नई दिल्ली [डॉ. कौशलेंद्र कुमार]। युगों-युगों से भारतीय जनमानस की आस्था के केंद्र में राम रहे हैं। यह आस्था किसी चमत्कार की कहानी सुनकर पैदा नहीं हुई, बल्कि राम के लोक-व्यवहार को समझने से पैदा हुई।

मन-कर्म-वचन से राम ने मर्यादा व धर्म की ऐसी मिसाल पेश की जिससे उनका संपूर्ण जीवन चरित्र कालजयी हो गया। एक मानव का अपने अदम्य साहस, धैर्य व कर्तव्य के प्रति संपूर्ण निष्ठा के कारण पुरुष से पुरुषोत्तम बनने की कहानी, राम का जीवन-चरित है। राजा राम एक सफल राजा के रूप में अपना स्थान बनाते हैं।

आज भी हम जब एक श्रेष्ठ राजकीय व्यवस्था की बात करते हैं, तो हमारे समक्ष रामराज्य की ही अवधारणा होती है। आज की पीढ़ी को रामराज्य की वास्तविक तस्वीर दिखलानी जरूरी है, तभी वे न्यायपूर्ण प्रशासनिक व्यवस्था व समानता की भावना से संचालित एक बेहतर समाज की जरूरत को समझ पाएंगे। प्रेम, भाईचारा, बंधुत्व, न्याय, समानता जैसे गुणों से युक्त रामराज्य की छवि तुलसीदास ने रामचरितमानस के उत्तरकांड में रेखांकित की है। 

यह छवि ऐसी है कि मनुष्य क्या कोई भी प्राणी ऐसे राज्य में रहना अपना सौभाग्य समङोगा। गोस्वामी तुलसीदास के रामराज्य में राजा की भूमिका अति-महत्वपूर्ण है। प्रजा के सुख-दुख व अन्य सभी प्रकार की परिस्थितियों के लिए वही जवाबदेह होता है। इसलिए उसका कोई भी निर्णय व्यक्तिगत आकांक्षा से प्रेरित नहीं हो सकता, बल्कि उस निर्णय में समस्त समाज, प्रजा का हित ही सवरेपरि होता है। तुलसीदास द्वारा प्रस्तुत रामराज्य की अवधारणा मध्यकालीन भारतीय समाज की आकांक्षाओं की सहज परिणति है।

रामराज्य में रोग-व्याधि नहीं थे। तुलसीदास लिखते हैं-अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरूज सरीरा। यह एक ऐसी शासकीय व्यवस्था थी जहां किसी की भी अकालमृत्यु नहीं होती थी। किसी भी रोग व्याधि से किसी को भी पीड़ा नहीं होती थी। सभी लोग निरोग थे। सब का शरीर सुंदर व रोग रहित था। तुलसीदास के समाज में महामारी से लोगों की अकालमृत्यु तो होती थी, परंतु राजा या शासक इसके प्रति अपनी जिम्मेदारी को नहीं प्रदर्शित करता था।

तुलसीदास ने इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखकर कहा कि राम के जैसे राजा होने पर प्रजा की अकालमृत्यु नहीं होती थी। आज भी एक संवेदनशील शासक राज्य में किसी प्रकार की महामारी फैलने पर अपने संसाधनों से प्रजा की रक्षा करता है। राज-व्यवस्था की यह सीख हमें रामराज्य की अवधारणा से ही मिलती है।

रामराज्य की एक अलौकिक विशेषता यह रही है कि इसमें हाथी और सिंह जैसे परस्पर शत्रु भी प्रेम भाव से रहते थे। प्रेम का ऐसा परिवेश था कि शिकार व शिकारी भी मित्रवत रहते थे। हम जानते हैं कि राम जो स्वयं मर्यादा को सवरेपरि मानते थे, उनके राज्य में मर्यादा की प्राथमिकता क्या रही होगी। चर-अचर, सजीव-निर्जीव सभी अपनी-अपनी मर्यादा से बंधे थे और कभी भी इसका उल्लंघन नहीं करते थे।

राम ने उस समाज में एक पत्नीव्रत रहने का संकल्प लिया था जिसमें बहुपत्नी प्रथा आम बात थी। राम ने स्वयं के आचार-विचार और व्यवहार से दांपत्य जीवन में मर्यादा की एक रेखा खींच दी जिसे पार करना राज-घराने के लोगों के साथ-साथ आम प्रजा के लिए भी अनैतिक था। रामराज्य में दांपत्य जीवन के संदर्भ में तुलसीदास लिखते हैं -एक नारि व्रत रत सब झारी। ते मन बचन क्रम पति हितकारी।।

अर्थात सभी पुरुष एक नारी व्रत का पालन करते हुए एक ही पत्नी रखते थे तथा नारियां भी मन-वचन-कर्म से पति का हित चाहती थीं। पति सुखी वैवाहिक जीवन का संकल्प लेता था तो पत्नी इस संकल्प की सिद्धि हेतु समíपत थी। पुरुष व स्त्री अपनी-अपनी मर्यादा पर अडिग थे। रामराज्य में सागर, वन आदि भी अपनी मर्यादा को पूरा करने के प्रति समर्पित थे। सभी वृक्ष फल-फूल से आच्छादित रहते थे। नदियों में स्वच्छ जल प्रवाहित होता रहता था। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं) 

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