डा. फैयाज अहमद फैजी। पिछले दिनों सऊदी अरब सरकार के इस्लामी मामले को देखने वाले मंत्रालय ने तब्लीगी जमात की गतिविधियों को अपने देश में पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया। यह वही संगठन है, जिसने भारत में कोरोना महामारी की पहली लहर के दौरान लाकडाउन नियमों की अवहेलना कर सम्मेलन किया था। इसके चलते तब्लीगी जमात को देश भर से कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा था।

ईरान सहित कई देश भी जमातका काम कर चुके प्रतिबंधित

तब्लीगी जमात पर प्रतिबंध कोई पहली बार नहीं लगा है। ईरान और कुछ अन्य देशों में भी जमात का काम प्रतिबंधित है। वहां दूसरे नाम से दावत का काम होता है। तब्लीगी जमात के लोग अपने क्रियाकलाप को दावत कहते हैं। इस्लाम की दावत देना यानी इस्लाम की ओर बुलाना। तब्लीगी जमात को अहबाब के नाम से भी जाना जाता है।

जब भारत में अंग्रेजों के आने के बाद मुस्लिम शासकों का पराभव होने लगा तो अशराफ वर्ग के मुसलमानों ने अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए शुरू में सशस्त्र आंदोलनों का सहारा लिया, किंतु अपेक्षित सफलता नहीं मिली। ऐसी स्थिति में मुस्लिम सांप्रदायिकता की रूपरेखा तैयार की गई। एक ओर हिंदू समाज को साधने का प्रयास किया गया तो दूसरी ओर भारतीय मूल के मतांतरित मुसलमानों को इस्लाम के नाम पर मोहरा बनाने की प्रक्रिया शुरू की गई। इसके लिए धार्मिक शिक्षण संस्थानों (मदरसों) और इस्लामी धार्मिक संगठनों को बढ़ावा दिया गया। इन इस्लामी संगठनों में प्रमुख रूप से तब्लीगी जमात और जमात ए इस्लामी का नाम आता है।

सौ वर्ष पहले हुआ था तब्लीगी जमात का उद्भव

आज से लगभग सौ वर्ष पहले मेवात में मौलाना इलियास के नेतृत्व में तब्लीगी जमात का उद्भव हुआ था। शुरू में मेवात के रहने वाले विशेष रूप से मेव जनजाति के लोगों के बीच इसकी सक्रियता रही। मौलाना इलियास का एक उद्देश्य यह भी था कि इन मेव मुसलमानों को भारतीय सभ्यता-संस्कृति से दूर कर इस्लाम के नाम पर अरबी/ईरानी सभ्यता-संस्कृति में ढाला जाए। धीरे-धीरे जमात का प्रभाव बढ़ने लगा। फिर दिल्ली में निजामुद्दीन बस्ती की एक मस्जिद में इसका केंद्र स्थापित किया गया, जो आज भी पूरी दुनिया में तब्लीगी जमात के मरकज यानी केंद्र के रूप में जाना जाता है।

तब्लीगी जमात में कुछ लोग दल (जमात) बनाकर एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाते हैं। लोगों से मिलकर इस्लाम की बुनियादी बात करके उन्हें जमात से जुड़ने की दावत देते हैं। आज यह पूरे भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण एशिया के देशों से होती हुई अरब देशों और यूरोप-अमेरिका तक फैल गई है। वैसे तो जमात का दावा पूरी दुनिया के मुसलमानों को सच्चा मुसलमान बनाने का है, पर देखा जाए तो इस्लाम और मुसलमानों के नाम पर चलने वाले अन्य भारतीय संगठनों की तरह इसका भी मुख्य उद्देश्य इस्लाम के नाम पर भारतीय मूल के मुसलमानों का अशराफीकरण ही है। इसका नेतृत्व भी अशराफ वर्ग के पास है और उसमें भी एक विशेष परिवार के हाथों में।

प्रो. मसूद आलम फलाही ने अपनी किताब में लिखा है कि जब दूसरे अमीर मौलाना यूसुफ (मौलाना इलियास के पुत्र) के देहांत के बाद मौलाना रहमतुल्लाह मेरठी को जमात का अमीर बनाया गया तो हंगामा मच गया। कहा जाने लगा कि एक पसमांदा यानी पिछड़ा कैसे जमात का अमीर हो सकता है। मौलाना रहमतुल्लाह मेरठी पसमांदा तेली जाति से थे। फिर मौलाना इलियास के भतीजे मौलाना जकरिया ने अपने एक ख्वाब का हवाला देकर मौलाना रहमतुल्लाह मेरठी को हटाकर अपने दामाद मौलाना इनामुल हसन को अमीर बना दिया।

कुछ वर्ष पूर्व जमात के अमीर के पद को लेकर मौलाना इलियास के पड़पोते मौलाना साद और मौलाना इनामुल हसन के पोते मौलाना जुहैर में संघर्ष हुआ। फिर जमात का विभाजन हो गया। एक गुट के अमीर मौलाना जुहैर और दूसरे गुट के अमीर मौलाना साद हुए। तब्लीगी जमात की किताब फजायले अमाल को जमात प्रवास के दौरान और घरों में प्रतिदिन पढ़ने का नियम है। इस किताब में ऐसी बहुत सी बातें लिखी हैं, जो मुस्लिमों में नस्लवाद और जातिवाद को बढ़ावा देती हैं।

पूरी दुनिया में इसे जमात का मुखपत्र माना जाता है, लेकिन अरब देशों में इसकी जगह हिकायतुस्सहाबा (मुहम्मद के साथियों की कथाएं) पढ़ने की परंपरा है। यह भी एक तरह की कूटनीति ही जान पड़ती है। भारत में एक बड़ी संख्या जमात के नाम पर मस्जिदों में महीनों प्रवास करती है। तब्लीगी जमात खुद को एक गैर सियासी संस्था बताता है। वह खुद को सिर्फ धार्मिक क्रियाकलापों यथा नमाज, रोजा आदि तक सीमित रखने का दावा करता है। ऊपरी तौर पर इसमें कोई आपत्तिजनक बात नहीं दिखती, लेकिन इन सब क्रियाकलापों और उनसे संबंधित व्याख्यानों से एक खास वैचारिकी तैयार होती है।

यह मुस्लिम नौजवानों को सांसारिक जीवन से विमुख कर देती है और मरने के बाद सफल होने के मायाजाल में उलझा देती है। जमात उनके भीतर मध्ययुगीन मानसिकता को बढ़ावा देती है। वह कहीं न कहीं मुस्लिम नौजवानों को मुख्यधारा में शामिल होने से रोकती है। इसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव पसमांदा मुस्लिम नौजवानों पर पड़ता है, जो अपनी तरक्की की बात भूलकर पूरी दुनिया में इस्लामी हुकूमत कायम होने के दिवास्वप्न में खोए रहते हैं। जब मैं तब्लीगी जमात में था तो हमें सिखाया जाता था कि हमारी कामयाबी आगे जाने में नहीं, बल्कि पीछे जाने में है। यहां तक कि हम सहाबा (मुहम्मद के साथियों) के दौर तक पहुंच जाएं। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में ऐसी संस्थाएं, जो किसी धर्म विशेष के नाम पर एक बड़ी आबादी को मध्ययुगीन मानसिकता को ओर धकेलने में लगी हों, अगर उन्हें प्रतिबंधित न भी किया जाए तो भी कम से कम उन पर सरकारी नियंत्रण और कड़ी निगरानी तो होनी ही चाहिए।

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं)

Edited By: Pooja Singh

जागरण फॉलो करें और रहे हर खबर से अपडेट