मनुष्य का एक ही मित्र है-धर्म। दूसरों को ईश्वर का अंश मानते हुए उनकी भलाई के लिए कार्य करना ही धर्म है। यदि कोई व्यक्ति किसी की सेवा करता है तो उसे परम संतोष और विशेष शांति मिलती है। सेवा के लिए मनुष्य के मन में सर्वप्रथम यही विचार आने चाहिए कि दुखी व्यक्ति भी अपना है और यदि यह दुखी रहेगा तो मैं भी दुखी रहूंगा। यानी जब हृदय में दया और अपनत्व का भाव होगा तभी हम सेवा के लिए तत्पर हो सकेंगे। किसी को ठंड में कंपकपाते हुए देखने पर हमारा शरीर भी उस ठंड को महसूस करेगा तब उस व्यक्ति केलिए कंबल की व्यवस्था करने का भाव हमारे मन में जाग्रत होगा। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसके चारों ओर उसके संबंधी और मित्रों आदि का समुदाय दृष्टिगोचर होता है। ऐसे में एक-दूसरे की मदद करना ही उनका कर्तव्य-धर्म है। खास बात यह कि सेवा से अहंकार का भी नाश होता है। अहंकार ईश्वर प्राप्ति में सबसे बड़ा बाधक है। सेवा का मतलब समर्पण है। समर्पण क्या है?

एक बरगद ने ताउम्र लोगों की सेवा की। धूप होने पर लोग उसकी छाया में बैठते, जबकि त्योहारों पर महिलाएं उसकी पूजा करतीं। जब वृक्ष बूढ़ा हो गया तो वह सूखने लगा, उसकी जड़ें भी कमजोर हो गईं। लोग उसे काटने के लिए आरी, कुल्हाड़ी ले आए। उस बरगद के पास खड़ा एक नन्हा वृक्ष बोला, ‘दादा ये कैसे स्वार्थी लोग हैं, जिन्होंने आपकी छाया ली, वे ही आज आपको काटने आ रहे हैं, क्या आपको गुस्सा नहीं आ रहा है।’ इस पर बूढ़े बरगद ने कहा, ‘गुस्सा किस बात का? मैं यह सोचकर प्रसन्न हो रहा हूं कि मैं मरने के बाद भी इनके काम आ रहा हूं।’ यही समर्पण है कि हर हाल में अपने दिल में परोपकार की भावना रखना।

अब सेवा में विश्वास को समझते हैं। सेवा कई तरह की होती है। कई बार व्यक्ति कामनायुक्त होकर सेवा करता है। यह सेवा दूसरे से लाभ लेने या फिर नुकसान पहुंचाने केलिए की जाती है। यह तामसिक सेवा कहलाती है, लेकिन जो निष्काम भाव से सेवा करता है तो वह सात्विक होती है, जिससे मोक्ष प्राप्त होता है। उदाहरणस्वरूप- रामायण काल में जटायु का बलिदान इसलिए महान बन गया, क्योंकि सीता की आर्त पुकार सुनकर सामथ्र्य न होते हुए भी उसने रावण से मोर्चा लिया और मोक्ष प्राप्त किया।

(आचार्य अनिल वत्स)

Posted By: Gunateet Ojha

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