मोदी सरकार - 2.0 के 100 दिन

पंकज चतुर्वेदी

हाल में नियंत्रक-महालेखा परीक्षक यानी कैग की रिपोर्ट से पता चला कि गंगा सफाई की परियोजना ‘नमामि गंगे’ के तहत बजट राशि खर्च ही नहीं हो पाई है। अब तक गंगा की सफाई के नाम पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैैं, लेकिन न तो गंगा में पानी की मात्रा बढ़ी और न ही उसका प्रदूषण घटा। यह हाल केवल गंगा का ही नहीं है। अन्य नदियों को स्वच्छ करने के अभियान भी कागजी साबित हो रहे हैैं। वे नारेबाजी और बजट को ठिकाने लगाने तक अधिक सीमित हैैं। लखनऊ में गोमती पर छह सौ करोड़ खर्च किए गए, लेकिन हालत जस की तस है। कई सौ करोड़ खर्च हो जाने के बाद यमुना भी दिल्ली से आगे मथुरा-आगरा तक नाले की तरह है। सभी जानते हैं कि इंसान के पीने और साथ ही खेती-मवेशी के लिए अनिवार्य मीठे जल का सबसे बड़ा जरिया नदियां ही हैं। जहां-जहां से नदियां निकलीं, वहां-वहां बस्तियां बसती गईं और इस तरह विविध संस्कृतियों का भारत बसता चला गया। समय के साथ नदियां पवित्र मानी जाने लगीं-केवल इसलिए नहीं कि उनसे जीवनदायी जल मिल रहा था, इसलिए भी कि उनकी छत्र-छाया में मानव सभ्यता पुष्पित पल्लवित होती रहीं। गंगा और यमुना को भारत की अस्मिता का प्रतीक माना जाता है, लेकिन विडंबना है कि विकास की बुलंदियों की ओर बढ़ते देश में अमृत बांटने वाली नदियां आज खुद जहर पीने को अभिशप्त हैैं। नदियों को प्रदूषण-मुक्त करने की नीतियां महज नारों से आगे नहीं बढ़ पा रही हैैं। सरकार में बैठे लोग खुद ही नदियों में गिरने वाले औद्योगिक प्रदूषण की सीमा में जब विस्तार करेंगे तो यह उम्मीद रखना बेमानी है कि वे जल्द ही निर्मल होंगी।


हमारी नदियां कई तरह के हमले झेल रही हैैं। उनमें पानी कम हो रहा है, वे उथली हो रही हैैं और उनसे रेत निकाल कर उनका मार्ग भी बदला जा रहा है। नदियों के किनारे पर हो रही खेती से बह कर आ रहे रासायनिक पदार्थ और कल-कारखानों के साथ घरेलू गंदगी भी नदियों में जा रही है। नदी केवल एक जल मार्ग नहीं होती। जल के साथ उसमें रहने वाले जीव-जंतु, वनस्पति, उसके किनारे की नमी, उसमें पलने वाले सूक्ष्म जीव, उसका जल इस्तेमाल करने वाले इंसान और पशु-इन सभी की महत्ता होती है। यदि इनमें से एक भी कड़ी कमजोर या नैसर्गिक नियम के विरूद्ध जाती है तो नदी की दशा बिगड़ जाती है। हमारे देश में 13 बड़े, 45 मध्यम और 55 लघु जलग्रहण क्षेत्र हैैं। जलग्रहण क्षेत्र उस संपूर्ण इलाके को कहा जाता है जहां से पानी बहकर नदियों में आता है। इसमें हिमखंड, सहायक नदियां, नाले आदि शामिल होते हैं। गंगा, सिंधु, गोदावरी, कृष्णा, ब्रह्मपुत्र, नर्मदा, तापी, कावेरी, माही, महानदी, साबरमती आदि बड़े जल ग्रहण क्षेत्र वाली नदियां हैं। इनमें से तीन नदियां-गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र को सदानीरा ‘हिमालयी नदी’ कहा जाता है। शेष पठारी नदी कहलाती हैैं, क्योंकि वे मूलत: वर्षा पर निर्भर होती हैं। देश का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 32.80 लाख वर्ग किमी है, जबकि सभी नदियों को सम्मिलित जलग्रहण क्षेत्र 30.50 लाख वर्ग किमी है। हमारी नदियों से हर साल 1645 घन किलोलीटर पानी बहता है जो सारी दुनिया की कुल नदियों का 4.445 प्रतिशत है। आंकडों के आधार पर हम पानी के मामले में दुनिया में सबसे ज्यादा समृद्ध हैं, लेकिन चिंता का विषय यह है कि पूरे पानी का कोई 85 फीसद बारिश के तीन महीनों में समुद्र की ओर बह जाता है और नदियां सूखी रह जाती हैं।
2009 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने देश में कुल दूषित नदियों की संख्या 121 पाई थी जो अब 275 हो चुकी हैं। आठ साल पहले नदियों के कुल 150 हिस्सों में प्रदूषण पाया गया था, जो अब 302 हो गया है। बोर्ड ने 29 राज्यों और छह केंद्र शासित प्रदेशों की कुल 445 नदियों पर अध्ययन किया, जिनमें से 225 का जल बेहद खराब हालत में मिला। इन नदियों के किनारे बसे शहरों में 2009 में 38 हजार एमएलडी सीवर का गंदा पानी नदियों में गिरता था जो अब बढ़ कर 62 हजार एमएलडी हो गया है। चिंता की बात है कि कहीं भी सीवर ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता नहीं बढ़ाई गई है। सरकारी अध्ययन में 34 नदियों में बायो केमिकल आक्सीजन डिमांड यानि बीओडी की मात्रा 30 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक पाई गई और यह नदियों के अस्तित्व के लिए बड़े संकट की ओर इशारा करता है। भारत में प्रदूषित नदियों के बहाव का इलाका 12,363 किमी मापा गया है। इनमें से 1,145 किमी का क्षेत्र बेहद दूषित श्रेणी का है। दिल्ली में यमुना इस शीर्ष पर है। इसके बाद महाराष्ट्र का नंबर आता है जहां 43 नदियां मरने के कगार पर हैं। असम में 28, मध्यप्रदेश में 21, गुजरात में 17, कर्नाटक में 15, केरल में 13, बंगाल में 17, उप्र में 13, मणिपुर और ओडिशा में 12-12, मेघालय में दस और कश्मीर में नौ नदियां अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही हैं। ऐसी नदियों के कोई 50 किमी इलाके के खेतों की उत्पादन क्षमता लगभग समाप्त हो गई है। इलाके की अधिकांश आबादी चर्मरोग, सांस की बीमारी और पेट के रोगों से बेहाल है। भूजल विभाग का एक सर्वे गवाह है कि नदी के किनारे हैंडपंपों से निकल रहे पानी में क्षारीयता इतनी अधिक है कि वह न तो पीने के लायक है,न ही खेती के।
आज के दौर में विकास का पैमाना निर्माण कार्य है -भवन, सड़क, पुल आदि के निर्माण में सीमेंट, लोहे के साथ एक अन्य अनिवार्य वस्तु है रेत या बालू। यह एक ऐसा उत्पाद है जिसे किसी कारखाने में नहीं बनाया जा सकता। प्रकृति का नियम यही है कि किनारे पर स्वत: आई इस रेत को समाज अपने काम में लाए, लेकिन गत एक दशक के दौरान हर छोटी-बड़ी नदी का सीना छेद कर मशीनों द्वारा रेत निकाली जा रही है। इसके लिए नदी के नैसर्गिक मार्ग को बदला जाता है। उसे बेतरतीब खोदा या गहरा किया जाता है। नदी के जल बहाव क्षेत्र में रेत की परत न केवल बहते जल को शुद्ध रखती है, बल्कि वह उसमें मिट्टी के मिलान से दूषित होने और जल को भूगर्भ में जज्ब होने से भी बचाती है। नदी के जल ग्रहण क्षेत्र में लगातार जेसीबी जैसी भारी मशीनें और ट्रक आने से उसका पर्यावरण खराब होता है। भले ही हम कारखानों को दोषी बताएं, लेकिन नदियों की गंदगी का तीन चौथाई हिस्सा घरेलू मल-जल है। इस मल-जल के शुद्धिकरण की लचर व्यवस्था और नदियों के किनारे के बेतरतीब अतिक्रमण भी उनके बड़े दुश्मन बन कर उभरे हैैं।
[ लेखक पर्यावरण मामलों के जानकार हैैं ]

Posted By: Bhupendra Singh

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