हिमाचल प्रदेश, नवनीत शर्मा। जीवन कभी नहीं रुकता। लॉकडाउन के बाद अब अनलॉक-1 भी सामने है। कोरोना भी नहीं रुक रहा है। पटरी पर रेल ही नहीं, सब लौटने लगा है। ऐसे में राजनीति क्यों न लौटे। हिमाचल में भी लॉकडाउन के दौरान फोन तक सीमित राजनीति अब रणनीति में बदल कर स्वयं को अभिव्यक्त कर रही है। सबसे पहले भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल की विदाई हुई। वजह बना वह नैतिक आदर्श, जो स्वास्थ्य निदेशक और एक एजेंट की कथित लेन-देन वाला ऑडियो वायरल होने के बाद खतरे में आया। सवाल तैरता रहा कि एजेंट और स्वास्थ्य निदेशक के बीच भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष कहां से आ गए।

जवाब यह था कि एजेंट उनके साथ जुड़ा हुआ था। मुख्यमंत्री ने तत्काल जांच के आदेश दिए और स्वास्थ्य निदेशक गिरफ्तार भी हुए। इसके बाद विजिलेंस ही बताएगी कि आगे क्या होगा। इस बीच भाजपा में ही मंथन शुरू हो गया। इसी कड़ी में कांगड़ा में भाजपा से जुड़े कुछ नेताओं ने बैठक की। इसमें सांसद किशन कपूर, पूर्व मंत्री रविंद्र रवि, प्रेम कुमार धूमल के शासनकाल में कर्मचारी कल्याण आयोग के सर्वेसर्वा रहे घनश्याम शर्मा, नूरपुर से रणवीर निक्का और कांगड़ा के पूर्व विधायक संजय चौधरी भी शामिल हुए। जब बैठक में शामिल होने वालों से पूछा गया कि लॉकडाउन के दौरान इस बैठक की वजह क्या थी? तो सबने यह जवाब दिया कि सब अचानक मिल गए तो बैठकी जम गई। मिलना-मिलाना गलत नहीं। पर गलत नहीं था तो इसे छुपाने की क्या जरूरत थी।

जाहिर है कि भाजपा में एक बड़ा वर्ग ऐसा उभर रहा है जिसे लगता है कि उसकी सुनी नहीं जा रही। वास्तविकता क्या है, यह अलग बात है, लेकिन जो भाजपा अन्य दलों से अलग होने के लिए जानी जाती थी, उसमें अब कई प्रकार के स्वर हैं। इन्हीं में से एक नेता डॉ. नरेश विरमानी ने तो खुल कर कहा कि लोकतंत्र है, सब मिल सकते हैं। वे बागी नहीं हैं। उनकी शिकायत स्थानीय विधायक को लेकर थी। ध्यान में यह भी रखा जाना चाहिए कि भाजपा इस समय नए प्रदेशाध्यक्ष की तलाश में है। ऐसे में वही चिंतन भाजपा के कई कोनों से उभर रहा है कि मुख्यमंत्री वहां से हैं तो प्रदेशाध्यक्ष यहां से हो, इतने मंत्री वहां से हैं तो इतने यहां से हों। सत्ता में जो नियुक्तियां हों, उनमें जो छूट गए हैं, उनको भी हिस्सा मिले। ये छोटी ज्वालाएं रोकना संगठन का काम है। 

सरकार के अच्छे किए धरे को जनता तक पहुंचाना संगठन का काम है, सरकार को सुझाव देना संगठन का काम है। लेकिन क्या वह काम पार्टी मंच पर नहीं हो सकता? स्वास्थ्य विभाग इस समय सबकी आंख में है। मुख्यमंत्री के पास स्वास्थ्य समेत कई विभाग हैं। अभी भी वक्त है कि वह कुछ विभागों से किनारा करें और लटकते आ रहे मंत्रिमंडल विस्तार एवं फेरबदल का कार्य जल्द संपन्न करें। मुख्यमंत्री की शालीनता, वित्तीय स्वच्छता पर किसी को संदेह नहीं है, लेकिन कुछ प्रशासनिक कार्यों में विलंब किसी के हित में नहीं होगा। सच यह भी है कि जहां से भी शिकायत आई है या मामला ध्यान में आया है, मुख्यमंत्री ने स्वयं जांच के आदेश दिए हैं। ताजा उदाहरण पटवारी भर्ती मामले का है जिसमें न्यायालय से सरकार स्वच्छ होकर निकली है।

चूंकि प्रदेश में सत्ता परिवर्तन नहीं, पीढ़ी परिवर्तन हुआ है, इसलिए यह अवसर उसे साबित भी करने का है। शासन में कतिपय नेताओं के राजनीतिक पुनर्वास की परंपरा अगर कुछ फल देती है तो उसे भी संपन्न किया जाना चाहिए। अगर लगता है कि इसका कोई लाभ नहीं है तो साफ इन्कार भी करना चाहिए। पार्टी के लोग हों या विपक्ष, सरकार हो या प्रशासन, इस समय सबका कर्तव्य राजनीति करना नहीं, कोरोना से ध्वस्त हुई आर्थिक को सुधारना और जनता को स्पर्श देना ही प्राथमिकता होनी चाहिए। वैसे राजनीति के अर्थ बहुत विस्तृत हैं, लेकिन अगर प्रचलित अर्थों में ही राजनीति करनी है तो उसके लिए बहुत समय है।

अभी तो उन लोगों की तलाश, जांच और जांच का निर्णायक मोड़ पर पहुंचना आवश्यक है जिनकी वजह से सरकार से चला पैसा कहीं और पहुंच कर प्रश्नांकित हो जाता है। एक जांच उन अधिकारियों की भी हो जिनके कारण एक दशक से 12 हजार करोड़ रुपये वैसे ही पड़े निकले। यह किसी का निजी आंकड़ा नहीं है, ये पैसे कैबिनेट मंत्री महेंद्र सिंह की अध्यक्षता में बनी मंत्रिमंडलीय उपसमिति ने ढूंढ़े हैं। समिति का गठन आर्थिक संकट से उबरने के उपाय तलाशने के लिए किया गया था। यह सब इन अधिकारियों की पंजिका में नत्थी होना चाहिए कि वे विकास के लिए आया पैसा खर्च नहीं कर सके। उम्मीद है, प्रदेश भाजपा इतिहास से सबक लेगी।

[राज्य संपादक, हिमाचल प्रदेश]

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