[ यशपाल सिंह ]: हमारा प्रजातंत्र विधि के शासन यानी कानून के राज के सिद्धांत पर आधारित है। इसका अर्थ है कि कोई आरोपित तब तक दंडित नहीं किया जा सकता जब तक न्यायिक प्रक्रिया से गुजरते हुए उसे पूर्णतया दोषी साबित न कर दिया जाए। मापदंड रखा गया है कि 99 अपराधी भले छूट जाएं, परंतु किसी एक भी निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए। इसके लिए एक पूरा आपराधिक न्यायिक तंत्र है, जिसके अंग पुलिस, अभियोजन और न्यायपालिका है। एक आपराधिक प्रक्रिया संहिता यानी सीआरपीसी और साक्ष्य अधिनियम भी है। इसी के आधार पर मुकदमा चलता है और भारतीय दंड संहिता अर्थात आइपीसी के तहत दोषियों को दंडित किया जाता है। यह सारा तंत्र अंग्रेजों ने खड़ा किया था। वे भारत पर शासन करना चाहते थे, लेकिन इसी के साथ वे समाज में शांति स्थापित कर भारत की जनता का विश्वास भी जीतना चाहते थे। इसमें वे काफी हद तक सफल भी रहे।

अंग्रेजों ने कानून का इकबाल किया कायम, गवाह के टूटने का कोई प्रश्न ही नहीं था

आखिर चंद अंग्रेज इतने बड़े-बड़े जिलों को कैसे चला लेते थे? तब लोगों को विश्वास था कि अगर किसी ने अपराध किया है तो उसे दंड अवश्य मिलेगा। अंग्रेजों ने कानून का इकबाल कायम किया। तब पुलिस के मुकदमों में किसी गवाह के टूटने या गवाही पर न जाने का कोई प्रश्न ही नहीं था। तत्कालीन समाज की सोच भी कुछ ऐसी थी। लोग झूठ बोलना पाप समझते थे और अपराधी का साथ देने में बेइज्जती। अंग्रेजों के समय आजकल की तरह एनकाउंटर न के बराबर होते थे। हवालात में कोई मर जाए तो एसओ दंडित हो जाते थे। डीएम/एसपी का ही निर्णय लगभग अंतिम होता था। न किसी जाति या पार्टी की बात आती थी और न ही किसी नेता की टांग घुसती थी। आज स्थिति बिल्कुल अलग है। नेता जी अपनी टांग हर जगह घुसाए पड़े हैं और हर मामले का विश्लेषण जाति और पार्टी के वोटों के आधार पर ही होता है।

वोट की राजनीति के चलते हर नेता बाहुबली को संरक्षण देते हैं

चूंकि बाहुबली वोट की राजनीति में बहुत उपयोगी होते हैं अत: हर नेता उन्हेंं संरक्षण देता है। वे अपराध करने लगते हैं और धनबली हो जाते हैं। आज का हर अपराधी कुछ सनसनीखेज घटनाओं को अंजाम देने के बाद माफिया या डॉन बनकर अंधाधुंध कमाई और उगाही करता है। अब तो वह विधायक-सांसद भी बनना चाहता है और कई बार बन भी जाता है। दुर्भाग्यवश हमारा पुराना आपराधिक न्यायिक तंत्र आज जर्जर और प्रभावहीन हो चुका है।

विकास दुबे ने आपराधिक जीवन में 60 से ऊपर अपराध किए, 31 मामलों में जमानत पर था

विकास दुबे ने अपने आपराधिक जीवन में 60 से ऊपर अपराध किए। इनमें कई हत्याएं हैं। एक राज्य मंत्री की तो उसने दिन दहाड़े थाने में ही हत्या कर दी थी, फिर भी कुछ समय बाद उसे जमानत मिल गई। फिर वह बरी भी हो गया। कमजोरी चाहे पुलिस की रही हो या अभियोजन की या फिर साक्ष्य अधिनियम की, नतीजा तो शून्य ही रहा। आखिर ऐसा व्यक्ति दुर्दांत अपराधी नहीं बनेगा तो क्या बनेगा? वह 31 मामलों में जमानत पर था। क्या जमानत की कोई समय सीमा नहीं हो सकती?

सुधार से लंबित मुकदमों की संख्या में अप्रत्याशित कमी आएगी

अगर जघन्य अपराध में जमानत देते समय यह भी आदेश कर दिया जाए कि यह जमानत केवल एक-दो वर्षों के लिए है और अगर जनपदीय न्यायालय से इस अवधि में फैसला नहीं होता तो जमानत स्वत: समाप्त हो जाएगी तो तारीख पर तारीख लेने का रोग खत्म हो जाएगा। इस एक सुधार से लंबित मुकदमों की संख्या में अप्रत्याशित कमी भी आ जाएगी।

आपराधिक न्यायिक तंत्र को सुधारने के प्रयास नहींं हुए 

दुर्भाग्य से आपराधिक न्यायिक तंत्र को आज के सामाजिक वातावरण के अनुसार सुधारने का कोई गंभीर प्रयास किया ही नहीं गया। 1970 के दशक में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी धर्मवीर की अध्यक्षता में जो पुलिस आयोग बना उसने आठ खंडों में व्यापक रिपोर्ट दी, पर कुछ नहीं हुआ। इसके बाद न्यायाधीश वीएस मालिमथ की अध्यक्षता में एक समिति बनी। इस समिति ने आपराधिक न्याय प्रक्रिया में सुधार के सुझाव दिए पर कुछ नहीं हुआ। पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह की याचिका पर उच्चतम न्यायालय ने 2006 में पुलिस सुधार के आदेश दिए, परंतु उस पर भी कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया। आखिर ऐसा क्यों हुआ, देश को इसका जवाब चाहिए।

शातिर अपराधियों को साक्ष्य के अभाव में सजा नहीं मिल पाती

आज की एक गंभीर समस्या यह है कि शातिर अपराधियों को साक्ष्य के अभाव में सजा नहीं मिल पाती। इस समस्या का कारण यह है कि कुख्यात अपराधी न्यायालय में रखे जाने वाले साक्ष्य को शून्य करना जानते हैं। उनके बाहुबल और धनबल के कारण कोई गवाही नहीं देता। पैसा लो या मौत, गवाह को यह संदेश काफी है। उन्हेंं देर-सबेर जमानत भी मिल जाती है। इसके बाद मुकदमा उन्हीं की सुविधानुसार चलता है। वे कोई न कोई कानूनी अड़चन खड़ी कर तारीख लेते रहते हैं।

विकास दुबे एक के बाद एक अपराध करता रहा और जमानत पाता रहा

विकास दुबे ने यही किया। थाने में राज्यमंत्री को दिन दहाड़े मारकर बरी हो जाना एक तरह से असंभव को संभव करना था। वह एक के बाद एक अपराध करता रहा और जमानत भी पाता रहा। उसके हथियारों के लाइसेंस तक निरस्त नहीं हो सके। उसके सामने आपराधिक न्यायिक तंत्र पूर्णत: फेल और अर्थहीन था।

आखिर संदेह का लाभ हमेशा मुल्जिम को ही क्यों मिलता है?

समुचित साक्ष्य न्यायाधीश के समक्ष पहुंचें, इसके लिए कानूनी प्रक्रिया और साक्ष्य अधिनियम कौन सुधारेगा? गवाहों के मुकर जाने की लाइलाज बीमारी कौन ठीक करेगा? जब पुलिस विवेचना के दौरान गवाहों के बयान पर हस्ताक्षर नहीं करा सकती तो फिर तीन सौ-पांच सौ पेज के आरोप पत्र का क्या मतलब? विवेचक जो केस के बारे में सब कुछ जानता है उसके कोर्ट में दिए गए बयान को पूरी अहमियत क्यों नही दी जाती? आखिर संदेह का लाभ हमेशा मुल्जिम को ही क्यों मिलता है? क्या उस पर कुछ अस्थाई प्रतिबंध नहीं लग सकता? क्या वादी यानी पीड़ित को राज्य कुछ मुआवजा नहीं दे सकता?

न्याय प्रक्रिया पर भरोसा खोना

आज स्थिति यह है कि वादी तमाम हिम्मत दिखाता है, धमकी और प्रलोभन के बाद भी अदालत के चक्कर लगाता है, पर अक्सर उसे न्याय नहीं मिलता। जब ऐसा होता है तो उसके साथ अन्य दूसरे लोग भी न्याय प्रक्रिया पर भरोसा खो देते हैं। हमें समझना होगा कि हमारी आपराधिक न्याय प्रक्रिया और साक्ष्य अधिनियम आरोपितों के हितों की रक्षा करते हुए दिखाई पड़ते हैं।

जब तक व्यवस्था में बदलाव नहीं होगा तब तक विकास दुबे पैदा होते रहेंगे

जब तक मौजूदा व्यवस्था में बदलाव नहीं होगा तब तक विकास दुबे पैदा होते रहेंगे। इससे खराब बात और कोई नहीं हो सकती कि हम विधानमंडलों में डकैती, हत्या, अपहरण के आरोपितों को आना नहीं रोक पा रहे हैं। आखिर इससे समाज में क्या संदेश जाता है? हमारी संस्कृति और समाज ने ऐसे लोगों को कभी सम्मान नहीं दिया, पर आज वे पा रहे हैं। यह शर्म की बात है।

( लेखक उप्र के डीजीपी रहे हैं )

Posted By: Bhupendra Singh

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