नई दिल्ली [ केनेथ जस्टर ]। अमेरिका-भारत के बीच रणनीतिक साझेदारी अन्य अंतरराष्ट्रीय संबंधों की तरह ही महत्वपूर्ण है। हमारी रणनीतिक साझेदारी की रूपरेखा दोनों देशों को मजबूत बनाने और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में लाभदायक प्रभाव के लिए बनाई गई है। गत 17 वर्षों में हमने रणनीतिक भागीदारी के लिए मजबूत नींव रखी है, जिसका महत्वपूर्ण और सकारात्मक प्रभाव 21वीं सदी में और मजबूत हो सकता है। यह समय इस नींव पर उदार, लेकिन उद्देश्यात्मक तरीके से निर्माण करने का है। हमें अपने बढ़ते दुखों से आगे बढ़ना होगा और इस क्षेत्र के लिए स्थाई संरचना को आकार देने में मदद करनी होगी। हमें यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि भारत-अमेरिका रणनीतिक भागीदारी एक मजबूत भागीदारी है। लंबे समय से मुक्त, सुरक्षित और खुले हिंद-प्रशांत की अमेरिकी प्रतिबद्धता ने हम सभी के लिए इस क्षेत्र के स्थायित्व और उल्लेखनीय प्रगति को आधार प्रदान किया है। अमेरिका इस क्षेत्र के विकास के प्रति प्रतिबद्ध रहेगा, क्योंकि हम कानून-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था हैं, हमारा भविष्य इसके साथ अटूट रूप से जुड़ा है। इस उद्यम में हम अपने साथ भारत के नेतृत्व का स्वागत करते हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन के शब्दों में, ‘हमें अपने भागीदारों में पूर्ण भरोसा है और हम क्षेत्रीय संरचना के लिए अपने समान विचार वाले देशों के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करने के लिए कार्य कर रहे हैं कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति, स्थायित्व और समृद्धि बढ़े, न कि विकृत आर्थिक नीति।

‘अमेरिका फर्स्ट’ और ‘मेक इन इंडिया’ विरोधाभासी नहीं हैं

दरअसल रक्षा क्षेत्र और आतंकवाद से लड़ाई में सहयोग हमारी साझेदारी का मुख्य स्तंभ रहा है। जटिल रक्षा प्रणालियों के लिए उपकरणों के उत्पादन में अमेरिकी रक्षा कंपनियों ने पहले ही भारत में निवेश किया है। हम भारत की स्वदेशी रक्षा क्षमताओं के निर्माण में सहायता के इच्छुक हैं। इसके साथ ही हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बड़े रक्षा साझेदार के रूप में हम दोनों देशों की सेनाओं के बीच आपसी मेलजोल को बढ़वा देना चाहते हैं। हमें इसी रणनीति को हमारे आर्थिक संबंध में भी अपनाना चाहिए, जो कि हमने अपने रक्षा संबंधों पर लागू किया है। हाल ही में कई अमेरिकी कंपनियों ने चीनी क्षेत्र में व्यापार करने में बढ़ती कठिनाइयों की जानकारी दी है। बहरहाल वहां कुछ कंपनियां अपने संचालन को कम कर रही हैं, जबकि अन्य कंपनियां वैकल्पिक बाजारों की तलाश कर रही हैं। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी उद्यमों का वैकल्पिक केंद्र बनने के लिए भारत व्यापार और निवेश के माध्यम से रणनीतिक अवसरों को प्राप्त कर सकता है। स्वतंत्र और निष्पक्ष व्यापार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भारत के सतत दीर्घकालिक विकास के प्रयास को बढ़वा तथा सहयोग प्रदान करेगा। इसके अलावा ‘अमेरिका फर्स्ट’ और ‘मेक इन इंडिया’ विरोधाभासी नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे के बाजारों में निवेश, आर्थिक आदान-प्रदान, व्यापार की मात्रा, उभरती प्रौद्योगिकियों में सहयोग का मार्गदर्शन और दोनों देशों में रोजगार में वृद्धि करेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पहले ही शुरू किए गए आर्थिक व नियामक सुधारों में तेजी यह सुनिश्चित करने में मदद करेगी कि भारत में कुशलता, पारदर्शिता बढ़ रही है और यहां सुव्यवस्थित बाजार है। साथ ही यहां विकास एवं उन्नति को और अधिक प्रोत्साहन दिया जा रहा है। जारी सुधार और व्यापार उदारीकरण भारतीय उत्पादकों को अधिक आसानी से वैश्विक आपूर्ति शृंखला का हिस्सा बनने के भी योग्य बनाएंगे। इसके फलस्वरूप यहां तेजी से रोजगार पैदा होंगे।

अमेरिका का प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत के साथ व्यापक संबंध

द्विपक्षीय आर्थिक संबंध और भारत को अमेरिकी उद्यमों के लिए क्षेत्रीय केंद्र बनाने के कई फायदे हैं। हमने हाल में हैदराबाद के वैश्विक उद्यमिता शिखर सम्मेलन में महत्वपूर्ण और सकारात्मक प्रभाव देखे, जो कि देश की अर्थव्यवस्था के नवोन्मेष के लिए योग्य वातावरण है। अमेरिका उद्यमिता और नवोन्मेष का अगुआ है और आज उसका प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत के साथ पहले से व्यापक संबंध हैं। अमेरिकी व्यापार और निवेश के लिए भारत के बाजारों के खुलने से बहुत सी उभरतीय प्रौद्योगिकियों पर हमारे सहयोग को प्रोत्साहन मिलेगा, जिससे हमारी अर्थव्यवस्था को संरक्षण मिलेगा। इसमें आधुनिक उत्पादन और साइबर सुरक्षा शामिल हैं।

भारत में 100 स्मार्ट शहर बनाने की नई तकनीक अमेरिकी कंपनियों के पास है

अमेरिकी व्यापार और निवेश एक मजबूत बौद्धिक संपदा संरक्षण वातावरण से संबद्ध है, यह पूंजी और बौद्धिक ज्ञान को साझा करने के बढ़ते प्रवाह को प्रोत्साहित करेगा। हालांकि इसके लिए प्रौद्योगिकीय रूपांतरण को लगातार उन्नत बनाने की जरूरत होती है। ऐसा तब होता है जब देश अंतरराष्ट्रीय आर्थिक और डाटा के अबाध प्रवाह में शामिल होते हैं। अमेरिकी वस्तुओं और सेवाओं के लिए बढ़ता खुलापन तथा अमेरिकी कंपनियों की विस्तारित उपस्थिति बेहतर ढांचे एवं समग्र संपर्क में निजी क्षेत्र के निवेश को प्रोत्साहित करेगा। उदाहरण के रूप में अमेरिकी कंपनियों के पास नई तकनीक हैं, जो भारत के देशभर में 100 स्मार्ट शहर बनाने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को प्राप्त करने में सहयोग कर सकती हैं।

ऊर्जा के क्षेत्र में अमेरिका ने भारत को भागीदार बनाया

सहयोग का एक और क्षेत्र है ऊर्जा। अमेरिका भारत को व्यापक ऊर्जा भागीदारी पेशकश करने की विशेष स्थिति में है। इसमें ऊर्जा का हर रूप शामिल है- कोयला, कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस और परमाणु ऊर्जा के साथ-साथ प्रौद्योगिकी संबंधी स्वच्छ जीवाश्म ईंधन, स्मार्ट ग्रिडें, ऊर्जा भंडारण और नवीकरणीय संसाधन। गत वर्ष अमेरिका ने भारत को कच्चे तेल की अपनी पहली बड़ी खेप भेजी है। अमेरिका सेवाओं, बुनियादी ढांचे और प्रौद्योगिकी में भी सहयोग कर सकता है, जो कि ऊर्जा और ऊर्जा सुरक्षा को उन्नत करने वाले घरेलू स्नोतों को और अधिक विकसित करने के लिए भारत के प्रयासों के लिए आवश्यक है। हमारे आर्थिक संबंधों में जोरदार बढ़ोतरी निश्चित रूप से व्यापक और गहरी दीर्घकालिक अमेरिकी प्रतिबद्धता के साथ अमेरिका-भारत रिश्ते में अधिक स्थायित्व प्रदान करेगी। यह हमारे बढ़ते रक्षा और आतंकवादरोधी भागीदारी का पूरक होगा और यह इसके मार्ग में पैदा होने वाले किसी भी नीतिगत मतभेदों को नियंत्रित करता है।

अमेरिका-भारत की साझेदारी की शक्ति स्थिरता है

आज की अस्थिर दुनिया में अमेरिका-भारत की साझेदारी की शक्ति स्थिरता है-यह हमेशा बरकरार रहनी चाहिए। हालांकि भारत और अमेरिका दोनों अपनी स्वतंत्रता और संप्रभुता को पोषित कर रहे हैं। कुल मिलाकर हमारी भागीदारी का असली मूल्य यह है कि यह प्रत्येक को वैश्विक मामलों को सकारात्मक रूप से प्रभावित करने और हमारे लोगों की सुरक्षा तथा समृद्धि के लिए सबसे बड़ी आकांक्षाओं को प्राप्त करने में सक्षम बना सके।

[ लेखक भारत में अमेरिका के राजदूत हैं ]

Posted By: Bhupendra Singh