[ डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ]: पूर्व गृह और वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने ‘संवैधानिक मूल्यों को बचाने का समय’ शीर्षक से आलेख लिखकर केंद्र की मोदी सरकार पर अनेक आरोप लगाए। उसमें यथार्थ है या छल, यह समझा जाना चाहिए। अक्टूबर 2019 में आइएमएफ की प्रथम महिला प्रबंध निदेशक ने वाशिंगटन में नया पदभार ग्रहण करते समय कहा कि 90 प्रतिशत विश्व मंदी के दौर में है। अंतरराष्ट्रीय वाणिज्य और व्यापार के संगठन अंकटाड ने भी विश्व के वाणिज्यिक विकास की दर अगले वर्ष के लिए घटाकर प्रस्तुत की है। इस खुली अर्थव्यवस्था के दौर में भारत पर उसका प्रभाव स्वाभाविक है।

विदेशी मुद्रा भंडार सर्वोच्च स्तर पर

फिर भी आज हमारा विदेशी मुद्रा भंडार सर्वोच्च स्तर पर है और मोदी सरकार आने के बाद व्यापार करने की सुगमता की अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में भारत 140वें से 63वें स्थान तक पहुंचा है। विगत छह महीने में सरकार ने इतने बड़े निर्णय लिए हैं जितने पूरे 70 वर्ष में नहीं लिए जा सके। स्त्रियों के सम्मान, राष्ट्रीय एकता, अखंडता और सुरक्षा से जुड़े हुए तीन तलाक, अनुच्छेद 370 और नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) जैसे युगांतकारी कानून एक संवेदनशील, परंतु सुदृढ़ भारत के भविष्य की आधार शक्ति बनने जा रहे हैं, परंतु इन सारे निर्णयों में बकौल चिदंबरम जी संवैधानिक संकट नजर आता है। वह स्वयं एक बड़े वकील भी हैैं। क्या वह एक भी बिंदु उद्धृत कर सकते हैैं जो सीएए में भारतीय संविधान की भावना के विपरीत हो।

नागरिकता अधिनियम में कहीं भी मुस्लिम शब्द का उल्लेख नहीं

सीएए जब पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों को संरक्षण देने की बात करता है तो यह भारत की प्राचीन परंपरा के अनुरूप तो है ही, बल्कि इन मजहबी हुकूमतों को पंथनिरपेक्ष लोकतांत्रिक भारत का जवाब है, जो हमारे क्षेत्रीय दायित्व के अनुरूप है। नागरिकता अधिनियम में कहीं भी मुस्लिम शब्द का उल्लेख नहीं है, परंतु सर्वाधिक बवाल उसी को लेकर किया जा रहा और प्रश्न पूछा जा रहा कि हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई को ही क्यों, मुस्लिमों को क्यों नहीं? इस प्रश्न के राजनीतिक और नैतिक दो प्रकार के उत्तर हैं।

जब कांग्रेस ने असम में अल्पसंख्यकों के लिए नागरिकता का आग्रह किया था

राजनीतिक दृष्टि की बात करें तो स्वयं असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने 2012 में अपने प्रस्ताव में लिखा था ‘कि विभाजन के बाद से अमानवीय यातना झेल रहे और असम में आए हुए बंगाली हिंदू, बौद्ध, ईसाई और अन्य अल्पसंख्यकों की नागरिकता के अधूरे कार्य को पूरा करने का समय आ गया है।’ 20 अप्रैल, 2012 को असम के कांग्रेसी मुख्यमंत्री तरुण गोगोई यही अनुरोध करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री को पत्र लिखते हैैं। 2003 में मनमोहन सिंह ने तत्कालीन गृहमंत्री आडवाणी जी से बांग्लादेश जैसे देशों के अल्पसंख्यकों के लिए नागरिकता का आग्रह किया। स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस कार्यसमिति ने 25 सितंबर, 1947 को प्रस्ताव पारित किया कि ‘कांग्रेस पाकिस्तान के सभी गैर-मुस्लिमों (जो सीमा पार से आ रहे हैं) के जीवन और सम्मान की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध है और भविष्य में भी प्रतिबद्ध रहेगी।’

गांधी ने भी पाक से आए हिंदू और सिखों के लिए सरकार से जीवन बेहतर देने के लिए कहा था

महात्मा गांधी ने भी 26 सितंबर, 1947 को अपनी प्रार्थना सभा में कहा था कि पाकिस्तान से हिंदू और सिख कभी भी और किसी भी तरीके से यहां आ सकते हैं और यह भारत की सरकार का प्रथम कर्तव्य है कि उन्हें सिर्फ शरण ही नहीं, बल्कि रोजगार और जीवन बेहतर करने की व्यवस्था सुनिश्चत करे। वास्तव में जो असम की कांग्रेस सरकार ने चाहा, जो मनमोहन सिंह ने कहा, जो नेहरू की कांग्रेस का प्रस्ताव था और जो महात्मा गांधी का मंतव्य था वही तो मोदी सरकार ने नागरिकता कानून में प्रावधान किया है। चिदंबरम जी यह बताएं कि यदि सीएए संविधान विरुद्ध है तो क्या गांधी, नेहरू और आपकी पूरी पार्टी और सरकारें संविधान विरुद्ध थीं?

भारत विभाजन के खलनायकों के प्रति ममता दिखाने का अक्ष्मय अपराध है

यदि नैतिक पक्ष पर विचार किया जाए तो देश के विभाजन के बाद वहां हिंदू, सिख, बौद्ध, ईसाई आदि तो फंस गए थे और पाकिस्तान के मुसलमान तो गांधी के सपनों का भारत तोड़कर जिन्ना की कुटिल नीति के सारथी बनकर हिंसा का तांडव करके पाकिस्तान छीन कर ले गए थे। उनके लिए नागरिकता की मांग करना क्या स्वतंत्रता आंदोलन की संपूर्ण भावना के साथ द्रोह करना नहीं है? सीएए का विरोध तो एक तरफ पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों के प्रति घनघोर असंवेदनशीलता और भारत विभाजन के खलनायकों के प्रति ममता दिखाने का अक्ष्मय अपराध है।

जो दुखियारे नागरिकता मांग रहे हैं उन पर तो सितम और जो मांग ही नहीं रहे हैं उस पर करम

कहा जा रहा है कि पाकिस्तान के शिया, अहमदिया और मुहाजिर प्रताड़ित हैैं तो उन्हें शरण क्यों नहीं? क्या कोई विपक्षी नेता बता सकता है कि इस वर्ग के कितने पाकिस्तानियों ने भारत में इस आधार पर शरण मांगी है। दूसरी ओर मनमोहन सरकार के समय यह आंकड़ा सामने आया था कि एक लाख 14 हजार से कुछ अधिक पाकिस्तार्नी ंहदुओं ने भारत में नागरिकता के लिए आवेदन किया है। संसद में सुखबीर बादल ने यह बोला कि अफगानिस्तान के 75000 सिख नागरिकता की प्रत्याशा में हैं। साफ है कि जो दुखियारे नागरिकता मांग रहे हैं उन पर तो सितम और जो मांग ही नहीं रहे हैं उस पर करम। पाकिस्तान के प्रथम प्रधानमंत्री लियाकत अली मुहाजिर थे। प्रथम विदेशी मंत्री जफरउल्ला खां अहमदिया थे और जिन्ना मूलत: शिया थे। पाकिस्तान के कट्टरपंथी तबके ने इन वर्गों को सत्ता से बेदखल करने के लिए षड्यंत्र किया तो यह पाकिस्तान के आंतरिक सत्ता संघर्ष का हिस्सा है न कि धार्मिक भेदभाव का।

राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर पर भी राजनीति शुरू हो गई

अब तो जो राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर जनगणना का स्वाभाविक अंग है उस पर भी राजनीति शुरू हो गई है। राहुल, प्रियंका कह रहे हैैं कि 2010 के एनपीआर और 2020 के एनपीआर में अंतर है। यह हास्यास्पद तर्क है। देश का कोई भी प्रोफार्मा दस साल में कुछ संशोधनों के साथ ही आता है। 2010 का प्रोफार्मा भी 2000 से बहुत अलग था। एक प्रश्न यह है कि माता-पिता का नाम और स्थान क्यों मांगा जा रहा है? पहली बात एनपीआर में कोई कागजात नहीं मांगे जा रहे हैैं, सिर्फ जानकारी मांगी जा रही है। वह भी इसलिए कि आयुष्मान भारत जैसी योजना में परिवार के सभी सदस्यों की जानकारी आवश्यक है। मां-बाप के निवास स्थान के पीछे तर्क यह है कि यदि कोई मुंबई या दिल्ली में कार्यरत है और उसके मां-बाप यूपी या बिहार में कहीं रहते हैं तो अगर उनका निवास स्थान नहीं ज्ञात होगा तो उस स्थान से जुड़े अस्पतालों में उन्हें स्वास्थ्य बीमा की सुविधा मुंबई या दिल्ली के कार्ड पर कैसे मुहैया कराई जाएगी?

आज भारत की 75 प्रतिशत आबादी 25 साल से कम की है

आज भारत की 75 प्रतिशत आबादी 25 साल से कम की है। इसमें लगभग सभी कभी न कभी स्कूल गए हैं। गत 25 वर्षों में स्कूल जाने वाला कौन से बालक-बालिका हैैं, जिसने माता-पिता का नाम और निवास स्थान स्कूल में न दिया हो? समस्या केवल असम और बंगाल के उन घुसपैठियों को होगी जो छल-बल से अथवा वहां की सरकारों की मिलीभगत से पिछले 25-30 वर्षों में नागरिकता ले चुके हैं। जो लोग एनपीआर का विरोध कर रहे हैं वे क्या घुसपैठियों को संरक्षण दे रहे हैं?

( लेखक भाजपा के राज्यसभा सदस्य हैैं )

Posted By: Bhupendra Singh

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