सौरभ जैन। हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013 में संशोधन किए जाने का प्रस्ताव किया गया है। इस प्रस्तावित संशोधन में सीवरों और सेप्टिक टैंकों की मशीनीकृत सफाई को अनिवार्य करने का प्रावधान शामिल है। दरअसल सीवर और सैप्टिक टैंकों का अब तक मैनुअल तरीके से ही सफाई किए जाने के कारण बड़ी संख्या में जनहानि हो रही है।

केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रलय द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले पांच वर्षो के दौरान देश में हाथ से मैला ढोने के कारण 376 लोगों की मृत्यु हुई है। वर्ष 2018 में इस कारण से होने वाली मौतों के 68 मामले सामने आए, जबकि वर्ष 2019 में ऐसे मामलों की संख्या बढ़कर 110 तक पहुंच गई। यह संख्या निश्चित रूप से और अधिक होगी, क्योंकि ऐसे अनेक मामले दर्ज नहीं हो पाते हैं। ऐसे में सीवर में सफाई कर्मियों की हो रही मौतें कानून में संशोधन की एक अनिवार्य आवश्यकता थी।

केंद्र सरकार द्वारा लिए गए दो बड़े फैसलों के परिणाम यदि आशा के अनुरूप आए तो मैला ढुलाई की समस्या के समाधान में यह निर्णय कारगर सिद्ध हो सकता है। एक ओर सामाजिक न्याय अधिकारिता मंत्रलय मशीन से सीवर की सफाई को अनिवार्य बनाने वाला है, तो वहीं दूसरी ओर शहरी विकास मामलों के मंत्रलय ने सफाई मित्र सुरक्षा चैलेंज शुरू किया है, ताकि किसी भी व्यक्ति को सीवर या सेप्टिक टैंक में प्रवेश ही नहीं करना पड़े। बीते 19 नवंबर को विश्व शौचालय दिवस के अवसर पर 243 प्रमुख शहरों के बीच सफाई मित्र सुरक्षा चैलेंज का शुभारंभ किया जा चुका है।

समस्या की गंभीरता : पिछले साल ही बनी एक फिल्म आर्टकिल-15 के एक दृश्य में एक सफाईकर्मी सीवर लाइन में सफाई करके बाहर निकलता हुआ दिखाया गया है। फिल्म का यह दृश्य देखकर ही नाक-भौं सिकुड़ जाती है। रील लाइफ में जब कभी रियल लाइफ पर बात होती है तब ऐसा ही होता है। सच आंखों को चुभता है, देश की अधिकांश आबादी अपनी आंखों के सामने हकीकत में किसी इंसान को मैले से सना बदन लिए सीवर लाइन से बाहर निकलते देख नहीं सकती, लेकिन वे लोग तो सदियों से इसे ढो रहे हैं। आजादी के सात दशकों के बाद भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रत्मक गणराज्य बनाने जैसी प्रस्तावना वाले संविधान, जिसमें समानता की बातें तो कहीं गई है, लेकिन यह लक्ष्य हमेशा ही दूर का एक स्वप्न प्रतीत होता दिखता रहा है। परंतु वर्तमान सरकार ने इस समस्या की गंभीरता को समझा है और इस दिशा में आवश्यक कदम उठाने की पहल की है।

समाधान के पूर्व प्रयास : इस समस्या पर चर्चा का एक लंबा इतिहास रहा है। इसके समाधान हेतु पूर्व में भी अनेक प्रयास किए जा चुके हैं। वर्ष 1955 के नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम 1955 के द्वारा अस्पृश्यता पर आधारित मैला ढुलाई जैसी कुप्रथाओं के उन्मूलन का प्रयास किया गया था। वर्ष 1956 में काका कालेलकर आयोग ने शौचालयों की सफाई में मशीनीकरण की आवश्यकता को रेखांकित किया था। जिस मशीनीकरण का संशोधन आज के कानून में किया जा रहा है, उसकी कल्पना आज से छह दशक पूर्व की जा चुकी है, किंतु कल्पना को वास्तविकता तक आने में इतना समय लग गया। वर्ष 1957 में मलकानी समिति तथा वर्ष 1968 में पंड्या समिति द्वारा भारत में मैनुअल स्कैवेंजिंग की सेवा शर्तो को विनियमित किया गया।

वर्ष 1993 में मैनुअल स्कैवेंजर्स का रोजगार और शुष्क शौचालय का निर्माण (निषेध) अधिनियम 1993 के द्वारा देश में हाथ से मैला ढोने की प्रथा को प्रतिबंधित कर दिया गया तथा ऐसे मामलों में एक वर्ष तक के कारावास और जुर्माने का प्रावधान किया गया। इतना ही नहीं, यह अधिनियम देश में शुष्क शौचालयों के निर्माण को भी प्रतिबंधित करता है। जिस तरह समय-समय पर समाधान के कानूनी प्रयास किए जा रहे थे, इस दृष्टि से हाथ से मैला ढुलाई वाली प्रथा का अंत हो जाना चाहिए था, किंतु कानून निर्माण के बावजूद यह प्रथा जारी रही। वर्ष 2013 में मैनुअल स्कैवेंजर्स के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम 2013 के द्वारा मैनुअल स्कैवेंजिंग यानी हाथ से मैला ढोने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया। इस अधिनियम में नालियों, सीवर टैंकों और सेप्टिक टैंकों को बिना किसी सुरक्षा उपकरण के मैन्युअल रूप से साफ करने के लिए लोगों को रोजगार देना या उन्हें इससे जोड़ना एक दंडनीय अपराध की श्रेणी में रखा गया। इस अधिनियम में राज्य सरकारों और नगरपालिकाओं, निकायों को हाथ से मैला ढोने वाले लोगों की पहचान कर परिवार सहित उनके पुनर्वास का प्रबंध करने की बात कही गई है।

सर्वोच्च न्यायालय की चिंता : संबंधित कानून के निर्माण के बाद भी मैला ढुलाई की प्रथा और सीवर में सफाई कíमयों की मौत का आंकड़ा नहीं थमा। सर्वोच्च न्यायालय की चिंता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि 27 मार्च, 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक आदेश में सरकार को वर्ष 1993 से मैनुअल स्कैवेंजिंग के कारण मारे गए लोगों की समुचित पहचान करने और उनके परिवारों को मुआवजे के रूप में कम से कम दस-दस लाख रुपये प्रति परिवार देने का निर्देश दिया था। इस निर्णय से अब तक करीब 445 मामलों में मुआवजा दिया चुका है, जबकि 58 मामले ऐसे हैं जिनमें आंशिक समझौता किया गया है और 117 मामले अभी तक अपनी बारी की प्रतीक्षा के चलते लंबित हैं। राज्यवार आंकड़ों पर बात की जाए तो 15 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने मंत्रलय के साथ जानकारी साझा की है। इस जानकारी के अनुसार अकेले तमिलनाडु में ही इस प्रकार के 144 मामले दर्ज किए गए हैं।

कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन न होना : भारत में हाथ से मैला ढोने की प्रथा को लेकर वर्ष 2013 में मैनुअल स्कैवेंजर्स के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम 2013 बनाया गया। कानूनों के निर्माण होने के उपरांत इस समस्या का अंत हो जाना चाहिए था, परंतु ऐसा नहीं हो सका। ऐसे में यह सवाल उत्पन्न होता है कि जब यह प्रथा कानूनी रूप से प्रतिबंधित की जा चुकी थी, तो यह सब कैसे हो रहा है? या तो यह कानून शिथिल है, जिसका क्रियान्वयन ही ठीक से नहीं हो पाया या फिर इस दिशा में सुधार के प्रयास ईमानदारी से नहीं किए गए?

समस्या का स्थायी समाधान : भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक द्वारा वर्ष 2003 में जारी एक रिपोर्ट में वर्ष 1993 के अधिनियम की असफलताओं को रेखांकित किया गया। राष्ट्रीय स्तर पर किए गए एक सर्वेक्षण के अंतर्गत 31 जनवरी, 2020 तक देश के 18 राज्यों में मैनुअल स्कैवेंजिंग से जुड़े लगभग 48,000 लोगों की पहचान की गई, जो इस बात का संकेत थी कि कानून इस प्रथा को समाप्त करने में प्रभावी भूमिका नहीं निभा सका है। वर्ष 2018 के एक सर्वेक्षण के अनुसार, उत्तर प्रदेश में मैनुअल स्कैवेंजिंग से जुड़े 29,923 लोगों की पहचान हुई जो देश के किसी भी राज्य में सर्वाधिक है। मंत्रलय के आंकड़ों के अनुसार 1993 से अब तक इस शर्मनाक प्रथा के चलते कुल 620 लोगों की मौत हो चुकी है। ऐसे में इस समस्या का स्थायी समाधान निकालना बड़ी चुनौती बनती गई। सरकार अब इस दिशा में जागरूक हुई है और इस समस्या के स्थायी समाधान की ओर अग्रसर हो चुकी है। अब जहां कानून में मशीनों के माध्यम से सफाई का प्रावधान शामिल किया जा रहा है, वह सीवर में सफाई कर्मचारियों की मौत को रोकने के लिए बेहद आवश्यक है। सामाजिक, आíथक और जातिगत जनगणना 2011 के अनुसार, भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में 1,82,505 तथा शहरी क्षेत्रों में 12,226 हाथ से मैला ढोने वाले लोग हैं। लेकिन इनकी वास्तविक संख्या वर्तमान में इससे कहीं बहुत अधिक हो सकती है। भारत के शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में सात हजार किमी से भी अधिक लंबी सीवर लाइन तथा 26 लाख से भी अधिक शुष्क शौचालय हैं जिनकी सफाई के लिए हाथ से मैला ढोने वाले लोगों की आवश्यकता होती है।

महात्मा गांधी के स्वच्छता के स्वप्न को पूरा करने के लिए स्वच्छ भारत अभियान में शौचालयों का निर्माण तो तीव्र गति से किया जा रहा है, लेकिन इन्हीं शौचालयों के सेप्टिक टैंक और सीवर की सफाई के लिए किसी तकनीक के विकास पर बात नहीं की गई। विडंबना देखिए कि चांद पर पहुंचने वाले हमारे देश ने सीवर की सफाई का रास्ता तय करने में दशकों का समय लगा दिया। हालांकि इस दिशा में कुछ राज्यों ने पहले प्रयास जरूर किए। केरल जल प्राधिकरण ने एक स्टार्टअप जेनरोबोटिक्स द्वारा विकसित किए गए रोबोट का प्रायोगिक रूप में सीवर की सफाई में उपयोग किया। इस दिशा में यह बेहतर पहल थी। यह कदम अन्य राज्यों को भी इस दिशा में प्रेरित करने वाला था। तकनीक के विकास के माध्यम से भी अपशिष्ट प्रबंधन में मानवीय संलिप्तता को कम या फिर लगभग खत्म किया जा सकता है।

इसी वर्ष जुलाई में असम के गुवाहाटी में सीवर मैनहोल की सफाई रोबोट द्वारा करवाए जाने की खबरें भी आई हैं। यहां के प्रशासन के अनुसार शहर में सीवर मैनहोल की सफाई का काम मानव कर्मियों द्वारा कराया जाना धीरे-धीरे खत्म किया जाएगा। बंडीकूट नामक रोबोट को गुवाहाटी नगर निगम ने खरीदा है, जिसमें जेसीबी से छह स्किड स्टीयर लोडर जिसे मिनी लोडर भी कहा जाता है व अन्य कंपनियों से खरीदे गए छह अन्य लोडर शामिल हैं। गुरुग्राम और कोयंबटूर पहले ही मैनहोलों को साफ करने के लिए इस नवीन तकनीक की खरीद कर उपयोग करने वाले शहर बन चुके हैं। हालांकि कानून में संशोधन का होना उपयोगी तभी साबित होगा, जब तकनीक संपन्न मार्ग का अनुसरण किया जाएगा। तकनीक के प्रयोग द्वारा ही इस समस्या से पूर्ण रूप से मुक्ति संभव है। अन्यथा अब तक कानून और सजा के बावजूद जो समस्या यथावत बनी हुई है, वह आगे भी जारी रहेगी।

[शोध अध्येता, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर]

 

Edited By: Sanjay Pokhriyal