अमित मालवीय। 9 नवंबर, 2019 का दिन इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा सर्वसम्मति से दिए गए निर्णय के बाद श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो चुका है। साथ ही भाजपा शासित केंद्र एवं उत्तर प्रदेश सरकार ने यह भी सुनिश्चित करके दिखा दिया कि भारत में अब नफरत एवं हिंसा के लिए जगह नहीं है। निर्णय को लेकर एक विशेष वर्ग जरूर कुछ आशंकाएं जता रहा था, लेकिन देशभर में एक भी अप्रिय घटना नहीं हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर गृह मंत्री अमित शाह और भारतीय जनता पार्टी ने यह सुनिश्चित किया कि देश में प्रेम, सद्भाव एवं सौहार्द का एक नया अध्याय लिखा जाए जो फलीभूत भी हुआ है।

साक्ष्यों के आधार पर सुनाया फैसला 

मेरा मानना है कि यह निर्णय भले ही सुप्रीम कोर्ट ने साक्ष्यों के आधार पर दिया है, लेकिन केंद्र सरकार एवं भाजपा द्वारा सुख-शांति एवं सौहार्द के लिए किए गए प्रयास सबका साथ-सबका विकास-सबका विश्वास के मंत्र को ही प्रतिष्ठित करने वाले हैं। भाजपा ने हमेशा से श्रीराम जन्मभूमि के लिए संघर्ष किया, लेकिन यह कभी नहीं चाहा कि देश में सौहार्द का माहौल बिगड़े। भाजपा ने देश की सांस्कृतिक प्रतिष्ठा, वैभव और सम्मान के लिए हमेशा लड़ाई लड़ी है। यह देश की सांस्कृतिक धरोहर में भाजपा की अटूट प्रतिबद्धता ही थी कि श्रीराम मंदिर के मामले में भी देश में जब सभी पार्टियां तुष्टीकरण की राजनीति कर रही थीं, भाजपा ने इसे राजनीतिक मुद्दा बनाकर अपने प्रस्ताव में शामिल किया था। जून, 1989 में हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में अटल बिहारी वाजपेयी की अध्यक्षता में बुलाई गई पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में श्रीराम मंदिर निर्माण पर प्रस्ताव पारित किया गया था। उसके बाद 1989 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा ने अपने घोषणा पत्र की प्रस्तावना में संकल्प रखा कि सोमनाथ मंदिर की तर्ज पर श्रीराम मंदिर का निर्माण होना चाहिए।

राम मंदिर बनाने का एलान 

संत समाज एवं विभिन्न संगठन जब राम मंदिर की लड़ाई लड़ रहे थे, तब अटल जी और लालकृष्ण आडवाणी जी के नेतृत्व में भाजपा ने ही यह एलान किया था कि राम मंदिर बनकर रहेगा। भाजपा का यह संकल्प हरिद्वार में आयोजित हुई साधु-संतों की बैठक में और सशक्त हो गया जब निर्णय किया गया कि 30 अक्टूबर, 1990 को श्रीराम मंदिर के निर्माण के लिए कारसेवा शुरू की जाएगी। भाजपा ने इस आंदोलन को पूरा समर्थन दे दिया। उसके बाद 25 सितंबर, 1990 को तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष आडवाणी जी ने राम रथ यात्र शुरू करके भाजपा की राम के प्रति प्रतिबद्धता को दुनिया के समक्ष मजबूती से स्थापित कर दिया। मोदी जी उस यात्र में आडवाणी जी के साथ एक प्रतिबद्ध कार्यकर्ता की तरह डटे रहे और इससे अद्भुद संयोग क्या होगा कि अब जब सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है तो मोदी जी ही देश के प्रधानमंत्री हैं।

अघोषित आपातकाल

उस राम रथ यात्र से नाखुश केंद्र की तब की कांग्रेस सरकार ने देश में अघोषित आपातकाल लगा दिया था। बिहार के समस्तीपुर में आडवाणी जी को गिरफ्तार कर लिया गया। उसके बाद एक-एक करके भाजपा के शीर्ष नेताओं एवं हजारों कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बावजूद यात्र जारी रही। कार सेवा अयोध्या पहुंची तो उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की तब की सपा सरकार ने भी उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई करनी शुरू कर दी। लाखों कारसेवकों को गिरफ्तार किया गया। 72 घंटे के भीतर दो बार गोलियां चलवाकर करीब 50 कारसेवकों को मौत के घाट उतार दिया गया। इसके बावजूद रामभक्त अयोध्या पहुंचे, जन्मभूमि से कुछ दूरी पर ध्वज फहराया गया और 10 नवंबर को शिलान्यास का कार्यक्रम पूरा हुआ। इसके बाद 29 नवंबर, 1992 को आडवाणी जी समेत प्रमुख भाजपा नेताओं ने कारसेवा का आह्वान किया।

पुख्ता दस्तावेज की जरूरत

जब यह प्रतीत होने लगा कि श्रीराम जन्मभूमि के लिए हो रहे संघर्ष पर एक पुख्ता दस्तावेज की जरूरत है तो 1993 में भाजपा ने अयोध्या एवं श्रीराम मंदिर आंदोलन पर एक श्वेत पत्र प्रकाशित किया और श्रीराम को एकात्मता एवं एकता की प्रतिमूर्त के रूप में वर्णित करते हुए प्रस्तावना में सरकार के शासन को रामराज जैसा होने की अपनी प्रतिबद्धता एक बार फिर स्पष्ट कर दी। 1996 और 1998 में हुए लोकसभा चुनावों में भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण की अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की।

राम मंदिर निर्माण के लिए प्रतिबद्धता

2004 और 2009 के दृष्टि पत्र में भाजपा ने फिर श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए प्रतिबद्धता दोहराई। इस दौरान 2010 में हाईकोर्ट ने फैसला सुना दिया। हालांकि वह जनांकाक्षाओं के अनुकूल नहीं था। सभी पक्ष फैसले से असंतुष्ट थे और सुप्रीम कोर्ट चले गए। कई विशेषज्ञों ने घोषणा की कि इस मामले का हल कभी नहीं निकलेगा, लेकिन वे शायद यह नहीं जानते थे कि 2014 से भारतीय राजनीति में एक नया कालखंड शुरू होने वाला है। जनभावनाओं के अनुरूप भाजपा ने चुनाव के घोषणापत्र में संकल्प दोहराते हुए कहा, ‘संविधान के दायरे में सभी संभावनाओं के तहत अयोध्या में भव्य मंदिर निर्माण के लिए प्रयास किया जाएगा।’ भाजपा की प्रचंड विजय हुई और नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने। उसके बाद उच्चतम न्यायालय में मामले की सुनवाई में तेजी आए, इसके लिए भी ठोस प्रयास शुरू हुए।

14,000 पृष्ठों का अंग्रेजी में अनुवाद

15 साल बाद उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद अगस्त, 2017 में सरकार के आग्रह पर उच्चतम न्यायालय ने मामले पर ध्यान देना शुरू किया। न्यायालय ने कहा कि मामले से संबंधित हिंदी , संस्कृत, फारसी, उर्दू एवं फ्रेंच भाषाओं के दस्तावेजों का अंग्रेजी में अनुवाद होना आवश्यक है और उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार ने मात्र 4 महीने में लगभग 14,000 पृष्ठों का अंग्रेजी में अनुवाद करके दे दिया। अंतत: 9 नवंबर को उच्चतम न्यायालय ने सर्वसम्मति से फैसला रामलला विराजमान के पक्ष में सुना दिया। यह फैसला ऐतिहासिक है। यह भारत की, भारत की अद्भुत संस्कृति और न्याय व्यवस्था की विजय है। शांति, सौहार्द और आपसी समन्वय के साथ श्रीराम जन्मभूमि का समाधान हो, यही भाजपा चाहती थी। मेरा मानना है कि उच्चतम न्यायालय का फैसला राष्ट्रीयता के प्रतीकों के प्रति सम्मान और हमारी संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन का बोध हमेशा कराता रहेगा।

(लेखक भाजपा की आईटी सेल के राष्ट्रीय प्रमुख हैं)

Posted By: Kamal Verma

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