[डॉ. रहीस सिंह]। यह भारत-पाकिस्तान के संबंधों में आए ठहराव का ही असर है कि किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में आयोजित शंघाई सहयोग सम्मेलन (एससीओ) में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तानी पीएम इमरान खान एक-दूसरे के सामने आने पर भी बातचीत करते नजर नहीं आए। हालांकि, दोनों लीडर्स लाउंज में मिले और एक-दूसरे के हालचाल भी जाने, लेकिन दोनों में कोई औपचारिक बातचीत नहीं हुई। भारत अपने इस निर्णय पर अटल है कि आतंकवाद और बातचीत एक साथ नहीं चल सकते।

भारत की पिछले कुछ समय से रणनीति रही है कि पाकिस्तान को वैश्विक कूटनीति में अलग-थलग किया जाए और प्रत्येक वैश्विक मंच पर उसे आतंकवाद को लेकर घेरा जाए। हालांकि, भारत की तरफ से लंबे समय से ऐसी कोशिश की जा रही है, लेकिन कभी अमेरिका भारत के इन प्रयासों के बीच आता रहा और अब चीन यही कर रहा है। यही वजह है कि चीन, पाकिस्तान को बार-बार भारत के बराबर लाकर खड़ा करने की कोशिश करता है, फिर चाहे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता संबंधी मामला हो या एनएसजी सहित अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठन में जगह बनाने का प्रयास। यही एससीओ में भी हुआ।

यह चीनी चाल ही थी कि एससीओ में भारत के साथ पाकिस्तान को भी स्थायी सदस्य बनाया गया, जो एक तरह से भारत के कद को छोटा करने जैसा था। हालांकि, ऐसा हुआ नहीं, क्योंकि भारत ने क्विंगदाओ और उसके बाद बिश्केक में हुए एससीओ सम्मेलन में स्वयं को एक लीडर के रूप में पेश करने में सफलता पाई, जबकि पाकिस्तान चीन और रूस की ओर देखता रहा। क्विंगदाओ में भारत ने चीन को सोचने पर विवश किया और पाकिस्तानी आतंकवाद को केंद्र मे लाने की कोशिश की। इससे कुछ कदम आगे बढ़ते हुए भारत ने बिश्केक में पाकिस्तान को कठघरे में खड़ा किया और आतंकवाद तथा उसकी फंडिंग पर शिकंजा कसने को लेकर सर्वसम्मति बनाने में सफल हो गया।

गौरतलब है कि एससीओ की शिखर बैठक शुरू होने से पहले चीन ने एक तरह से अल्टीमेटम दिया था कि समिट के दौरान आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान पर निशाना नहीं साधा जाए, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी मालदीव और श्रीलंका यात्रा के दौरान ही संकेत दे चुके थे कि वे इस मुद्दे को अवश्य उठाएंगे। शायद भारत का रुख देखते हुए ही बाद में चीन के उप-विदेश मंत्री झांग हानहुई ने कहा कि सम्मेलन में एससीओ का निर्माण करने वाली बातों पर चर्चा होगी, जिसमें आर्थिक और सुरक्षा सहयोग, विशेषकर काउंटर टेररिज्म भी शामिल होंगे।

अहम बात यह है कि इस बार भारत चीन को आतंकवाद के मुद्दे पर सहमत करने में सफल हो गया, जिसका नतीजा यह हुआ कि एससीओ के तमाम सदस्यों ने आतंकवाद के हर स्वरूप की निंदा की और इससे मुकाबले के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से सहयोग बढ़ाने की अपील भी की। बिश्केक के मंच से प्रधानमंत्री मोदी ने आतंकवाद को प्रोत्साहन, समर्थन और धन मुहैया कराने वाले देशों की भी आलोचना की और अपील की कि ऐसे देशों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। सही अर्थों में उनका इशारा न सिर्फ पाकिस्तान, बल्कि चीन की तरफ भी था, क्योंकि चीन लगातार उसका सहयोग और बचाव करता आ रहा है। यही वजह है कि मोदी से मुलाकात के एक दिन बाद चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने इमरान खान से मुलाकात की और भारत एवं पाकिस्तान के संबंधों में सुधार के प्रति समर्थन की पेशकश की।

दरअसल शंघाई सहयोग संगठन ट्रीटी ऑन रिडक्शन ऑफ मिलिट्री इन बॉर्डर रीजन से बंधा हुआ है, जिसका तात्पर्य है कि भारत अब चीन से यह अपेक्षा कर सकता है कि एससीओ का स्थायी सदस्य बनने के बाद चीन सीमा पर सैनिकों की तैनाती को कम करने के साथ-साथ अनाक्रमणकारी नीति का अनुपालन करेगा।

पाकिस्तान से भी यही अपेक्षा की जाती है। हालांकि चीन ने डोकलाम के बाद इस तरह की गतिविधि नहीं की, लेकिन पाकिस्तान निरंतर पुराने ढर्रे पर चल रहा है, लेकिन इस दिशा में अहम बात है कि पाकिस्तान को होने वाले वित्तीय पोषण के स्नोतों को बंद किया जाए। भारत इस दिशा में काफी सफलता अर्जित कर चुका है। भारत की कोशिश रही है कि आतंकवाद को अच्छे और बुरे के बीच विभाजित कर देखना बंद किया जाए। इसमें भी इस बार भारत को सफलता मिली और आतंकवाद के हर रूप की निंदा की गई।

भारत की तीसरी कोशिश थी बीजिंग-मास्कोइस्लामाबाद त्रिगुट बनने से रोकना, जो इस संगठन के मंच के साथ-साथ द्विपक्षीय प्रयासों से संभव हो सकता था। प्रधानमंत्री मोदी ने बिश्केक में शी चिनफिंग और व्लादिमीर पुतिन के साथ अलग से मुलाकात कर द्विपक्षीय संबंधों को चमकाने की कोशिश की, जिससे फिलहाल

तो उक्त त्रिगुट कमजोर होता दिख रहा है। एक और पक्ष है किर्गिस्तान, कजाकिस्तान और उज्बेकिस्तान, जिनका झुकाव पाकिस्तान की ओर बना हुआ है।

उल्लेखनीय है कि 1995 में किर्गिस्तान और कजाकिस्तान ने जब पाकिस्तान के साथ द क्वाड्रिलेटरल ट्रैफिक इन ट्रांजिट एग्रीमेंट (क्यूटीटीए) पर दस्तखत किए थे, तब उन्होंने भारत के संप्रभु क्षेत्र की रेड लाइन पार करने की कोशिश की थी, क्योंकि इसमें काराकोरम हाईवे को ट्रांजिट कॉरिडोर के रूप में गिलगित-बाल्टिस्तान से होकर पास होना था। यह अलग बात है कि तब क्यूटीटीए व्यावहारिक रूप प्राप्त नहीं कर सका, लेकिन अब ताजिकिस्तान पुन: क्यूटीटीए से जुड़ चुका है और कजाकिस्तान सीपेक के प्रति अपनी रुचि प्रकट करता देखा जा रहा है। इसलिए भारत की कोशिश होनी चाहिए कि इन देशों में पाकिस्तान की इस्लामी छवि को कमजोर किया जाए और भारत की उदार, प्रगतिशील, विकासवादी और सहकार आधारित छवि को मजबूत किया जाए, जिससे कि मध्य एशिया में पाकिस्तान को अलग-थलग किया सके।

बहरहाल बिश्केक में भारत के प्रधानमंत्री और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की बॉडी लैंग्वेज स्पष्ट रूप से बता रही थी कि भारत यूरेशिया में लीडर की भूमिका में है और पाकिस्तान सक्रिय सहयोग के आवेदक के रूप में। किंतु यह संगठन एक भू-सामरिक संगठन की विशिष्ट भूमिका में भी है, इसलिए यूं ही इस गठबंधन का हिस्सा बने रहने में पाकिस्तान को कोई संकोच नहीं होगा, जबकि भारत को कुछ संकोचों और पुनर्संतुलनों का सामना करना पड़ेगा।

[विदेश संबंधी मामलों के जानकार]

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Posted By: Sanjay Pokhriyal

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