[ शंकर शरण ]: इन दिनों अनुसूचित जाति-जनजाति संबंधित (अत्याचार निरोधक) कानून को सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुधारने, फिर उसे संसद द्वारा संशोधित कर यथावत कर देने और नए संशोधित कानून को पुन: सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का मसला गरम है। बहस हो रही है कि क्या कोर्ट द्वारा उस कानून के अंतर्गत गैर-जमानती गिरफ्तारी वाला प्रावधान सुधारना अनुसूचित जातियों के विरुद्ध है? क्या कुछ जातियों के नाम पर अन्य नागरिकों के अधिकारों को नीचा कर देना उचित है? किसी ने जानने की कोशिश नहीं की कि आम लोग इस पर क्या कहते हैं? कुछ नेताओं ने कोर्ट निर्णय को झटपट पलटना तय कर लिया। उन्होंने इससे होने वाले सामाजिक उद्वेलन की परवाह नहीं की।

इस प्रसंग में दक्षिण भारतीय शोधकर्ता डॉ. सूफिया पठान का हाल में प्रकाशित एक शोध-पत्र रोचक है। उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर ध्यान दिलाया है। सबसे पहले तो यह दावा कि यहां दूसरों की तुलना में अनुसूचित जातियों के लोग अत्याचार के अधिक शिकार होते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) अनुसूचित जाति संबंधी अत्याचार निरोधक कानून तथा नागरिक अधिकार रक्षा कानून के अंतर्गत देश भर में होने वाले अपराधों का भी सालाना आंकड़ा जारी करता है। केवल वही मामले कानूनी परिभाषा से ‘अत्याचार’ में गिने जा सकते हैं, लेकिन उन आंकड़ों को कुछ लोग संपूर्ण नहीं मानते और संख्या बहुत बड़ी बताते हैं, पर ऐसे दावे का आधार क्या है?

एनसीआरबी द्वारा 1995 से ही उन अपराधों की अलग सूची रखी जाती है जो समाज के ‘कमजोर तबकों’ के विरुद्ध होते हैं। इनमें बुजुर्ग, बच्चे, स्त्रियां तथा अनुसूचित जाति-जनजाति के लोग आते हैं। इनके द्वारा झेले गए अपराधों की सूची एनसीआरबी द्वारा अलग से जारी की जाती है, लेकिन अनुसूचित जाति के लोगों द्वारा झेले गए सभी अपराधों को उन पर ‘अत्याचार’ बता देने का चलन हो गया है। यह गलती मीडिया ही नहीं, विविध सरकारी मंत्रालय, संस्थाएं आदि भी करती हैं। इसमें दो बड़ी गड़बड़ी है। पहली, इसमें वे अपराध भी गिन लिए जाते हैं, जिसमें अपराधी और पीड़ित, दोनों अनुसूचित जाति के ही हैं। जैसे आपसी झगड़े आदि के मामले। दूसरी, उनमें ऐसे अपराध भी हैं जिनमें अपराधी और उनकेपीड़ित जानते भी नहीं कि किसकी क्या जाति है। अर्थात जिन अपराधों में जाति कोई कारण नहीं है, लेकिन अनुसूचित जाति के लोगों के विरुद्ध हुए अपराधों की सूची अलग उपलब्ध होने के कारण सभी घटनाओं को ‘अत्याचार’ से ही जोड़ दिया जाता है, जबकि अत्याचार निरोधक कानून के अंतर्गत हुए अपराधों की संख्या बहुत कम है।

उदाहरण के लिए वर्ष 2016 में अनुसूचित जाति के विरुद्ध हुए कुल अपराधों की संख्या 40,801 थी। इनमें से उस अत्याचार निरोधक कानून के अंतर्गत आने वाले अपराधों की संख्या 5,926 थी, जबकि भारत में हुए तमाम अपराधों की कुल संख्या 48,31,515 थी। चूंकि देश में अनुसूचित जाति की जनसंख्या 17 प्रतिशत है, इसलिए तथ्यत: उस वर्ष इस 17 प्रतिशत आबादी ने तमाम अपराधों का 1 प्रतिशत भी नहीं झेला, जबकि शेष 83 प्रतिशत आबादी 99 प्रतिशत अपराधों का शिकार हुई। इस प्रकार अनुसूचित जातियों की तुलना में गैर-अनुसूचित जातियों के लोग कई गुना अधिक अपराध के शिकार हुए! अन्य वर्षों के आंकड़ों में भी संभवत: कोई भारी अंतर नहीं है। ये आधिकारिक आंकड़े हैं और इनके अलावा कोई अन्य आंकड़े नहीं हैं, पर किसी को इससे मतलब भी नहीं। बस एक बनी-बनाई मान्यता चल रही है।

जिन एजेंसियों, एक्टिविस्टों को दुर्बलों की सच्ची चिंता होनी चाहिए थी, वे केवल प्रचार में लगे रहते हैं। यदि चिंता सच्ची होती तो जातियों के वास्तविक इतिहास और वर्तमान की पूरी जानकारी ली जाती जो सामाजिक सद्भाव बढ़ाने के काम आती, पर लगता है वह इरादा ही नहीं है। ध्यान रहे वह कानून बनाने का कारण यह नहीं था कि अनुसूचित जातियों के विरुद्ध अधिक अत्याचार होते थे, बल्कि उन अत्याचारों को विशेष घृणित मानकर विशेष कानून बना था, पर आज मानो उद्देश्य बदल गया है। घटते मामलों को भी बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने की प्रवृत्ति हो गई है।

आंकड़े साफ दिखाते हैं कि हिंसा-अपमान झेलने वालों में सभी जातियों के लोग हैं। इसे लोग अनुभव से बखूबी जानते हैं। अत: केवल अनुसूचित जातियों की अनुपातहीन चिंता एक नया क्षोभ पैदा कर रही है जो पहले नहीं थी। दावा किया जाता है कि देश भर में निचली जाति के लोग अधिक हिंसा के शिकार हैं, पर इसकी परख के लिए किसी ने सामान्य गणित का भी प्रयोग नहीं किया। सच तो यह है कि धनी लोगों के सिवा कोई वर्ग नहीं जिसे अन्याय, अपमान, दुर्व्यवहार न झेलना पड़ता हो। यह किसी की चिंता नहीं! पर दुनिया भर में भारत की छवि ‘दलितों पर जुल्म’ वाले देश के रूप में जरूर बना दी गई। यह अपने ही हाथों अपने मुंह पर कालिख पोतने जैसा है।

कुछ नेता, एक्टिविस्ट, एनजीओ आदि इससे अपनी रोटी सेंकते हैं। रोहित वेमुला जैसी किसी भी घटना को खूब प्रचारित कर उसे घृणित, व्यापक बताते हैं, किंतु व्यवस्थित जिले-वार, राज्य-वार परीक्षण की जरूरत नहीं महसूस करते। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा उस कानून में कुछ सुधार पर फौरन नया संशोधन ले आने से हुई सामाजिक प्रतिक्रिया पर गंभीरता से सोचना चाहिए। यह पहले से टूटे हिंदू समाज को और तोड़ने जैसा है। जिस तरह यहां विविध सरकारें अनुसूचित जातियों के नाम पर नई-नई नीतियां बनाती गईं, उससे दूसरों में एक अनुसूचित-जाति विरोधी भाव पैदा हुआ है-जो पहले नहीं था। गुजरात में पाटीदार, महाराष्ट्र में मराठा या उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों का असंतोष इसी के उदाहरण हैं।

विडंबना है कि अनुसूचित जाति संबंधित अत्याचार निरोधक कानून उन्हें संगठित करने को नहीं बना था, पर अब वह उनके विरुद्ध सामूहिक क्षोभ पनपने का कारण बन रहा है। इसके दोषी अनुसूचित जातियों के लोग नहीं, बल्कि हमारे नेता हैं जो सामाजिक हित के बदले केवल निजी, दलीय स्वार्थ देखते रहे हैं। दबी जातियों की स्थिति अब तक स्वतंत्र भारत में नि:संदेह बहुत अच्छी हो चुकी है।

डॉ. भीमराव आंबेडकर और बाबू जगजीवन राम, दोनों ने यहां सभी जातियों को शीघ्र समान नियम, अवसर के अंतर्गत लाने का लक्ष्य रखा था। किसी को स्थाई रूप से विशेष सुविधाओं वाले अलग परकोटे में रखना देर-सबेर दूसरों में क्षोभ पैदा करेगा ही। कुछ नेताओं द्वारा सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को जबरन उलटने की क्रिया उसी को तेज कर रही है। यह सामाजिक हित में नहीं है।

 [ लेखक स्तंभकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैैं ]

Posted By: Bhupendra Singh