[आलोक मिश्र]। बिहार में अब पार्टियां अपना हर कदम विधानसभा चुनाव को देखते हुए ही उठा रही हैं। नफा-नुकसान का आकलन कर पत्ते फेटे जा रहे हैं। राज्यसभा चुनाव इसकी बानगी है। प्रत्याशियों के चयन में खासकर राजद के रुख ने साफ कर दिया है कि वह अब अपना चोला बदल रहा है।

तमाम समीकरणों को धता बताकर अचानक समृद्ध थैली वाले एक अनजाने नाम अमरेंद्र धारी सिंह (एडी सिंह) को सामने लाकर उसने ऐसी चाल चल दी, जो दल और बाहर दोनों के लिए विचारणीय है। कारण एडी सिंह का भूमिहार होना, जो लालू के परंपरागत वोट बैंक मुस्लिम-यादव में फिट नहीं होता। ऐसे में लालू का यह कदम एनडीए के वोटों मे सेंधमारी जैसा दिख रहा है।

'माय' को छोड़ सवर्णों को साधने का प्रयास

बिहार के चुनाव में जाति का खासा महत्व होता है। सभी दल अपने-अपने हिसाब से गोटियां सेट करते हैं। लालू को हमेशा अपने माय (मुस्लिम-यादव) समीकरण पर भरोसा रहा है, लेकिन लंबे समय से सत्ता से दूर रहने के कारण यह मिथक टूटा है। पार्टी भी मानकर चल रही है कि पिछड़ों और मुस्लिमों की राजनीति के सहारे सत्ता मिलना मुश्किल है। इसलिए सवर्णो को साधने की कोशिश शुरू हो गई है।

550 करोड़ से ज्यादा के मालिक हैं अमरेंद्र धारी सिंह

प्रदेश अध्यक्ष सहित संगठन में कई ओहदेदार सवर्ण जाति से बनाए गए हैं और अब राज्यसभा चुनाव में यह माना जा रहा था कि लालू अपने परंपरागत वोट बैंक को ध्यान में रखकर किसी को चुनेंगे, लेकिन यह कयास भी टूट गया। शुक्रवार सुबह राजनीति में अनजान 550 करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति वाले अमरेंद्र धारी सिंह का जब नाम सामने आया तो वह अधिकांश के लिए अनजान था। वैसे उनके पिता तेजप्रताप धारी सिंह का संबंध समृद्ध घराने से रहा है और नाना सीपीएन सिंह कई राज्यों के राज्यपाल रह चुके हैं। अमरेंद्र धारी सिंह व्यवसायी हैं। राजद ने उनका परिचय समाजसेवी के रूप में भी दिया।

सुपर-30 संस्थान की सहायता करते रहे हैं

चर्चा है कि अमरेंद्र धारी सिंह, पटना में आइआइटी की तैयारी के लिए चलने वाले संस्थान अभयानंद सुपर-30 की वित्तीय सहायता करते रहे हैं। हालांकि इसका जिक्र करने पर इसे चलाने वाले पूर्व डीजीपी अभयानंद ने सुपर-30 से खुद को यह कहते हुए अलग कर लिया कि वे एक शिक्षक हैं और अब इसका राजनीतिक लाभ लिया जा सकता है, इसलिए वे इसे छोड़ रहे हैं।

बिहार में खाली हुईं राज्यसभा की पांच सीटें

राज्यसभा की पांच सीटें बिहार से खाली हुई थीं। पहले ये पांचों सीटें एनडीए के पास थीं, लेकिन इस बार दो राजद के कोटे में गईं और एनडीए में तीन, जिसमें दो जदयू व एक भाजपा के खाते में। जदयू ने कोई दांव न खेलते हुए पिछली बार के तीन सदस्यों में से कहकशां परवीन को छोड़कर रामनाथ ठाकुर व हरिवंश को, जबकि भाजपा ने पूर्व मंत्री सीपी ठाकुर के पुत्र विवेक ठाकुर का नाम तय किया। विवेक ठाकुर भी भूमिहार ही हैं। राजद ने एडी सिंह के अलावा प्रेमचंद गुप्ता को अपना प्रत्याशी बनाया है। प्रेमचंद गुप्ता लंबे समय से लालू से जुड़े रहे हैं और वह भी अरबपति हैं। जातिगत समीकरण के अलावा सियासी हलके में राजद कोटे से तय नामों के पीछे उनका धनकुबेर होना ज्यादा चर्चा का विषय है।

खुद को मुख्यमंत्री घोषित करने वाली युवती भी चर्चा में

राजद ने भूमिहार को टिकट क्यों दिया, पैसे के लिए या उस जाति के वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए, इसी चर्चा के बीच बिहार की एक और घटना उत्सुकता जगा रही है। एक ऐसी युवती चर्चा में है, जो खुद को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित करते हुए नए तरह का राजनीतिक अभियान चला रही हैं। वह पहले विज्ञापन के माध्यम से अखबारों के पहले पन्ने पर और फिर सोशल मीडिया पर प्रकट हुईं। इनका नाम पुष्पम प्रिया चौधरी है, जिन्होंने यूरोपियन शैली में बिहार में चुनाव लड़ने की घोषणा की है। पुष्पम बिहार के दरभंगा जिले के एक नेता की बेटी हैं, जो जदयू के टिकट पर विधान पार्षद (एमएलसी) रहे हैं। पुष्पम ने सीधे घोषणा कर दी कि वह बिहार की सीएम कैंडिडेट हैं।

बिहार के नेताओं को बहस की खुली चुनौती

पुष्पम अभी सामने नहीं आई हैं, लेकिन संदेशों के जरिये बिहार के ‘असंवेदनशील’ और ‘अयोग्य’ नेताओं से बहस की चुनौती दे रही हैं। दावा, बिहार को 200 परसेंट ग्रोथ रेट देने की कार्ययोजना का ब्लू प्रिंट उनके पास होने का है। वह लंदन में पढ़ी हैं और उनके दावे लोगों को चौका रहे हैं। इस तरह के दावे पहले भी होते रहे हैं। सन ऑफ मल्लाह कहलाने वाले मुकेश सहनी और वरिष्ठ नौकरशाह अमिताभ वर्मा के पुत्र ऑक्सफोर्ड के छात्र रहे अक्षय वर्मा ने भी पहले ऐसे ही दावे किए थे।

(स्थानीय संपादक, बिहार)

Posted By: Amit Singh

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