प्रणय कुमार। शिक्षा किसी भी समाज एवं राष्ट्र की रीढ़ होती है। उसी पर राष्ट्र और उसकी भावी पीढ़ियों का भविष्य निर्भर करता है। शिक्षा ही राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक मूल्यबोध विकसित करने में सक्षम है। उसके माध्यम से ऐसा किया भी जाना चाहिए। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी दुर्भाग्य से शिक्षातंत्र पर वामपंथी, छद्म पंथनिरपेक्षतावादी एवं मैकाले प्रेरित मानसिकता ही हावी रही है। इतनी कि आज भी उनका विषवमन शैक्षिक-सामाजिक परिवेश को न केवल विषाक्त बनाता है, अपितु विभाजन रेखाओं को और चौड़ा कर जाता है। उन्होंने बड़ी कुशलता एवं कुटिलता से युवा पीढ़ियों को अपनी जड़ों-परंपराओं, जीवन मूल्यों और मान बिंदुओं से पृथक करने का बौद्धिक षड्यंत्र किया है।

शिक्षा का अभारतीयकरण

शिक्षा का अभारतीयकरण ही भारत की अधिकांश समस्याओं का मूल और भारतीयकरण ही एकमात्र निवारण है। अपेक्षा थी कि 2014 में सत्ता-केंद्र बदलने के बाद शिक्षा के भारतीयकरण की दिशा में ठोस एवं निर्णायक पहल और प्रयास किए जाएंगे, परंतु देश के निष्पक्ष शिक्षाविद एवं आम प्रबुद्ध जन भी अब कुछ दबी जुबान से यह स्वीकार करने लगे हैं कि नई शिक्षा नीति के तमाम दावों के बावजूद शिक्षा को संचालित करने वाली प्रमुख संस्थाओं यानी सीबीएसई-एनसीईआरटी-यूजीसी आदि की रीति-नीति, कार्यसंस्कृति में गुणवत्ता, उद्देश्य, पाठ्य-सामग्री, प्रभाव एवं परिणाम के स्तर पर कोई व्यापक बदलाव अब तक नहीं लाया जा सका है।

हाल में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की कक्षा बारह की परीक्षा में समाजशास्त्र विषय में आपत्तिजनक प्रश्न पूछा गया कि ‘वर्ष 2002 में गुजरात में बड़े पैमाने पर मुस्लिम विरोधी हिंसा किस सरकार के कार्यकाल में हुई?’ उससे यही पुष्टि होती है कि पूर्व की तरह आज भी निहित स्वार्थो एवं वैचारिक दुराग्रहों से बंधे वामपंथी बुद्धिजीवी, अवसरवादी नौकरशाह आदि ही शिक्षा की रीति-नीति एवं दिशा-दशा तय कर रहे हैं।

शिक्षा के भारतीयकरण के इससे अधिक गंभीर प्रयास तो 1998 से 2004 के दौरान राजग की गठबंधन सरकार में किए गए। ऐसा नहीं है कि सीबीएसई की यह चूक केवल प्रश्नपत्र के स्तर पर है। उनका दायरा काफी बड़ा है। इसीलिए केवल समाजशास्त्र ही नहीं, अपितु सभी कक्षाओं की सामाजिक विज्ञान, हिंदी, अंग्रेजी, इतिहास आदि की पाठ्यपुस्तकों में पाठ्यक्रम के स्तर पर व्यापक परिवर्तन आवश्यक हैं। वे नितांत नीरस और भारतीय मानस के प्रतिकूल तथा सामयिक आवश्यकताओं की पूर्ति में असमर्थ हैं।

एक ओर वर्गीय एवं क्षेत्रीय चेतना तथा भिन्न-भिन्न अस्मिताओं को उभारने की दृष्टि से पाठ्यक्रमों में चुन-चुनकर ऐसी-ऐसी विषयवस्तु डाली गई है, जो राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता के मार्ग में एक बड़ी बाधा है तो दूसरी ओर पंथ-मजहब-संप्रदाय-रिलीजन को धर्म का पर्याय मान भारत को विविधतापूर्ण संस्कृति वाला बहुसांस्कृतिक देश बताया गया है। मिली-जुली संस्कृति एक ऐसा झूठ है, जिसे वामपंथी इतिहासकारों-शिक्षाविदों द्वारा बार-बार जुमले के रूप में उछाला-भुनाया जाता है। जानबूझकर इस सत्य की घोर उपेक्षा की जाती है कि विविधता में एकता देखने वाली भारत की संस्कृति एक है, जिसे पूरा विश्व प्राचीन काल से सनातन संस्कृति, हिंदू संस्कृति या भारतीय संस्कृति के नाम से जानता-पहचानता है।

सच यही है कि पूजा-पद्धति या पुरखे बदलने से संस्कृति नहीं बदलती। बहरहाल, सीबीएसई ने जिसे एक भूल बताकर पल्ला झाड़ा है, उसकी आंखें खोलने के लिए एनसीईआरटी की कक्षा बारह की समाजशास्त्र की पाठ्य-पुस्तक के ‘सांस्कृतिक विविधता की चुनौतियां’ नामक अध्याय का दृष्टांत ही पर्याप्त होगा, जहां से यह प्रश्न बनाया गया है। उक्त पुस्तक में उल्लिखित है कि ‘कोई भी क्षेत्र सांप्रदायिक हिंसा से अछूता नहीं रह पाया। सभी समुदायों को कभी-न-कभी कम या ज्यादा इस तरह की हिंसा का सामना करना पड़ा है।

अल्पसंख्यक समुदाय इससे ज्यादा ही प्रभावित होता रहा है। इस मामले में शासन करने वाली राजनीतिक पार्टी को एकदम से अलग नहीं रखा जा सकता।’ घोर आश्चर्य है कि ‘क्रिया की प्रतिक्रिया’ का तो इसमें विवरण है, परंतु बड़ी कुटिलता से उसमें गोधरा में अकारण जलाकर मारे गए निहत्थे-निदरेष कारसेवकों का कोई उल्लेख नहीं है। यह दोहरी मानसिकता नहीं तो और क्या है कि एक ओर ये छद्म पंथनिरपेक्षतावादी कथित गंगा-जमुनी तहजीब के नाम पर इस्लामिक आक्रांताओं एवं शासकों द्वारा किए गए तमाम नरसंहारों एवं मंदिरों-पुस्तकालयों के विध्वंस की अनदेखी करते हैं और दूसरी ओर दंगे जैसी हिंसक घटनाओं की निष्पक्ष आलोचना न कर सोची-समझी रणनीति के अंतर्गत अल्पसंख्यकों को पीड़ित एवं बहुसंख्यकों को उत्पीड़क दिखाते हैं।

कुछ दिन पूर्व भी एनसीईआरटी को शिक्षा में व्याप्त लैंगिक असमानता को दूर करने के नाम पर ट्रांसजेंडर बच्चों के लिए लाई गई सामग्री-नियमावली पर सफाई देनी पड़ी थी। इस पर विवाद और विरोध इतना बढ़ा कि शिक्षकों एवं प्रशासकों को प्रशिक्षित करने के लिए लाए गए मैनुअल को उसे वेबसाइट से हटाना पड़ा। वस्तुत: एनसीईआरटी, सीबीएसई या अन्य शैक्षिक संस्थाओं को ऐसी असहज स्थितियों का सामना इसलिए करना पड़ रहा है, क्योंकि सत्ता बदलते ही पाला बदलने की कला में सिद्धहस्त कलाबाज आज भी तंत्र और संस्थाओं में गहरी पैठ बनाए हुए हैं।

शिक्षा मंत्रलय सात वर्षो बाद भी भारत एवं भारतीयता की गहरी समझ रखने वाले योग्य विशेषज्ञों को विभिन्न समितियों-आयोगों से जोड़ नहीं पाया है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज भी पश्चिमीकरण को ही प्रगति एवं आधुनिकता का एकमात्र पैमाना माना-समझा जा रहा है, जबकि आज आवश्यकता इसकी अधिक है कि जो अपना है, उसे युगानुकूल और जो बाहर का है, उसे देशानुकूल बनाकर आत्मसात किया जाए।

(लेखक शिक्षाविद् हैं)

Edited By: Pooja Singh

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