डॉ. भरत झुनझुनवाला

देश के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में जुलाई से सितंबर तिमाही में 6.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इससे पहले अप्रैल से जून तिमाही में जीडीपी ने 5.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की थी जो कि बीते कई वर्षों का न्यूनतम स्तर था। ऐसे में चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में विकास दर बढ़ने से संकेत मिलता है कि नोटबंदी और जीएसटी से हुई परेशानियां अब खत्म हो गई हैं और अर्थव्यवस्था पुन: पटरी पर आ रही है। मरीज की बीमारी को दूर करने के लिए सर्जरी करने पर कुछ समय तक वह कमजोर हो जाता है, परंतु समय के साथ ही उसका स्वास्थ्य पहले से भी ज्यादा सुधर जाता है। इसी प्रकार नोटबंदी और जीएसटी की सर्जरी के बाद अब अर्थव्यवस्था पुन: पटरी पर आ रही है। इस आकलन को दूसरे संकेतों से भी समर्थन मिलता है। सेंसेक्स ऊंचे स्तर पर बना हुआ है। डॉलर के सामने रुपया भी मजबूती से टिका हुआ है। जीएसटी के कारण पैदा हुई कुछ तात्कालिक मुश्किलों से रुपये के मूल्य में गिरावट नही आई है। विदेशी निवेश भी ऐतिहासिक रूप से ऊंचे स्तर पर आ गया है। इन संकेतों से अनुमान लगता है कि अब हमारी अर्थव्यवस्था द्रुत गति से चलने को है, लेकिन दूसरी तरफ अर्थव्यवस्था की कमजोरी के भी संकेत मिल रहे हैं। बैंकों द्वारा दिए जाने वाले ऋण में वर्ष 2016-17 में मात्र 5.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। दिए गए ऋण में कुछ वृद्धि मंहगाई के कारण सहज ही होती है। मान लीजिए बीते वर्ष दवा विक्रेता ने 10 लाख रुपये का ऋण लिया। उतनी ही दवा बेचने को इस वर्ष वह 11 लाख रुपये लेगा, क्योंकि दवा के दाम बढ़ गए हैं। ऋण में 10 प्रतिशत की वृद्धि अर्थव्यवस्था की सामान्य चाल को बताती है। अत: ऋण में मात्र 5.1 प्रतिशत की वृद्धि बताती है कि व्यापार सिकुड़ रहे हैं। 11 लाख का कर्ज लेने के स्थान पर दुकानदार मात्र 10.50 लाख रुपये का कर्ज ले रहा है, क्योंकि उसकी बिक्री दबाव में है। यह वृद्धि दर बीते 60 वर्षों के न्यूनतम स्तर पर है। व्यापारियों एवं उद्यमियों का धंधा चल रहा होता है तो वे बैंको से उत्तरोत्तर अधिक ऋण लेते हैं। बैंक भी ऋण देने को उत्सुक होते हैं, क्योंकि उन्हें आने वाले समय में व्यापारी की कमाई बढ़ने का भरोसा होता है। रोजगार की स्थिति भी कठिन है। वर्ष 2015-16 में संगठित क्षेत्र में केवल दो लाख नए रोजगार का सृजन हुआ है जो कि 2011 के पूर्व हो रहे रोजगार सृजन का एक चौथाई ही है। हमारे आयात में तीव्र वृद्धि हो रही है जबकि निर्यात दबाव में है। यह भी बताता है कि हमारे उद्यमी वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पा रहे हैं। जैसे मरीज स्वयं भोजन न कर सके और भोजन करने के लिए उसे नर्स की जरूरत हो-ऐसी हमारी अर्थव्यवस्था की स्थिति है। इन कठिन परिस्थितियों को देखते हुए मोबाइल कंपनी एयरटेल के मालिक सुनील मित्तल ने कहा है कि हमें सोचना चाहिए कि देश के उद्यमियों में निराशा क्यों है?


एक तरफ विकास दर में सुधार के साथ ही मरीज की पल्स सुधर रही है। दूसरी तरफ मरीज को भोजन करने के लिए नर्स की जरूरत पड़ रही है। जैसे कि हम आयात पर निर्भर होते जा रहे हैं। ये परस्पर विरोधाभासी संकेत वास्तव में जुड़े हुए हैं। यह गुत्थी जीडीपी में वृद्धि को गहनता से देखने से सुलझती है। वर्तमान वृद्धि विनिर्माण क्षेत्र में आई है। बुनियादी क्षेत्र जैसे सीमेंट और स्टील में मंदी बरकरार है। संभवत: नोटबंदी और जीएसटी के झटके से जो अर्थव्यवस्था सहम गई थी उसमें पुन: थोड़ा रक्त संचार शुरू हुआ है इसलिए बीती तिमाही में विनिर्माण में कुछ सुधार हुआ है, लेकिन कृषि क्षेत्र की विकास दर में गिरावट आई है। सेवा क्षेत्र शिथिल है। इसलिए वर्तमान में जीडीपी में दिख रही वृद्धि मरीज के स्वस्थ होने का घोतक नहीं, बल्कि केवल कोमा से बाहर आने का सूचक है। जीडीपी की वृद्धि दर बढ़ी है, परंतु मरीज अभी भी बीमार है।
अर्थव्यवस्था के पस्त होने से भारतीय उद्यम दबाव में हैं। वे घाटा खा रहे है। कुछ बंद होने के कगार पर हैं। ऐसे में मालिक अपने उद्योगों को बेचकर छुट्टी करना चाहते हैं। घरेलू उद्यमों के इस संकट में विदेशी निवेशको को निवेश करने का स्वर्णिम अवसर दिख रहा है। गांव में गमी हो जाए तो साहूकार को ऋण देने, लेनदार की जमीन गिरवी रखने एवं अपना व्यापार बढ़ाने का अवसर दिखता है। इसी प्रकार भारतीय व्यापारियों की परेशानियों में विदेशी निवेशकों को निवेश करने का स्वर्णिम अवसर दिख रहा है और भारत में विदेशी निवेश भारी मात्रा में आ रहा है, लेकिन यह निवेश नई फैक्ट्रियां लगाने में नहीं आ रहा है। वर्ष 2015 में देश में 44 अरब डॉलर विदेशी निवेश आया था जिसमें 34 अरब डॉलर नई फैक्ट्रियां लगाने में और 10 अरब डॉलर पुरानी स्थापित फैक्ट्रियों को खरीदने में आया था। वर्ष 2016 में उतना ही 44 अरब डॉलर विदेशी निवेश आया, परंतु नई फैक्ट्रियां लगाने में केवल 23 अरब डॉलर तथा पुरानी फैक्ट्रियां खरीदने में 21 अरब डॉलर। पुरानी फैक्ट्रियां खरीदने को आने वाला विदेशी निवेश दो गुना हो गया। यह बताता है कि विदेशी निवेश का बढ़कर आना शुभ संकेत नहीं है, बल्कि घरेलू उद्यमों के संकट को दिखा रहा है। जैसे मरीज को भोजन कराने के लिए एक के स्थान पर दो नर्सों की जरूरत पड़े और दो नर्सों की सहायता से वह कुछ खाने लगे तो शुभ संकेत नहीं होता है। फिर भी विदेशी निवेश के इस तरह बढ़कर आने से शेयर बाजार में उत्साह है। चूंकि शेयर बाजार के सट्टेबाजों को लाभ कमाने से मतलब होता है जैसे अस्पताल को कोमा में पड़ा मरीज मिले तो अस्पताल के मालिक को कोई परेशानी नहीं होती। इसी विदेशी निवेश के आने से रुपया अपने मूल्य पर टिका हुआ है।
अब हम अर्थव्यवस्था के परस्पर विरोधी संकेतों को एक साथ पिरो सकते हैं। नोटबंदी, जीएसटी के बाद इनकम टैक्स की लाखों नोटिसें जारी करने से व्यापारी निराश हुआ और अर्थव्यवस्था दबाव में आ गई। अब इन तात्कालिक झटकों से व्यापारी उबर रहा है इसलिए जीडीपी में कुछ वृद्धि हुई है। व्यापारियों की मूल निराशा के कारण बैंको द्वारा ऋण कम दिए जा रहे हैं, रोजगार कम उत्पन्न हो रहे हैं और हमारे निर्यात दबाव में हैं। व्यापारी पर संकट बना हुआ है और वह अपने धंधे को विदेशी निवेशकों को बेच रहा है। इस संकट को विदेशी निवेशक स्वर्णिम अवसर के रूप मे देख रहे हैं। विदेशी निवेश आ रहा है जिसके कारण शेयर बाजार की स्थिति सही है और रुपया अपने स्तर पर टिका हुआ है। जीडीपी में जुलाई से सितंबर की तिमाही में 6.3 प्रतिशत की वृद्धि छोटा शुभ संकेत है जिसके पीछे निराशा भी छिपी हुई है। इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत सरकार की ओर से व्यापारियों को टैक्स चोर के रूप में देखने से होती है। अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए घरेलू व्यापारी को भी उसी प्रकार आदर देना होगा जैसे विदेशी व्यापारी को दिया जा रहा है।
[ लेखक वरिष्ठ अर्थशास्त्री एवं आइआइएम बेंगलुरु के पूर्व प्रोफेसर हैं ]

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