अभिषेक कुमार सिंह। SpaceX Dragon Capsule: अमेरिका, कनाडा और दक्षिण अफ्रीका की एक साथ नागरिकता रखने वाले अरबपति एलन मस्क की कंपनी ‘स्पेसएक्स’ हाल में दुनिया की पहली ऐसी प्राइवेट कंपनी बन गई, जो अपने रॉकेट से दो अंतरिक्ष यात्रियों को इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (आइएसएस) तक सफलतापूर्वक ले गई। तीस मई, 2020 की रात को स्पेसएक्स का ताकतवर रॉकेट फॉल्कन-9 स्पेसएक्स ड्रैगन कैप्सूल लेकर कैनेडी स्पेस सेंटर से उड़ा और 19 घंटे की यात्र के बाद उसने कैप्सूल को आइएसएस से जोड़ दिया।

इस कैप्सूल में रॉबर्ट बेनकेन और डगलस हर्ले नामक दो अंतरिक्ष यात्री थे, जिन्हें एक विशुद्ध निजी उड़ान से अंतरिक्ष में पहुंचने का गौरव मिल गया है। ये दोनों आइएसएस पर चार महीने तक रहेंगे। अंतरिक्ष की ऐसी सैर बहुतों को लुभाती है, पर सवाल है कि आखिर ऐसी यात्रओं का मकसद क्या है। क्या इसका उद्देश्य अमीरों को अंतरिक्ष की सैर के लिए लुभाकर कमाई करना है, लंबी अंतरिक्ष यात्रओं का रास्ता खोलना है या फिर भारी आíथक बोझ से जूझ रही सरकारी स्पेस एजेंसियों को अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए संसाधन जुटाने में मदद करना है?

दुनिया में ऐसे दिलेरों की कमी नहीं है जो अंतरिक्ष की सैर के ख्वाब को हर हाल में पूरा करना चाहते हैं। अंतरिक्ष का विस्तार वैसे तो अरबों-खरबों किलोमीटर है और अब तक की यात्रओं में इंसान ने उसके नगण्य हिस्से को ही जाना है। मौजूदा अंतरिक्ष यानों के लिए मुमकिन नहीं है कि वे अपने साथ इंसान को चंद्रमा से पार ले जाकर वापस पृथ्वी पर सही-सलामत ला सकें। मंगल ग्रह की यात्र को साकार करने की जो योजनाएं अभी चल रही हैं, उनमें भी यही अंदाजा लगाया जा रहा है कि जब कभी ऐसी कोई यात्र मुमकिन होगी तो उसमें मंगल से पृथ्वी तक वापसी में इंसान का जिंदा रहना शायद ही संभव हो। मंगल तो क्या अभी की स्थितियों में चंद्रमा तक किसी मिशन को सही-सलामत पहुंचाना ही बेहद चुनौती भरा है।

यही वजह है कि 1969 के अपोलो-11 मिशन के बाद कोई इंसान चंद्रमा पर नहीं भेजा जा सका है। इसलिए ज्यादा कोशिश यही है कि इंसानों को स्पेस कहलाने वाली पृथ्वी की निचली कक्षा यानी ऑर्बटि तक ले जाया जाए और यदि आइएसएस पर मौजूद रहने वाले वैज्ञानिकों-यात्रियों की अदला-बदली संभव हो तो थोड़े अंतराल पर नए यात्री वहां भेजकर कुछ महीने वहां बिता चुके यात्रियों को वापस लाया जाए। अभी तक यह सारा काम सरकारी स्पेस एजेंसियां, जैसे कि अमेरिका की नासा आदि ही करती रही हैं, पर अब इसमें एक पेच आ गया है।

खर्च ने कराई कटौती : असल में अंतरिक्ष यात्रओं और अनुसंधान पर बढ़ रहे खर्च के कारण सरकारें इस काम से हाथ खींचने लगी हैं। नासा के बारे में तो अक्सर ही कहा जाता है कि अमेरिकी प्रशासन इसके बजट में कटौती कर रही है, क्योंकि अंतरिक्ष से कुछ ऐसी उपलब्धियों की संभावनाएं खत्म गई हैं जिनसे कमाई का कोई रास्ता खुलता हो। अंतरिक्षीय पिंडों से खनिजों और बहुमूल्य धातुओं के खनन की बात अक्सर कही-सुनी जाती है, लेकिन वह काम इतना खर्चीला और झंझट भरा है कि कोई सरकार इसकी शुरुआत कर अपने हाथ नहीं जलाना चाहती है। शीतयुद्ध काल में अंतरिक्ष अनुसंधान के बहाने अंतर-महाद्वीपीय मिसाइलों के विकास का जो काम किया जाता था, अब वे सारे मकसद भी हासिल हो चुके हैं।

महाशक्ति बनने का जो उद्देश्य ऐसे कार्यक्रमों के जरिये अमेरिका हासिल करना चाहता था, वह भी उसे मिल चुका है। बल्कि अब रॉकेट प्रक्षेपण और अंतरिक्ष अनुसंधान का ज्यादातर कामकाज भारत-चीन जैसे एशियाई देशों की तरफ शिफ्ट हो चुका है जिन्हें अभी इन क्षेत्रों में अमेरिका-रूस के मुकाबले अपनी काबिलियत साबित करनी है और इनमें आत्मनिर्भर बनना है। इन सारे कारणों के मद्देनजर स्पेस एजेंसी नासा अपने उपग्रहों का प्रक्षेपण यूरोपीय स्पेस एजेंसी और इसरो यानी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन से करवाती है और बाकी बचे ज्यादातर काम निजी कंपनियों के हवाले कर दिए हैं। खास तौर से स्पेस टूरिज्म से लेकर सुदूर अंतरिक्ष की खोज तक के लिए वह सरकारी पैसे के इस्तेमाल से बचना चाहती है। हालांकि अंतरिक्ष पर्यटन अकूत कमाई की संभावना वाला एक क्षेत्र है, लेकिन इसमें भी निजी कंपनी को मौका देकर अमेरिकी प्रशासन ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि अत्यधिक जोखिम वाले ऐसे कार्यो में वह अपने वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की सेवाएं प्राइवेट एजेंसियों को दिला सकता है, लेकिन खर्च से यथासंभव बचना चाहेगा।

सुरक्षा का बड़ा मुद्दा: अभी भले ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पेसएक्स के नए कारनामे पर दावा किया है कि उनका प्रशासन अमेरिकी अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी की कक्षा में भेजने के काम के मामले में दूसरे देशों की दया पर निर्भरता खत्म करेगा, लेकिन इस कार्यक्रम का असली उद्देश्य भी कमाई करना है। स्पेसएक्स के संस्थापक एलन मस्क की योजना है कि 2025 तक उनकी कंपनी इस स्थिति में आ जाए कि वह एक ही साल में हजारों अमीर पर्यटकों को अंतरिक्ष की सैर करा सके और इसके बदले भारी-भरकम कमाई कर सके। कह सकते हैं कि उसकी इस योजना में नासा का मौजूदा कामयाब मिशन ‘क्रू डेमो-2’ मील का पत्थर साबित होगा। निश्चय ही अमेरिका, रूस और चीन के सरकारी प्रयासों के बाद एक निजी कंपनी के रूप में स्पेसएक्स की यह उपलब्धि अंतरिक्ष के इतिहास में स्वíणम अक्षरों में लिखी जाएगी। लेकिन ध्यान रखना होगा कि स्पेसएक्स ऐसे अभियानों के जोखिमों से कतई अलग नहीं है।

उल्लेखनीय है कि फॉल्कन-9 की तरह ही एक अन्य हैवी लिफ्ट रॉकेट ‘स्टारशिप’ पर मस्क की कंपनी काम कर रही है, कुछ अरसा पहले उसके प्रोटोटाइप में लांचिंग के दौरान टेक्सास में विस्फोट हो गया था। जोखिम का यह तत्व इतना ज्यादा है कि 21 जुलाई, 2011 के बाद से अमेरिका ने आइएसएस तक कोई मानव मिशन अपनी धरती से नहीं भेजा था और इसके लिए रूसी रॉकेटों का सहयोग लिया जा रहा था।

ध्यान रहे कि बात चाहे वैज्ञानिकों को अंतरिक्ष में भेजने की हो या किसी पर्यटक को, यह काम बेहद मुश्किल है। ऐसे कई खतरे हैं जिनका सामना पूरी ट्रेनिंग के बाद भी अंतरिक्ष यात्रियों को करना पड़ता है। जैसे उनका सामना गहन अंतरिक्ष से आने वाली कॉस्मिक किरणों से हो सकता है। भारहीनता के दौरान उनके रक्तचाप में भी भारी उलटफेर हो सकता है। सबसे ज्यादा खतरा तो यान के दुर्घटनाग्रस्त हो जाने का है। उल्लेखनीय है कि एक अन्य प्राइवेट स्पेस एजेंसी वर्जनि गैलेक्टिक का स्पेसशिप अक्टूबर 2014 में अपनी परीक्षण उड़ान के दौरान ध्वस्त हो गया था जिसमें यान का एक पायलट भी मारा गया था। इससे वर्जनि गैलेक्टिक के अभियान को भारी धक्का लगा था।

यही वजह है कि ऐसी कंपनियां अंतरिक्ष के पर्यटकों की सौ फीसद सुरक्षा की गारंटी नहीं ले पा रही हैं। हालांकि उन्होंने यात्रियों की सुरक्षा के कुछ उपाय अपनाना अवश्य शुरू कर दिया है। जैसे वर्जनि ग्रुप ने अपने यान में एक ऐसा ग्लाइड-स्लोप सिस्टम अपनाने की बात कही है जो यान के खराब होने की दशा में यात्रियों को सुरक्षित धरती पर वापस ला सकता है। इसी तरह कॉस्मोकर्स ने अपने यात्रियों को ले जाने वाले रॉकेट और वापसी के कैप्सूल में एक पैराशूट सिस्टम लगाने की बात कही है जिसका अभी भी सोवियत रूस के यानों में इस्तेमाल हो रहा है। पर अंतरिक्ष को छूने की तमन्ना ऐसी है कि करोड़ों का खर्च करने के साथ-साथ लोग ऐसे सारे जोखिम भी लेने से नहीं चूकते हैं।

कब होते हैं हम अंतरिक्ष के साझीदार : वैसे तो जब हम किसी विमान ने बैठते हैं, तो उड़ान भरते ही धरती से हमारा नाता टूट जाता और हम सब उस अंतरिक्ष से जुड़ जाते हैं जो अंतहीन विस्तारों तक फैला हुआ है। लेकिन मोटे तौर पर निजी कंपनियां अपने यानों से अंतरिक्ष कही जाने वाली जिस ऊंचाई तक यात्रियों को ले जाएंगी, वह जगह धरती की सतह से करीब 100 किलोमीटर ऊपर आकाश में है। जब कोई रॉकेट यात्रियों से भरे यान को इस ऊंचाई तक ले जाएगा तो कहेंगे कि उन यात्रियों ने अंतरिक्ष को छुआ है। हालांकि इस ऊंचाई पर भी वे पृथ्वी के वायुमंडल से पार अंतरिक्ष की किसी कक्षा में नहीं जाएंगे, पर ऐसे स्पेस टूरिस्ट भारहीनता का अनुभव कर सकेंगे, स्पेस से पृथ्वी कैसी दिखती है, वह देख सकेंगे और ऐसे कल्पनातीत नजारों के दर्शन कर सकेंगे, जो उन्होंने पहले कभी नहीं देखे होंगे। हालांकि असीम ब्रrांड का हिस्सा होने के कारण पृथ्वी खुद भी अंतरिक्ष में स्थित है, खास तौर से यदि इसे हम बाहर से देखें, पर इस पर मौजूद रहते हुए अंतरिक्ष का पर्यटक बनना सच में एक अनूठी उपलब्धि मानी जाएगी।

इतिहास पर नजर डालने से पता चलता है कि इस स्पेस में झांकने वाले दुनिया के पहले नागरिक रूस के यूरी गागरिन थे जिन्होंने यह कारनामा 1961 में कर दिखाया था। उनके बाद भी स्पेस में वही लोग गए जिन्हें सरकारी अंतरिक्ष संगठनों ने शोध आदि उद्देश्यों के लिए चुना था। पर वर्ष 1996 में कुछ उद्यमियों ने पर्यटन के लिए अंतरिक्ष को एक शानदार विकल्प बनाने के उद्देश्य से एक वैश्विक प्रतियोगिता की शुरुआत की और इसके लिए दस लाख डॉलर के पुरस्कार की घोषणा की। प्रतियोगिता में 26 टीमों ने हिस्सा लिया जिन्हें ऐसा अंतरिक्ष यान बनाने की चुनौती दी गई जो कम से कम तीन यात्रियों को अंतरिक्ष में ले जा सकता हो। प्रतियोगिता की अहम शर्त यह थी कि ऐसा यान दोबारा इस्तेमाल में आ सकने वाला हो और इसके निर्माण का खर्च निजी हो, न कि सरकारी। इन सारी शर्तो के साथ जो टीम विजेता बनी, उसका नाम था मोजावे एयरोस्पेस वेंचर्स। इस टीम के दो संस्थापक थे- माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक पॉल एलन और स्केल्ड कंपोजिट के बर्ट रुटान। इस टीम ने स्पेस की सैर के दो इंतजाम किए। उन्होंने तीन सीटों वाला एक अंतरिक्ष-विमान बनाया ‘स्पेसशिप वन’ और इसे अंतरिक्ष में पहुंचाने वाले रॉकेट ‘वाइट नाइट’ का निर्माण किया।

अंतरिक्ष में निजी उड़ान का भविष्य : अंतरिक्ष एक बार फिर इंसान के सपनों की नई मंजिल बन गया है। कोरोना के वैश्विक कहर और कमोबेश दुनिया के अधिकांश देशों में लॉकडाउन की स्थितियों के बीच ऐसा लग रहा था कि जिंदगी बहुत कुछ ठहर गई है। ऐसे में अंतरिक्ष की सैर से जुड़ी एक खबर आई और लगा कि दुनिया उसी चाल से आगे बढ़ रही है, जिसकी उम्मीद उससे की जाती है। हालिया मामला एक निजी उड़ान की मदद से दो अमेरिकी अंतरिक्ष यात्रियों का आइएसएस यानी इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पहुंचने का है।

आइएफएस ग्लोबल से संबद्ध

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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