसे संत आज के समाज में कम ही देखने को मिलते हैं। सरदार बलबीर सिंह सीनियर सही मायने में एक योद्धा थे। वह जब तक जिये देश के लिए जिये। अपने जीवन के आखिरी काल तक युवाओं और खिलाड़ियों से बातचीत के दौरान वे सदा उन्हें प्रेरित करते रहे। उनकी इच्छा थी कि भारत एक बार फिर से हॉकी में अपना वर्चस्व स्थापित करे और ओलंपिक में भारत को सोने का तमगा मिले। आज की भारतीय हॉकी टीम उनके इस सपने को अपना लक्ष्य बना ले और भारत के लिए स्वर्ण पदक लेकर आए, यही उनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

[स्वतंत्र टिप्पणीकार]

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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