[ शक्ति सिन्हा ]: हम भारतीयों को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का गर्व है और होना भी चाहिए। इसके साथ ही हम इस पर भी गर्व करें कि हम किसी प्रक्रिया के जरिये नहीं, बल्कि मूल रूप से लोकतंत्र हैं। चुनाव लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन यही पर्याप्त नहीं। यह वास्तव में गणतंत्र ही है जो एक लोकतंत्र को जीवन एवं आकार देता है। गणतंत्र का अर्थ ही है विधिसम्मत शासन यानी कानून की दृष्टि में सभी बराबर हैं। एक लोकतांत्रिक गणराज्य में सरकार एक साधन है जो समाज की सेवा में रत है, जो संप्रभु है।

गणतंत्र को अंग्रेजों की देन बताना गलत है

कुछ लोग गणतंत्र को अंग्रेजों की देन बताते हैं। यह सच्चाई से काफी दूर है। तथ्य यही है कि भारत के विभिन्न हिस्सों पर अलग-अलग गणराज्य शासन कर रहे थे। उनकी संरचनाएं एकसमान नहीं थीं, लेकिन उनकी जवाबदेही थी। शासक निरंकुश तरीके से निर्णय नहीं ले सकते थे। वे स्वयं निर्धारित नियमों और प्रक्रियाओं से बंधे हुए थे।

वैशाली का लिच्छवी प्राचीन गणराज्यों में सबसे प्रमुख भौगोलिक क्षेत्र था

वैशाली का लिच्छवी प्राचीन गणराज्यों में सबसे प्रमुख और सबसे बड़ा भौगोलिक क्षेत्र था। यह उत्तर बिहार के अधिकांश हिस्सों में फैला हुआ था। उत्तर प्रदेश के काशी और कोसल भी उससे लगे हुए थे। वास्तव में लिच्छवी 25 से अधिक गणराज्यों का संघ था। कपिलवस्तु के पूर्व में कोलिय का रामाग्राम गणराज्य था। त्रिपिटक बताते हैं कि बुद्ध द्वारा मध्यस्थता कराने से पहले गणराज्य एक दूसरे के साथ संघर्षरत रहते थे। मिथिला गणराज्य, जो तराई से गंगा की ओर बढ़ा, विदेह में स्थित था। तराई क्षेत्र में एक और गणराज्य कोल्लंगा में घ्वात्रिकों का गणराज्य था। मिर्जापुर के पास वाराणसी के दक्षिण में सूर्यसमागिरि में भाग्य गणतंत्र फैला हुआ था।

सिकंदर के आक्रमण का विरोध अस्माक समेत कई गणराज्यों ने किया था विरोध

सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया तब अस्माक गणराज्य और अन्य गणराज्यों ने उसका डटकर विरोध किया। हालांकि मगध साम्राज्य के उदय के साथ पहले नंद वंश और बाद में मौर्यों के तहत, इनमें से अधिकांश गणराज्यों ने कई राज्यों के साथ-साथ अपनी स्वतंत्रता खो दी। फिर भी यह भारतीय गणराज्यों का अंत नहीं था। मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद वे फिर से फैल गए। गुप्त वंश के उदय के साथ अधिकांश गणराज्यों ने अपना स्वतंत्र अस्तित्व खो दिया था, लेकिन सरकार का स्वरूप कुछ हद तक बना रहा।

गणराज्यों के तीन प्रकार थे

गणराज्यों के भी तीन प्रकार थे। पहला शुद्ध गण थे, जिसमें प्रशासन में कुल वयस्क-आबादी भाग लेती थी। दूसरा, अभिजात वर्ग या शुद्ध कुल, जिसमें केवल कुछ र्चुंनदा परिवार प्रशासन में भाग लेते थे और तीसरा मिश्रित जिसमें लोकतंत्र, कुल और गण का मिश्रण था। प्रशासनिक रूप से इन राज्यों को दो रूपों में आयोजित किया गया-या तो एकात्मक या संघीय। गणतंत्र के केंद्र में सभा थी। इसमें पूरी वयस्क आबादी या कुछ स्थानों पर परिवारों के प्रमुख शामिल थे।

राज्य को संचालित करने की जिम्मेदारी निर्वाचित कार्यकारी को सौंपी गईं

कुछ राज्यों में सभाओं ने अपने स्थानीय प्रशासन की देखभाल के लिए व्यापक स्वायत्तता का आनंद लिया और पूरे राज्य से संबंधित मामलों का फैसला सभी सदस्यों द्वारा किया गया जबकि अन्य में पूरे राज्य को संचालित करने की शक्तियां एक निर्वाचित कार्यकारी को सौंपी गईं। इस निर्वाचित निकाय को आमतौर पर समिति के रूप में जाना जाता था। समितियों के लिए चुनाव मौजूदा स्वरूप वाले नहीं थे। लोगों को उनकी योग्यता के आधार पर चुना जाता था। समिति कार्यकारी का गठन करती थी जो दिन-प्रतिदिन के आधार पर राज्य का संचालन करती थी। समिति के प्रमुख को कभी-कभार राजा कहा जाता था, लेकिन न तो वह और न ही कोई पदाधिकारी अपने बेटों को पदस्थ कर सकते थे। इसमें उत्तराधिकार पूरी तरह गायब था।

गणराज्यों को लेकर हमारी अपनी एक समृद्ध परंपरा रही

तब भारतीय गणतंत्र के मार्गदर्शक सिद्धांत क्या थे? राजा के दैवीय अधिकारों का कोई संकेत नहीं है। यहां तक कि वंशानुगत राजा को अपने शासन को बनाए रखने के लिए स्वीकृति की आवश्यकता थी। राज्य का मौलिक कर्तव्य था- धर्म, न्याय और संविदा इत्यादि को बनाए रखना। इससे यही आभास होता है कि गणराज्यों को लेकर हमारी अपनी एक समृद्ध परंपरा रही है। हमें उस पर ध्यान देकर सबक लेने होंगे। यदि कोई राजनीतिक प्रणाली अपनी मिट्टी से जुड़ी है तो उसकी सफलता की संभावनाएं स्वयं बढ़ जाती हैं।

[ लेखक ] 

Posted By: Bhupendra Singh

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