झारखंड, प्रदीप शुक्ला। कोविड-19 महामारी से जूझ रही हेमंत सरकार के लिए उन्हीं के कुछ बड़बोले मंत्री सिरदर्द बनते जा रहे हैं। सुर्खियों में रहने और लोकप्रियता की फिराक में मंत्री ऐसी घोषणाएं कर दे रहे हैं जिन्हें धरातल पर उतारने में विभाग को पसीना छूट रहा है। इस बीच झारखंड भी धीरे-धीरे लॉकडाउन से बाहर निकल रहा है। उद्योग-धंधों से लेकर कारोबारी गतिविधियों का संचालन शुरू हुआ है।

प्रवासी मजदूरों के लौटने का सिलसिला भी अनवरत जारी है और जैसी चिंता जताई जा रही थी कि इनमें काफी कोरोना संक्रमित हो सकते हैं, वह सही साबित हो रहा है। संक्रमितों में अधिकांश प्रवासी मजदूर हैं। सरकार इस विकट हालात से निपटने की कोशिश कर रही है, लेकिन बड़बोले मंत्री समस्या खड़ी कर रहे हैं।

स्कूलों ने बाकायदा फीस के लिए अभिभावकों को नोटिस भेजा : सबसे पहले बात शिक्षा मंत्री जगरनाथ महतो की करते हैं। कुछ अन्य राज्यों की देखा-देखी उन्होंने भी घोषणा कर दी कि प्राइवेट स्कूलों में तीन महीने की फीस माफ होगी। शुरुआत में उन्होंने इसे मानवीय आधार पर कहकर स्कूल संचालकों से आग्रह किया। जब स्कूलों ने आना-कानी की तो धमकी दी। पिछले दो महीने में वह दर्जनों बार घोषणा कर चुके हैं। इस बीच कुछ स्कूलों ने बाकायदा फीस के लिए अभिभावकों को नोटिस भेज दिया।

स्कूल संचालकों का अपना तर्क : स्कूल संचालकों का कहना है कि उनके पास ऐसा कोई विभागीय आदेश नहीं है। मंत्री के निर्देश पर झारखंड एकेडमिक काउंसिल ने सिर्फ एक अनुरोध पत्र स्कूलों को भेज दिया, जबकि काउंसिल इसके लिए सक्षम नहीं है। मामला बिगड़ता देख मंत्री ने मुख्य सचिव के नेतृत्व में एक कमेटी बनाने का आदेश दिया और घोषणा कर दी कि एक महीने में इसकी रिपोर्ट आ जाएगी और उसके बाद ही स्कूल कोई फीस लेंगे। बीस दिन से ज्यादा बीत गए हैं, लेकिन कमेटी नहीं बनी। अब तय हुआ है कि मुख्य सचिव स्कूल संचालकों के साथ बैठकर इस मसले का हल खोजेंगे। अभिभावक भ्रमित हैं। स्कूल संचालकों का अपना तर्क है। वह कह रहे हैं कि उन्हें तो वेतन देना ही पड़ रहा है। स्कूल भी धमकी दे चुके हैं, यदि सरकार एकतरफा फैसला लेती है तो वे अदालत की शरण लेंगे। सरकार असमंजस की स्थिति में है।

सरकार के गले की हड्डी बनने जा रही : कृषि मंत्री बादल पत्रलेख की ऐसी ही एक घोषणा आने वाले समय में सरकार के गले की हड्डी बनने जा रही है। मंत्री ने घोषणा की है कि खरीफ की फसल के लिए किसानों को नब्बे फीसद अनुदान पर बीज उपलब्ध करवाए जाएंगे। लॉकडाउन के चलते किसानों की दशा पहले से खराब है। फसलें मंडी तक नहीं पहुंच पाई हैं और उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा है। सरकार ने जो धान खरीदा था उसका भी भुगतान नहीं हो सका है। गठबंधन सरकार ने किसानों के कर्ज माफी का वादा भी पूरा नहीं किया है। इस बीच किसान खरीफ फसल के लिए बीज में जिस अनुदान की उम्मीद लगाए बैठा है वह भी टूटती दिख रही है।

सरकार की काफी किरकिरी हुई : कृषि विभाग की अभी तक जो तैयारी है उसके मुताबिक बीज खरीद में पचास फीसद ही अनुदान मिलेगा। यही व्यवस्था पूर्व की रघुवर सरकार के समय में भी थी। सवाल उठ रहे हैं, क्या मंत्री ने विभागीय अधिकारियों से इसकी कोई चर्चा की थी? या मंत्री पहले एलान कर देते हैं फिर विभागीय स्तर पर मशक्कत होती है कि यह संभव है भी या नहीं? स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता की स्वास्थ्य सचिव से नहीं पट रही है। वह उन्हें हटाने के लिए मुख्यमंत्री से आग्रह कर चुके हैं। वह रिम्स के निदेशक को भी हटाने की जुगत में थे। रिम्स के निदेशक का एम्स बठिंडा में निदेशक के रूप में चयन हो गया है। उन्होंने सरकार से यह आग्रह करते हुए कार्यमुक्त करने का आग्रह किया था कि वह कोरोना काल तक यहीं सेवा देना चाहते हैं। मंत्री ने उन्हें तत्काल कार्यमुक्त करने की संस्तुति करते हुए अपने करीबी को चार्ज दिलवाने की सिफारिश भी कर दी। खैर मुख्यमंत्री ने न तो स्वास्थ्य सचिव को हटाया और न ही रिम्स निदेशक को कार्यमुक्त किया। इससे उन्होंने यह संदेश तो दे दिया कि वह बहुत दबाव में काम नहीं करने वाले हैं, फिर भी इस मामले में सरकार की काफी किरकिरी तो हुई ही है।

ग्रामीण विकास मंत्री आलमगीर आलम द्वारा लॉकडाउन में मजदूरों को बसों से राज्य के अन्य हिस्सों में भिजवाने के मामले का तो हाईकोर्ट तक ने संज्ञान लिया था। मुख्यमंत्री ने कांग्रेस नेतृत्व को संदेश दे दिया है। इसका असर भी हुआ है। कांग्रेस के राज्य प्रभारी आरपीएन सिंह ने अपने कोटे के चारों मंत्रियों को सख्त हिदायत दी है कि वह मुख्यमंत्री के साथ सामंजस्य बैठाकर काम करें। हर मसले पर केंद्रीय नेतृत्व से पंचायत की उम्मीद न करें। देखना होगा, इसका असर कब तक रहता है।

स्थानीय संपादक, झारखंड

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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