कैलाश बिश्नोई। देश में नई शिक्षा नीति लागू होने जा रही है। इससे देश की शिक्षा प्रणाली में कई बुनियादी बदलाव होंगे जिनका उद्देश्य शिक्षा को सभी के लिए सरल और सुलभ बनाना होगा। नई नीति के तहत राज्य स्कूल मानक प्राधिकरण में अब निजी और सरकारी दोनों प्रकार के स्कूल आएंगे तथा दोनों के लिए समान नियम तैयार किए जाएंगे। यही नहीं, कौन संस्थान किस कोर्स की कितनी फीस रख सकता है, इसका भी एक मानक तैयार करने की बात कही गई है। अधिकतम फीस कितनी हो, इसका दायरा भी तय होगा। एक समान नियमों के कारण प्राइवेट स्कूलों की मनमानी पर लगाम लगने की उम्मीद जगी है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि शिक्षा के व्यवसायीकरण के चलते तेजी से शिक्षा का प्रसार हुआ है। इसके अलावा शिक्षा के क्षेत्र में निजी भागीदारी से उत्पन्न प्रतिस्पर्धा के फलस्वरूप शिक्षा की गुणवत्ता में भी सुधार हो रहा है और शिक्षित लोगों के लिए रोजगार के अधिक अवसर उपलब्ध हो रहे हैं। शिक्षा में निजी स्कूलों को बढ़ावा देने से यदि कुछ लाभ हुए हैं तो इसके नुकसान भी कम नहीं है। शिक्षा में निजीकरण के कारण स्थिति ऐसी हो चुकी है कि इस पर प्रभावी नियमन की जरूरत महसूस की जाने लगी है। आज शिक्षा एक व्यवसाय बन गया है जिसका मूल मकसद शिक्षा कम, मुनाफा कमाना अधिक हो गया है। शिक्षा के बाजारीकरण का असर लगातार व्यापक हुआ है, लेकिन दुर्भाग्य से राजनीति के लिए शिक्षा आज भी चुनावी मुद्दा नहीं बन पाई है।

अगर बात अध्यापकों की योग्यता और उनके अनुभव की करें तो सरकारी स्कूल प्राइवेट स्कूलों से कहीं आगे हैं, लेकिन बुनियादी सुविधाओं के अभाव में इन स्कूलों में छात्रों की संख्या घटती जा रही है। इसी का फायदा निजी स्कूल उठा रहे हैं। आज यह धारणा आम है कि प्राइवेट स्कूलों द्वारा प्रदान की जाने वाली शिक्षा की गुणवत्ता सरकारी स्कूलों की तुलना में बेहतर है। इसलिए आश्चर्य की बात नहीं कि लोगों की वरीयता निजी स्कूल के प्रति होती है। किंतु विडंबना यह भी है कि निजी शिक्षण संस्थाओं में बहुत सारे तथ्य शिक्षण की गुणवत्ता के पैमाने पर खरे नहीं उतरते। शिक्षा नीति के मसौदे को लेकर गठित के कस्तूरीरंगन समिति ने सरकार से स्कूली शिक्षा में ऐसे निजी ऑपरेटरों को रोकने की भी सिफारिश की है, जो शिक्षा के मूल स्वभाव को नष्ट करते हुए स्कूल को एक वाणिज्यिक उद्यम के रूप में चलाने का प्रयास करते हैं।

प्राइवेट स्कूलों को अनाप-शनाप फीस बढ़ोतरी की अनुमति नहीं दी जा सकती, लेकिन वे स्कूल की जरूरी सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए कुछ फीस बढ़ा सकें, इसके लिए बीच का कोई रास्ता निकालना ही होगा। कई राज्यों ने स्कूल फीस के लिए रेगुलेटरी संस्थाएं बनाई हैं। ये संस्थाएं तय करती हैं कि जरूरत के हिसाब से फीस किस हद तक बढ़ाई जानी चाहिए। तमिलनाडु में ऐसी नियामक संस्था 2009 में ही बन गई थी। तमिलनाडु में फीस फिक्सेशन मॉडल बनाया गया है जिसके तहत एक सरकारी समिति को निजी स्कूलों द्वारा प्रस्तावित फीस स्ट्रक्चर को सत्यापित और स्वीकृत करने का अधिकार है। इसी तरह कर्नाटक में भी स्कूली शिक्षा कानून के तहत नियमों को तैयार करके स्कूल फीस की अधिकतम सीमा निर्धारित की गई। बाद में कई अन्य राज्यों ने भी इस प्रक्रिया का अनुसरण किया। लेकिन चिंता की बात यह है कि हर राज्य में फीस स्ट्रक्चर को लेकर अलग-अलग कानून होने से हर मामला न्यायालय में जाकर फंस रहा है।

फीस नियंत्रण के लिए राज्यों में पुख्ता योजना नहीं है। ऐसे में समय की मांग है कि केंद्र सरकार पूरे देश में फीस को लेकर एक समान कानून बनाए। अगर इस तरह का कानून देश में आता है तो उम्मीद है कि केवल पैसा कमाने के मकसद से खोले गए बहुत सारे स्कूल बंद हो जाएंगे।

[अध्येता, दिल्ली विश्वविद्यालय]

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