[ सृजन पाल सिंह ]: कोरोना वायरस के संक्रमण के इस दौर में एक शताब्दी पुराना स्पेनिश फ्लू चर्चा में है। इसकी शुरुआत 1918 में प्रथम विश्व युद्ध में खुदाई करने वाले उन चीनी मजदूरों के साथ हुई, जो इस वायरस को चीन से यूरोप लेकर आए। इस वायरस ने युद्ध के दौरान दोनों खेमों के सैनिकों की जान ली। 1919 में युद्ध खत्म होने के पश्चात यह वायरस अपने-अपने देशों को वापस लौटते सैनिकों के साथ सभी देशों में फैल गया। इस दूसरी लहर में स्पेनिश फ्लू के वायरस ने कई शहरों को तहस-नहस किया और दो साल के भीतर करोड़ों लोगों की जान ले ली। मरने वालों में भारत के भी तमाम लोग थे।

महात्मा गांधी और अमेरिकी राष्ट्रपति  विल्सन को भी स्पेनिश फ्लू था

कहा जाता है कि महात्मा गांधी और अमेरिकी राष्ट्रपति वुड्रो विल्सन को भी यह बीमारी हुई। सच्चाई जो भी हो, उस समय के वैज्ञानिक मजबूर थे। उन्हें पता था कि स्पेनिश फ्लू किसी बहुत ही छोटे जीव से होता है। चूंकि तब तक इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप का आविष्कार नहीं हुआ था इसलिए स्पेनिश फ्लू के वायरस को देखने का कोई ठोस जरिया नहीं था। तत्कालीन वैज्ञानिकों को आरएनए का ज्ञान नहीं था जिससे वायरस बनते हैं।

दो साल के भीतर स्पेनिश फ्लू को हराने में सफलता मिली

मगर तब भी हार नहीं मानी गई और उस वायरस के खिलाफ जो बन पड़ा, किया गया। पुरानी वैक्सीन का मिश्रण इस्तेमाल किया गया, हर प्रकार की दवाइयों और जड़ी-बूटी आजमाई गईं। सब कुछ प्रतिकूल होने के बावजूद दो साल के भीतर मानवता उस अदृश्य दुश्मन को हराने में सफल हो गई। 

साहस और संयम के साथ एकता भी मानव का हथियार है

मानव एक बहुत ही जीवट प्रजाति है। हर तरह के संघर्ष में उसका सबसे बड़ा हथियार बनता है उसका दिमाग। मानव ने अपने विकास पथ में हिम युग को पार किया, अपने से बड़े जानवरों पर विजय प्राप्त की और सभी प्रजातियों से ऊपर अपना स्थान बनाया। साहस और संयम के साथ एकता भी मानव का हथियार है।

दो सौ वर्षों से हम अलग-अलग वायरस से लड़ रहे हैं

मानव ने जानलेवा टायफस पर विजय हासिल की, फिर चेचक और अन्य बीमारियों पर। टीबी अब एक बड़ी महामारी नहीं बची और हैजे से गांव के गांव अब समाप्त नहीं होते। दो सौ वर्षों से हम अलग-अलग वायरस से लड़ रहे हैं, मगर सच यह है कि हमने इस छोटे, मगर जानलेवा दुश्मन को पहली बार 1935 में देखा और इसकी पूरी संरचना की जानकारी हमें ही 1955 में हुई। इसके बाद से वायरस के खिलाफ लड़ाई में निरंतर तेजी आई।

वायरस का पूरा जीनोम मिलते ही वैक्सीन बनाने का काम चालू हो जाता है

कुछ लोग कह रहे हैं कि नॉवेल कोरोना वायरस अगला स्पेनिश फ्लू बनेगा। मगर विज्ञान की गति को देखते हुए ऐसा होना मुश्किल है। हमारी-आपकी नजरों से दूर दुनिया भर की प्रयोगशालाओं में तमाम वैज्ञानिक नॉवेल करोना वायरस के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। इसी जनवरी में कोरोना वायरस के संक्रमण के लगभग डेढ़ महीने बाद चीन ने इस वायरस का पूरा जीनोम यानी उसकी संरचना दुनियाभर के वैज्ञानिकों को उपलब्ध करा दी थी। डेढ़ दशक पहले ऐसा करने में ही एक साल से ऊपर लग जाता था। जीनोम मिलते ही वैक्सीन बनाने का काम चालू हो जाता है।

दुनिया ने हजारों करोड़ रुपये कोरोना वायरस को हराने में लगा दिए हैं

दुनिया भर की सरकारों ने हजारों करोड़ रुपये कोरोना वायरस को हराने में लगा दिए हैं और इसके नतीजे जल्द आने चाहिए। अमेरिकी सरकार की स्वास्थ्य संस्था बार्डा ने निजी कंपनियों के साथ मिलकर वैक्सीन बनाने की मुहिम चालू की है। सनोफी और जॉनसन एंड जॉनसन भी इसमें शामिल हैं। ये कंपनियां पारंपरिक तरीके से वैक्सीन बना रहीं है। इसके अलावा वैक्सीन बनाने के एक नए तरीके यानी रैपिड रिस्पांस सिस्टम को भी आजमाया जाया रहा है। इसमें वायरस से लड़ने के लिए जरूरी एंटीबॉडी बनाने का काम सीधे शरीर के इम्युनिटी सिस्टम को सौंप दिया जाता है। यह तरीका नया है, इसलिए इसके नतीजे अभी हमें देखने होंगे। वैसे अब तक के परिणाम सराहनीय हैं।

सार्स वायरस तक पहुंचने में 20 महीने लगे थे

मोडर्णा नाम एक कंपनी ने आरएनए का उपयोग करके अपनी पहली ट्रायल वैक्सीन जीनोम मिलने के महज 42 दिनों बाद तैयार कर ली थी। 2003 में जब सार्स वायरस फैला था तब इस चरण तक पहुंचने में 20 महीने लगे थे।

वैक्सीन को आने में एक साल से अधिक का समय लग सकता है

घातक बीमारियों के खिलाफ कई कीर्तिमान स्थापित करने वाले विज्ञान की तेज दौड़ के बाद भी सबसे जल्दी आने वाली वैक्सीन में एक साल से अधिक का समय लग सकता है। इस अंतराल को पाटने के लिए ऐसी दवाइयों पर काम हो रहा है जिससे इस वायरस से होने वाले जानलेवा प्रभाव को कम किया जा सके। गिलेड कंपनी अपनी एक दवा का चीन और अमेरिका में वायरस ग्रस्त लोगों पर प्रयोग करके देख रही है। इसके साथ ही मलेरिया की एक दवा का भी परीक्षण कोरोना वायरस पर चल रहा है। यह दवा कितनी प्रभावशाली है और इससे होने वाले दुष्प्रभाव क्या हैं, यह जानना अभी बाकी है।

इंटरनेट के माध्यम से पूरी दुनिया के वैज्ञानिक एकजुट

कोरोना वायरस के खिलाफ हमारी लड़ाई सिर्फ चिकित्साशास्त्र तक ही सीमित नहीं है। पिछले हफ्ते से अनेक ऑटोमोबाइल कंपनियां अपने प्लांट में गाड़ियों की जगह कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों के उपचार के लिए वेंटिलेटर बनाना शुरू कर चुकी हैं। हम सुपर कंप्यूटर्स का इस्तेमाल वायरस के खिलाफ विभिन्न परिस्थितियों को जांचने के लिए कर रहे हैं। इंटरनेट के माध्यम से पूरी दुनिया के वैज्ञानिक एकजुट हैं और वे जल्द किसी कामयाबी पर पहुंच सकते हैं।

विज्ञान की जीत तय है, मगर हथियार तैयार करने में समय लग सकता है

चूंकि हमें पता है कि हमारा दुश्मन कौन है और उसको हराने के लिए क्या करना है इसलिए इसके प्रति निश्चिंत रहा जा सकता है कि विज्ञान की जीत तय है, मगर उसे अपने हथियार तैयार करने के लिए समय की आवश्यकता है। यह समय हमें देना है-सामाजिक दूरी द्वारा।

कोरोना वायरस के खिलाफ छिड़ी लड़ाई जीती जाएगी

कोरोना वायरस के खिलाफ छिड़ी लड़ाई जीती ही जाएगी। वैज्ञानिकों की कोशिश है कि यह लड़ाई जल्द से जल्द जीती जाए और कम से कम लोग इससे प्रभावित हों। उम्मीद रखें कि अंधेरा छंटेगा और उम्मीदों का सूरज निकलेगा।

( लेखक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम सेंटर के सीईओ हैं )

Posted By: Bhupendra Singh

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