अन्नपूर्णा देवी : परीक्षाएं किसी न किसी रूप में मानव जीवन के साथ हमेशा से जुड़ी रही हैं। दसवीं या बारहवीं की स्कूली परीक्षाएं बच्चों की प्रतिभा का आकलन करने का एक माध्यम होती हैं, पर कई बार ये उनके लिए मानसिक दबाव का बड़ा कारण भी बन जाती हैं। चूंकि परीक्षाओं के बिना काम भी नहीं चलता, ऐसे में उनसे घबराने के बजाय दोस्ती करना समय की मांग है। कहने की जरूरत नहीं कि इस संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पिछले पांच वर्षों से बच्चों और परीक्षाओं के बीच मैत्री कराने में एक ऐतिहासिक भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं।

परीक्षा पर अगली चर्चा कुछ ही दिनों में फिर होने वाली है। भारत जैसे विशाल और सामाजिक-आर्थिक विविधताओं से परिपूर्ण राष्ट्र में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा ‘परीक्षा पे चर्चा’ जैसे आयोजन की शुरुआत अपने आप में अनोखा और अत्यंत दूरदर्शी कदम है। स्कूल में खासकर परीक्षा के समय छात्रों, शिक्षकों और अभिभावकों को किन परिस्थितियों से गुजरना पड़ता था, यह किसी सरकार की चिंता का विषय नहीं होता था। जबकि यह सच्चाई रही है कि वर्तमान शिक्षा पद्धति में देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा वार्षिक परीक्षाओं के समय तनावग्रस्त होने लगता है।

परीक्षा में अंक एवं बच्चों के भविष्य की चिंता और साथ ही पारिवारिक-सामाजिक दबाव के चलते विद्यार्थियों-अभिभावकों को अजीब स्थितियों का सामना करना पड़ता है। लगातार बढ़ते शहरीकरण और एकल परिवारों में बढ़ोतरी के चलते समाज में स्थिति और भी भयावह हो रही है। कई बार इसकी परिणति डिप्रेशन या आत्महत्या तक में होती है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार पिछले 25 वर्षों में देश ने इस तरह से लगभग दो लाख विद्यार्थियों को खो दिया है, जो कि किसी भी राष्ट्र के लिए बहुत बड़ी क्षति है। इनके कारणों में परीक्षा का भय, तनाव, माता-पिता एवं अभिभावकों की एक सीमा से अधिक उम्मीदें और आत्मविश्वास की कमी आदि पाए गए हैं। इनमें कई बार समस्याएं इस प्रकार की होती हैं जिन्हें समय रहते रोका और उनका निदान किया जा सकता है, परंतु उचित मार्गदर्शन और सलाह के अभाव में ऐसा नहीं हो पाता, जिसका भुगतान छात्र और उसके परिवार को करना पड़ता है।

ऐसे में हमारी भावी पीढ़ी को ‘परीक्षा पे चर्चा’ के माध्यम से स्वयं प्रधानमंत्री मोदी का अनुभवी मार्गदर्शन प्राप्त हो रहा है। वह कहते हैं कि परीक्षाओं के महत्व से इन्कार तो नहीं किया जा सकता है, पर हमें यह समझना होगा कि क्या ये स्कूली परीक्षाएं हमारे जीवन की एकमात्र कसौटी हैं? क्या 10वीं एवं 12वीं कक्षा का स्कोरकार्ड ही किसी के जीवन का नियंता हो सकता है अथवा विद्यार्थी स्वयं भी अपना जीवन बिना स्कोरकार्ड के निर्मित कर सकता है? वह जोर देते हुए कहते हैं कि परीक्षा के गलियारों से निकली हुई जिंदगी ही जिंदगी नहीं होती है, उसके बाहर भी बहुत बड़ी दुनिया होती है। जीवन में सफलता प्राप्त करने, कुछ नया और अलग करने और एक आदर्श स्थापित करने के लिए स्कोरकार्ड का महारथी होना ही आवश्यक नहीं है। इसे वह अनेक सफल लोगों के उदाहरण देकर समझाते हैं। वह यह भी कहते रहे हैं कि परीक्षाएं हमारे जीवन का एक सहज हिस्सा होती हैं। हमें यह मानते हुए चलना चाहिए कि परीक्षा हमारी विकास यात्रा में एक और मील का पत्थर है। इसलिए तनाव न लेते हुए परीक्षाओं को उत्सव की तरह देखना चाहिए। प्रारंभिक तौर पर तो यह आयोजन बच्चों का मनोबल बढ़ाने का प्रयास दिखाई देता है, पर वास्तव में यह स्वाभिमान और आत्मसम्मान से युक्त जीवन की आधारशिला तैयार करने में सहायक होगा।

‘परीक्षा पे चर्चा’ पीएम मोदी के ‘सबका साथ, सबका विकास’ मंत्र का ही एक हिस्सा है। इसमें प्रतिभागी किसी खास वर्ग, क्षेत्र, उम्र या जातियों और धर्मों/पंथों के न होकर भारत के सभी राज्यों, बल्कि विदेश से भी होते हैं। ये सभी एक लघु भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं। दूसरी ओर प्रधानमंत्री के संवाद की व्यापकता विद्यार्थियों द्वारा पूछे गए प्रश्नों के उत्तर को केवल परीक्षा तक ही सीमित न रखकर उसे जीवन से जोड़ देती है। विद्यार्थी जीवन की समस्याएं किसी न किसी रूप में जीवन के दूसरे पड़ाव में भी जरूर आती हैं। प्रेरणा, आत्मविश्वास, एकाग्रता, आशा, उत्साह, समय और तनाव प्रबंधन आदि ऐसे अनेक विषय हैं, जिनका विद्यार्थी हो या आम व्यक्ति जीवन भर सामना करता है। जनता से जुड़े प्रधानमंत्री इसे अच्छी तरह समझते हैं। यही कारण है कि परीक्षा संबंधित प्रश्नों के उनके उत्तर में भी जीवन का फलसफा छिपा होता है। इस प्रकार ‘परीक्षा पे चर्चा’ के माध्यम से पीएम मोदी देश की उस विशाल आबादी से भी जुड़ते हैं, जो आने वाले कल का आधार है। प्रधानमंत्री ने पिछली चर्चा में ध्यान और एकाग्रता की बात की। ध्यान हमें वर्तमान में उपस्थित रहना और कार्य को एकाग्रचित्त होकर करना सिखाता है, जिसका परीक्षाओं में भी लाभ होगा।

यह अनायास नहीं कि ‘परीक्षा पे चर्चा’ आयोजन की लोकप्रियता लगातार बढ़ती जा रही है। 2020 में देश और विदेश से प्रत्यक्ष एवं परोक्ष माध्यम से जुड़ने वाले प्रतिभागियों की संख्या 30 करोड़ तक पहुंच चुकी थी। इसका प्रमुख कारण अभिभावक की भूमिका में स्वयं प्रधानमंत्री मोदी का होना और स्कूली तथा प्रतियोगी परीक्षाओं के बहाने जीवन की परीक्षाओं में सफलता का मंत्र देना है। इस आयोजन से किशोरों-युवाओं समेत देश की जनता का जुड़ना निश्चित ही कई पीढ़ियों का एक साथ मार्गदर्शन प्राप्त करना है, जो दुनिया के किसी देश में आज तक नहीं हुआ है।

(लेखिका केंद्रीय शिक्षा राज्यमंत्री हैं)

Edited By: Praveen Prasad Singh

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