प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के पांच वर्ष बाद 1969 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की स्थापना हुई थी। जेएनयू देश का प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय है और उसमें हुई हाल की घटनाओं से लोग चिंतित हैं। नेहरू ने कहा था कि एक विश्वविद्यालय मानवता के लिए है। वह सहिष्णुता, विवेक, साहसिक विचारों और सत्य की खोज के लिए है। यदि विश्वविद्यालय अपने दायित्वों का सम्यक निर्वहन करते हैं तभी वे राष्ट्र और जनता के साथ हैं। क्या जेएनयू नेहरू की अपेक्षाओं पर खरा उतरा है? जेएनयू विवाद में अनेक मुद्दे एक साथ उलझ गए हैं, जैसे विश्वविद्यालय की स्वायत्तता, छात्रों की स्वतंत्रता, राष्ट्रवाद, सेक्युलरिज्म व वामपंथी विचारधारा के मिश्रण से उपजे वातावरण की आड़ में कुछ राष्ट्र-विरोधी तत्वों की गतिविधियां आदि। जेएनयू शुरू से ही वामपंथी बुद्धिजीवियों की गिरफ्त में आ गया, क्योंकि इसे बनाने और नियुक्तियां करने का दायित्व वामपंथी-उदारवादी और माक्र्सवादी बुद्धिजीवियों को दिया गया।

1960 के दशक में विकासशील देशों में माक्र्सवाद और साम्यवाद शिक्षा और राजनीति, दोनों में विमर्श के प्रधान विषय थे। माकपा के पूर्व महासचिव प्रकाश करात जेएनयू छात्रसंघ के प्रथम अध्यक्ष रहे और तब से आज तक वहां वामपंथ का ही बोलबाला है। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप लगाया कि वह विश्वविद्यालयों में 'वैचारिक वर्चस्वÓ की स्थापना कर रहे हैं, लेकिन करात यह भूल गए कि यह काम तो वामपंथी विद्वानों और कम्युनिस्ट पार्टी ने शुरू से ही किया है तथा ज्यादातर विश्वविद्यालयीय नियुक्तियों में यह सुनिश्चित किया कि केवल वामपंथी विद्वान ही नियुक्त हों और छात्रों में भी वामपंथी विचारधारा को प्रोत्साहित किया जाए, लेकिन विश्वविद्यालयीय स्वायत्तता का यह मतलब तो नहीं कि प्रतिस्पर्धी दक्षिणपंथी विचारधारा के विद्वानों को कोई 'स्पेसÓ ही न दिया जाए। भारत कोई साम्यवादी देश तो नहीं। लोकतंत्र का तकाजा है कि प्रत्येक विश्वविद्यालय में सभी विचारधाराओं के विद्वानों का संगम हो, जिनके वाद और प्रतिवाद किसी सार्थक संवाद को जन्म दे सकें। आज जब भी किसी दक्षिणपंथी या गैर-वामपंथी विद्वान की नियुक्ति होती है, उसे आरएसएस या भाजपा से संबद्ध कर हो-हल्ला मचाया जाता है। ये कहां तक उचित है? क्या देश में केवल वामपंथी विचारों के ही विद्वान मान्य हैं? क्या यह वैचारिक असहिष्णुता नहीं? दूसरा मुद्दा छात्रों की स्वतंत्रता का है। छात्रों की स्वतंत्रता के अधिकार पर न कोई असहमति है, न विवाद। उसके बिना तो उच्च शिक्षा का अर्थ ही नहीं, लेकिन विवाद स्वतंत्रता को परिभाषित करने को लेकर है। वैश्वीकरण के युग में सांस्कृतिक परिवेश तेजी से बदल रहा है और कब छात्रों की स्वतंत्रता उनकी स्वछंदता में बदल जाती है, पता ही नहीं चलता। क्या समाज और देश के प्रति छात्रों की कोई जवाबदेही है या नहीं?

जेएनयू की छात्र राजनीति शुरू से ही वामपंथी रुझान वाली रही है। वर्ष 2005 तक तो उसमें माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की छात्र इकाई स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआइ) का वर्चस्व रहा पर उसके बाद नक्सलवादी रुझान वाली भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माक्र्सवादी-लेनिनवादी) के छात्र संगठन 'आइसाÓ के नियंत्रण में आ गई। एसएफआइ के वर्चस्व का आधार बंगाली और मुस्लिम छात्रों का गठजोड़ था, लेकिन 1996 में शिक्षण संस्थाओं में अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण और 1997 में पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट सरकार द्वारा नंदीग्राम में पुलिस बर्बरता ने उस गठजोड़ को तोड़ दिया। आरक्षण विवाद ने बंगाली भद्रलोक को उससे अलग कर दिया तो नंदीग्राम ने मुस्लिमों को, क्योंकि उसमें कई मुस्लिम मारे गए। इसी विघटन का लाभ उठाकर नक्सली रुझान वाली 'आइसाÓ ने अपना आधार बना लिया। जब आइसा के दबाव में जेएनयू ने मदरसों के सर्टिफिकेट को भी कॉलेज डिग्री के समकक्ष मान लिया तो मुस्लिम छात्र 'आइसाÓ के साथ पूरी तरह चले गए। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया से संबद्ध वर्तमान अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने आइसा, एसएफआइ और अन्य वामपंथी घटकों के साथ-साथ दलित छात्रों को भी अपने साथ कर लिया। इससे कोई समस्या नहीं, क्योंकि विचारधारा के स्तर पर वामपंथ का छात्रों पर कब्जा है तो भारतीय लोकतंत्र और संविधान उसकी इजाजत देता है। लेकिन मूल प्रश्न यह है कि क्या विचारधारा के आवरण में छात्रों को विश्वविद्यालय परिसर को राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों के लिए प्रयुक्त करने का अवसर देना चाहिए? विश्व के अनेक विश्वविद्यालयों में भी छात्र राजनीतिक गतिविधियां करते हैं। वे सरकार का विरोध भी करते हैं। दुनिया में नंबर एक माने जाने वाले हार्वर्ड विश्वविद्यालय में हार्वर्ड-स्क्वायर पर प्राय: विभिन्न देशों के छात्र अपने देश से संबद्ध आयोजन करते रहते हैं, पर वे वहां अमेरिका-मुर्दाबाद और चीन-जिंदाबाद के नारे नहीं लगाते। इस पर वहां की पुलिस सख्त है। क्या विचारधारा और राष्ट्रवाद के बीच कोई संतुलन नहीं हो सकता? क्या विचारधारा के प्रति इतना मोह होना चाहिए कि अपनी पार्टी या संगठन के सदस्य आतंकी गुटों या राष्ट्र-विरोधी तत्वों के समर्थन में जाएं, फिर भी हम उनका समर्थन करें? अगर देश और लोकतंत्र ही नहीं बचेगा तो विरोध और आलोचना जैसे अप्रतिम अधिकारों का क्या होगा? जेएनयू के छात्र बहुत प्रबुद्ध हैं और अवश्य वे इस पर गहन चिंतन करेंगे और स्वयं कोई लक्ष्मण-रेखा निर्धारित करेंगे, क्योंकि जेएनयू की गतिविधियों का अन्य विश्वविद्यालयों पर भी असर होगा, जैसा कि जादवपुर यूनिवर्सिटी में हुआ। जो आजादी छात्रों को जेएनयू व अन्य विश्वविद्यालयों में मिल रही है और जैसी आजादी देश में है, अब और उससे ज्यादा क्या आजादी चाहिए और क्यों?

हां, यह जरूर है कि भारतीय दंड संहिता 124 (ए) में देशद्रोह के प्रावधान कठोर हैं। धारा 124 (ए) के अनुसार यदि कोई भी व्यक्ति मौखिक या लिखित शब्दों, संकेतों या दृश्य या अदृश्य अभिव्यक्तियों के द्वारा विधि द्वारा स्थापित भारत सरकार के प्रति घृणा अथवा द्वेष लाता है या लाने की कोशिश करता है या नफरत फैलाता है या फैलाने की कोशिश करता है तो उसे आजीवन कारावास और आर्थिक दंड या तीन वर्ष का कारावास और आर्थिक दंड दिया जा सकता है। कन्हैया संभवत: इसकी तकनीकी पकड़ में आ जाए, लेकिन दिल्ली पुलिस का यह फैसला अच्छा है कि वह उसकी 'बेल' का विरोध नहीं करेगी। हमारी चिंता उन तत्वों को चिन्हित करने की है जो आतंकवादी अफजल और इशरत जहां का महिमामंडन करने पर तुले हैं, न कि कन्हैया या किसी छात्र को जेल भेजने की। जेएनयू पर देश को गर्व है। जेएनयू के छात्रों को वर्तमान विवाद से उपजे सवालों को शीघ्र हल कर जनता का यह विश्वास बनाए रखना चाहिए।

[लेखक डॉ. एके वर्मा, सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड पालिटिक्स के निदेशक हैं और कई अमेरिकी विश्वविद्यालयों में विजिटिंग प्रोफेसर रह चुके हैं]

Posted By: Bhupendra Singh

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