[अरविंद कुमार सिंह] भारतीय रेलवे की जमीन पर अतिक्रमण कोई नई बात नहीं है। खासकर धार्मिक स्थलों के निर्माण के जरिये यह पहले से होता आ रहा है। गाजियाबाद का मामला भले प्रशासन के नए आदेश से चर्चा में आ गया हो, पर ऐसे बहुत से मामले हैं। गाजियाबाद में ही रेलवे की भूमि पर इस मजार के अलावा माल गोदाम के पास भी एक मजार है। वहां जाने पर रोक नहीं है। अधिकारियों का कहना है कि वहां जाने के बहाने कुछ असामाजिक लोग आ जाते थे। अब आरक्षित टिकट वाले यात्री ही प्लेटफॉर्म पर जाएंगे।

कोरोना काल के दौरान ही सितंबर 2020 में उत्तर प्रदेश में बरेली के पास बहेड़ी रेलवे स्टेशन के करीब एक धार्मिक स्थल पर अवैध निर्माण रोकने में पुलिस और प्रशासन को सफलता मिली। स्टेशन मास्टर की शिकायत पर पुलिस ने निर्माण कार्य रुकवाया। सामान्य स्थिति होती तो हो सकता है कि इन मुद्दों पर राजनीति होती और काफी हल्ला होता। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। रेलवे ने कोरोना संकट के दौरान पुलों से लेकर यार्ड रिमॉडलिंग तक के ऐसे कई कार्यो को साकार किया जो भीड़-भाड़ के नाते पहले संभव नहीं हो पा रहे थे। अनेक रेलमार्गो पर सुरक्षा और संरक्षा की कई परियोजनाएं साकार हुईं। संचालन की राह में कई बाधाएं भी हटीं। लेकिन चंद मामलों को छोड़ दें तो अवैध निर्माणों के मामले में कोई ठोस पहल हुई ऐसा लगता नहीं, क्योंकि सामान्य प्रशासन की तरह रेल प्रशासन भी अपनी भूमि पर बने धर्मस्थलों को हटाने के प्रति यथास्थिति बनाए रखने वाला ही रहा है। इसी नाते कई व्यस्त रेलवे स्टेशन परिसर में मंदिर, मस्जिद, मजारें और दूसरे धर्मस्थल कायम हैं, जो कई बार सामान्य रेल संचालन की राह में चुनौती भी पैदा करते हैं। चूंकि इन जगहों पर खास मौकों पर भारी भीड़ जुटती है जिससे यात्रियों को कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

रेल की संपत्ति

भारतीय रेल देश के सबसे बड़े जमींदारों में है। इसके पास करीब 4.78 लाख हेक्टेयर भूमि है जिसमें से करीब 821 हेक्टेयर अवैध कब्जे में है। जितनी जमीन से रेलवे कब्जा हटाता है, नया कब्जा बढ़ जाता है। सबसे अधिक समस्या रेलवे को खाली पड़ी जमीनों पर आती है। प्रशासन की मदद से ही बहुत सी जमीनों पर अवैध कब्जे हो गए। पिछली सदी के आठवें दशक में अधिक अन्न उपजाओ योजना में रेलवे ने जो जमीन पट्टे पर दी, उनमें कहीं रेस्टोरेंट चल रहे हैं तो कहीं कुछ और काम। दिलचस्प यह है कि रेलवे के पास अपनी कुल जमीनों के दस्तावेज तक नहीं थे। पहले रेलवे की 4.2 लाख हेक्टेयर जमीन आंकी गई थी। जमीनों का रिकार्ड अपडेट हुआ तो पता चला कि 4.31 लाख हेक्टेयर जमीन है जिसमें से 45 हजार हेक्टेयर खाली थी। पहले निजी रेल कंपनियों या रियासतों ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 के लागू होने के पहले जो जमीनें ली थीं, वह दौर अलग था। आजादी के बाद रेल प्रणालियों का एकीकरण हुआ तो रेलवे ने जमीनों का रिकार्ड जुटाना आरंभ किया, लेकिन सर्वेक्षण, भूमि सीमांकन जैसे जटिल काम के लिए रेलवे ने भूमि प्रबंध निदेशालय 1982 में जाकर स्थापित किया। वर्ष 1992 में भी रेलवे के पास विधिवत राजस्व अधिकारियों से प्रमाणित 80 फीसद जमीनों के अभिलेख हासिल हो सके थे। सितंबर 1990 के बाद रेल मंत्रलय ने क्षेत्रीय रेलों को सभी प्रकार के अतिक्रमणों का विवरण जुटाने का आदेश दिया। मार्च 1991 में पता चला कि 1.7 लाख अतिक्रमण के मामले थे, जिसमें से 26,664 मामलों में कब्जेदार अदालत चले गए थे। रेलवे संबंधी संसदीय समिति ने जमीनों की सुरक्षा के लिए चारदीवारी और कंटीले तार लगवाने को कहा। स्टेशन अधीक्षकों और रेलवे सुरक्षा बल के निरीक्षकों को अतिक्रमण के मामले में जवाबदेही दी गई। फिर भी काफी जमीनों पर अतिक्रमण है। वैसे रेल मंत्रलय दावा करता है कि अतिक्रमण महज 0.18 फीसद जमीनों पर ही है। पिछले तीन वर्षो में रेल प्रशासन ने करीब 70 हेक्टेयर भूमि दोबारा हासिल की है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि सबसे अधिक 205 हेक्टेयर जमीन पर उत्तर रेलवे में अतिक्रमण है। वर्ष 2015 में दिल्ली के शकूरबस्ती में रेलवे की जमीन पर झुग्गियों को हटाने में रेलवे को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा था।

रेलवे की चुनौतियां

भारतीय रेल के पास आठ हजार से अधिक स्टेशन हैं। इनको आमदनी के लिहाज से कई श्रेणियों में बांटा गया है। लेकिन सबसे निचले 4,274 स्टेशनों की स्थिति एकदम अलग है। इनके आसपास बहुत से अतिक्रमण धर्मस्थलों के हैं। बड़े स्टेशनों की अलग चुनौती है और वहां रेल प्रशासन के लिए भीड़ नियंत्रित करना ही बहुत मुश्किल होता है। रेलवे के 195 स्टेशन बेहद संवेदनशील हैं, जहां समेकित सुरक्षा प्रणाली के तहत भारी धन व्यय करना पड़ता है। सीसीटीवी कैमरा नेटवर्क से लेकर स्कैनिंग प्रणाली और बम डिटेक्शन से लेकर कई दूसरी प्रणालियों पर खर्च करना पड़ता है। रेल परिसरों, पटरियों और रेलगाड़ियों में विस्फोट की कई घटनाएं हुई हैं जिसमें मुंबई में 2006 की घटनाओं ने देश को हिला दिया था। कई इलाकों में उग्रवादियों, आतंकवादियों और नक्सलियों की चुनौती भी रेल प्रशासन के समक्ष रहती है। ऐसे में अतिक्रमण से निपटना आसान काम नहीं। तमाम महत्वपूर्ण मौकों जैसे गरमी की छुट्टियां, होली, दीवाली, ईद और कई दूसरे त्योहारों और मेलों में विशेष रेलगाड़ियां चलती हैं।

भारतीय रेल का शुभारंभ वर्ष 1853 में हुआ जब भारत की पहली रेलगाड़ी चली। वर्ष 1869 तक निजी रेल कंपनियों और बाद में सरकारी संस्थाओं, देशी रियासतों और जिला बोर्डो ने रेल लाइनें बिछाईं और स्टेशन बनाए। वर्ष 1900 तक भारत में 23,672 किमी रेल लाइनें बिछीं। आरंभिक रेलों का निर्माण ब्रिटिश पूंजी से हुआ। सरकार ने उनको जरूरत के अनुकूल भूमि दी जिन पर धाíमक स्थल भी छोटे हिस्से में बने जिनका बाद में विस्तार होता गया।

उच्च न्यायालयों समेत उच्चतम न्यायालय ने रेलवे और सड़कों पर अवैध कब्जों को लेकर सख्ती दिखाई जिससे कई जगह तस्वीर बदली भी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2013 में सार्वजनिक जमीनों पर अवैध रूप से बने धर्मस्थलों को हटाने का निर्देश दिया तो पता चला कि राज्य में ऐसे 45,152 अवैध धाíमक निर्माण हैं। सबसे अधिक सुभीते की जगह सड़क किनारे की सरकारी भूमि होती है जिस पर निर्माण जितना सरल होता है, प्रशासन के लिए उसे हटा पाना उतना ही कठिन। स्थानीय राजनीति और सांप्रदायिक सौहार्द का मुद्दा अलग होता है। लेकिन प्रशासन चाहे तो नए निर्माण को होने से रोक सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने 2009 में अवैध धाíमक स्थलों को हटाने को लेकर एक सख्त आदेश दिया तो ऐसे स्थलों को चिन्हित किया गया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तो राजमार्गो, रेलमार्गो एवं अन्य रास्तों के किनारों पर अनाधिकृत रूप से बने धाíमक स्थलों पर काफी सख्ती दिखाई थी। आदेश पर अमल जरूर हुआ, लेकिन सीमित।

परिसर में धर्मस्थल

बहुत पुराना संगठन होने के नाते रेलवे परिसर में ऐसे स्थल कई जगहों पर हैं और रेल संचालन को दिक्कत भी पैदा करते हैं। पहले जब भीड़-भाड़ कम थी तो दौर अलग था। जैसे दक्षिण पूर्व रेलवे में दामोदर नदी के करीब तलगड़िया रेलवे स्टेशन पर वर्ष 1930 में रेलवे लाइन बनते समय एक सती चौरा के नाते रेल लाइन को ही घुमाना पड़ा। वर्ष 1933 में इस क्षेत्र के वरिष्ठ रेल अधिकारी जॉन डब्ल्यू मिशल ने लिखा, इस जगह पर धाíमक प्रवृत्ति के अनेक लोग फूल चढ़ाते हैं और प्रार्थना करते हैं। स्टेशन प्लेटफॉर्म पर इसे देख कर मैं अचंभित हुआ, लेकिन जिस इंजीनियर ने लाइन बनवाई उसी से इसका जवाब मिला।

उस दौरान यह स्थल स्टील की चादरों से घिरा था, लेकिन बाद में चार फीट ऊंचा चबूतरा बना दिया गया जिस पर तुलसी का पौधा लगा है। माघी पूíणमा पर स्टेशन मेले में तब्दील हो जाता है। रेलवे इंजीनियर ने एक साधु की सलाह पर रेल लाइन को मोड़ा था और सती चौरा को बचाया। रेलवे परिसरों में ऐसी तस्वीर कई जगहों पर देखी जा सकती है। रेलवे स्टेशनों के बाहर तो बहुत सी जगहों पर कई धर्मस्थल भारी भीड़-भाड़ से भरे रहते हैं।

देश की जीवन रेखा भारतीय रेल के किसी भी डिब्बे में प्रवेश कीजिए तो वहां छोटा भारत दिखेगा। रेलवे स्टेशन स्थानीय संस्कृति के प्रतीक हैं। इस नाते कई स्टेशन मंदिर जैसे दिखते हैं तो देश के सबसे बड़े स्टेशनों में शामिल पुरानी दिल्ली मस्जिद और किले जैसा लगता है। अयोध्या में 104 करोड़ रुपये से अधिक लागत के साथ जो नया रेलवे स्टेशन बन रहा है, वह मंदिरों की नगरी में नए मंदिर का बोध कराएगा। बेशक रेलवे कालोनियों में आस्था के हिसाब से धर्मस्थल कायम हैं। लेकिन रेल परिसर में कई धर्मस्थल काफी पुराने हैं। इस नाते उनको हटाने से रेलवे कतराता है। वैसे भी रेलवे के पास इनका कोई विस्तृत अध्ययन नहीं है। कई जगहों पर रेल प्रशासन और स्थानीय आबादी ने आपस में तालमेल बिठा लिया है। धर्मस्थलों पर अवैध कब्जे के मामले में भी हाथ डालने से सामान्यतया प्रशासन कतराता है। लेकिन सुरक्षा और संरक्षा के लिहाज से चुनौती भरे इलाकों में जो काम गाजियाबाद में हुआ, वह काम तो किया ही जा सकता है।

हाल ही में प्रशासन ने गाजियाबाद रेलवे स्टेशन के एक प्लेटफॉर्म पर स्थित पुरानी मजार में सुरक्षा कारणों से प्रवेश पर पाबंदी लगा दी है। दरअसल गुरुवार को यहां काफी लोग आते हैं। हालांकि फिलहाल प्रतिबंध गैर यात्रियों पर लगा है और वैध टिकटधारियों के लिए मजार पर जाने की पाबंदी नहीं है। चूंकि गाजियाबाद भारतीय रेलवे के काफी व्यस्त स्टेशनों में शामिल है जहां रोजाना भारी भीड़ उमड़ती है तथा तमाम महत्वपूर्ण यात्री गाड़ियां यहां रुकती हैं, लिहाजा ऐसा फैसला लिया गया है। वैसे गाजियाबाद स्टेशन इस मामले में अकेला नहीं है, कई अन्य स्टेशनों पर भी यह समस्या कायम है।

(वरिष्ठ पत्रकार और पूर्व सलाहकार, भारतीय रेल)

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