उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और अखिलेश सरकार में पिछले कुछ दिनों से छिड़े घमासान को लेकर भले ही पटाक्षेप की घोषणा कर दी गई हो और यह समझा दिया गया हो कि पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव का वर्चस्व पुन: स्थापित हो गया है, लेकिन जो कुछ हुआ और हो रहा है कि उससे न केवल सपा, अखिलेश सरकार और पार्टी नेताओं की छवि धूमिल हुई है, वरन उस समाजवादी विचारधारा को भी गंभीर आघात पहुंचा है जो कभी सपा की आधारशिला थी। भारत में समाजवाद की मजबूत परंपरा रही है जिसका वृक्षारोपण आचार्य कृपलानी, जयप्रकाश नारायण और डॉ. राममनोहर लोहिया जैसे समाजवादियों ने किया। कालांतर में उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह, मधु लिमये और जनेश्वर मिश्र से होते हुए मुलायम सिंह यादव तक यह परंपरा पहुंची, लेकिन मुलायम समाजवादी परंपरा को आगे न बढ़ा सके और उसे परिवारवादी और जातिवादी मोड़ दे दिया। यह बात और है कि सपा वंचितों, समाजवादियों और सेकुलरवादियों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करती रही। 4 अक्टूबर 1992 को सपा का जन्म हुआ। उस समय सोवियत संघ में साम्यवाद का अंत वैश्विक पटल पर समाजवादी विचारधारा को चुनौती दे रहा था। विकासशील देशों, खासतौर पर भारत में गरीबों, वंचितों, शोषितों, खेतिहर किसानों और मजदूरों के हितों की रक्षा की जरूरत थी। भारत में ऐसे वर्ग के लिए सपा का अभ्युदय आशा की किरण लेकर आया। डॉ. राम मनोहर लोहिया के सपनों को साकार करने का स्वर्णिम अवसर सपा के पास था, लेकिन सपा उसका लाभ न ले सकी। ऐसे वर्गो की ओर उन्मुख होने के बजाय वह राजनीतिक स्वार्थो में उलझ गई। यह वही समय था जब कांग्रेस से निकले दलित-शोषित-पिछड़े वर्ग के लोग नए राजनीतिक-मंच की तलाश में थे। उन वर्गो के हित समाजवादी विचारधारा के अनुरूप थे। बड़ी आसानी से उनको सपा के खेमे में लाया जा सकता था, लेकिन सपा द्वारा ऐसा न कर पाने के कारण उसमें से दलित खिसक कर कांशीराम और मायावती के साथ चले गए और शेष बिखर गए। आज सपा और उसकी सरकार में जो हो रहा है वह उसी का प्रतिफल है।

सपा में समाजवाद का संभवत: कोई बहुत ही छोटा अंश बचा होगा। समाजवादी नेताओं को देखकर ऐसा लगता है जैसे वे पूंजीवादी व्यवस्था के प्रतिनिधि हों। आज अखिलेश और शिवपाल में जो घमासान छिड़ा है वह किस समाजवाद से परिभाषित होता है? गायत्री प्रजापति जैसे भ्रष्टाचार के प्रतिमानों के प्रति आसक्ति क्यों? मुलायम मौजूदा घटनाक्रम के बाद भले ही विजयी मुद्रा अपनाएं, लेकिन पराजय तो सपा की ही हुई। इसका श्रेय उनको लेना पड़ेगा। शुरू में लगा कि शायद पूरा प्रकरण सपा को सशक्त करने का सुनियोजित प्लान है, पर सपा कमजोर हुई है। मुलायम अखिलेश को मुख्यमंत्री बना कर कभी आश्वस्त नहीं रहे। हमेशा शिवपाल से सशंकित रहे और इसीलिए अखिलेश को बचाने के लिए इस बात का संकेत देते रहे जैसे वह शिवपाल के साथ हों। वह अखिलेश को सार्वजनिक रूप से बार-बार डांटते रहे और कभी उनको स्वतंत्र मुख्यमंत्री के रूप में काम करने नहीं दिया।

जब अखिलेश ने सपा के धब्बों को धोने और उसकी आपराधिक और भ्रष्ट छवि सुधारने का काम शुरू किया तो मुलायम सिंह ही सबसे बड़े रोड़ा बन गए। शायद मुलायम को यह पता नहीं कि अखिलेश के कदम से लोग कितने खुश थे। अखिलेश के विकास कार्यो से सपा की आपराधिक और भ्रष्ट छवि खत्म हो रही थी। इसलिए जब लोगों को लगा कि अखिलेश में वह ताकत आ गई है कि वह विकास के लिए आपराधिक और भ्रष्ट छवि वाले कद्दावर नेताओं पर भी लगाम लगा सकते हैं तो समाज का एक तबका उत्साहित और आशावान हो उनके साथ हो लिया, लेकिन मुलायम सिंह के ‘पैचअप-फॉमरूले’ ने सब खत्म कर दिया। लोगों को अखिलेश से भी निराशा हुई। जिस तरह से उन्होंने ‘पैचअप-फॉमरूले’ को स्वीकारा और शिवपाल एवं प्रजापति की वापसी की उससे उन्होंने जनता की आशा को निराशा में बदल दिया।

सपा का घमासान केवल समाजवाद को ही नुकसान नहीं पहुंचा गया, उसने सपा में विभाजन की संभावना को भी प्रबल कर दिया है। समाजवादियों में विभाजन की लंबी परंपरा रही है। समाजवादी पार्टी, किसान मजदूर प्रजा पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, भारतीय-क्रांति दल, भारतीय लोकदल आदि। यह विभाजन सदैव व्यक्तियों के इर्द-गिर्द होता रहा है, जिसमें डॉ. लोहिया, जॉर्ज फर्नाडीस, चरण सिंह, मुलायम सिंह, अजीत सिंह आदि भाग लेते रहे। विभाजन की इस परंपरा से समाजवादी विचारधारा और समाजवादी पार्टियां दोनों ही कमजोर होती रही हैं। सपा में वर्तमान स्थिति भी उसी की एक कड़ी है जो उसे एक और विभाजन की ओर ले जाएगी। वह विभाजन कब होगा, यह केवल समय बताएगा, लेकिन जिस तरह से सपा में वर्चस्व और सत्ता की लड़ाई सामने आई उससे लगता नहीं कि इसमें बहुत देर होगी। जितनी जल्दी यह हो सके, अखिलेश के लिए उतना ही लाभकारी होगा, क्योंकि उन पर सबसे बड़ा आरोप यही है कि वह परिवार के कारण सुशासन और विकास पर पूरा ध्यान नहीं दे पा रहे हैं। शिवपाल को संगठन में प्रभावी माना जाता है। उनको दरकिनार करना जोखिम भरा लग सकता है, लेकिन यह वैसी ही स्थिति है जैसी इंदिरा गांधी की 1969 में थी जब वह कांग्रेस में संगठन चलाने वाले बड़े नेताओं कामराज, निजलिंगप्पा, मोरारजी, एसके पाटिल आदि के सामने एक ‘गुड़िया’ ही मानी जाती थीं, लेकिन उनको अलग कर इंदिरा ने नई पार्टी कांग्रेस(इंदिरा) बनाई और अंतत: वही असली कांग्रेस बनी। राजनीति में जनता कमजोर नेता को पसंद नहीं करती। मुलायम ने अपने निर्णय थोप कर अखिलेश को कमजोर किया है और इसका खामियाजा उन दोनों को भुगतना पड़ सकता है।

इस कलह में अभी भले यादव वोट न डिगे, लेकिन मुस्लिम मत जरूर छिटकेगा। नई रणनीति के तहत लगभग 80 विधान सभा क्षेत्रों में कांग्रेस की मजबूत दावेदारी मुस्लिमों को एक विकल्प देगी। खाट सभाएं और किसान यात्र से कांग्रेस की ओर कुछ ‘फ्लोटिंग मतदाता’ भी आकर्षित हो सकते हैं जो मुस्लिम मतों को कांग्रेस की ओर और आकर्षित करेंगे। सपा के ओबीसी मतदाता भाजपा की ओर खिसक सकते हैं, क्योंकि न केवल मोदी ओबीसी वर्ग के हैं वरन भाजपा ओबीसी को रिझाने का गंभीर प्रयास कर रही है जिसमें प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य और बसपा से निष्कासित नेता स्वामी प्रसाद मौर्य (दोनों अति-पिछड़े वर्ग के) प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं। यदि आगामी चुनाव में सपा हारी, तो उसी की आड़ में संभवत: पार्टी में विभाजन हो जाए।

[लेखक डॉ एके सिंह, सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड पॉलिटिक्स के निदेशक हैं]

Posted By: Sanjeev Tiwari

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