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[ विवेक काटजू ]: पिछले सप्ताह एक पाकिस्तानी अखबार ने विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी के हवाले से खबर दी कि उन्होंने देश की नेशनल असेंबली को सूचित किया है कि ‘अफगानिस्तान में शांति प्रक्रिया को लेकर प्रमुख भागीदारों के बीच कुछ बैठकें हुई हैं। इनमें भारत भी एक अहम साझेदार है जिसके सहयोग की आवश्यकता होगी।’ भारतीय मीडिया में इस टिप्पणी को व्यापक रूप से जगह दी गई। उनकी टिप्पणी को इसी रूप में देखा गया कि आखिरकार पाकिस्तान ने यह मान लिया कि अफगानिस्तान में भारत की भी भूमिका है। अगर ऐसा है तो यह पाकिस्तान की विदेश नीति में बड़ा बदलाव है। ऐसे में इसे गंभीरता से परखने की जरूरत है। हमें यह समझना होगा कि कुरैशी ने वास्तव में क्या कहा और उनका संदर्भ क्या था? सबसे पहले संदर्भ की बात।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दो हफ्ते पहले पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान को पत्र लिखा। इसमें ट्रंप ने इमरान से मदद मांगी कि वह तालिबान को समझाने में सहायता करें कि वह अफगान सरकार से वार्ता कर हिंसक संघर्ष को समाप्त करे। हालांकि यह पहला मौका नहीं था जब अमेरिका ने पाकिस्तान से ऐसा कोई निवेदन किया हो कि वह तालिबान पर संघर्ष विराम के लिए दबाव बढ़ाए। जब अमेरिकी अधिकारियों और तालिबान के बीच बैठकें जारी हैं तब यह पत्र दर्शाता है कि अफगानिस्तान में शांति बहाली में ट्रंप पाकिस्तान की महत्वपूर्ण भूमिका और जिम्मेदारी को स्वीकार करते हैं। वह फिर पाकिस्तान पर दबाव बढ़ा रहे हैं।

स्वाभाविक है कि पाकिस्तान को यह दबाव पसंद नहीं और न ही वह अफगानिस्तान में शांति बहाली की दिशा में प्रयास करने का इच्छुक है। इसे वह दूसरे देशों पर थोपना चाहता है। इस परिप्रेक्ष्य में कुरैशी की टिप्पणी पर विचार करना होगा। उन्होंने कहा, ‘यद्यपि पाकिस्तान 17 वर्षों से चले आ रहे अफगान युद्ध को समाप्त करने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन यह काम वह अकेले नहीं कर सकता, क्योंकि यह भारत, ताजिकिस्तान, चीन और ईरान जैसे अन्य देशों की भी साझा जिम्मेदारी है और उन्हें अपनी यह भूमिका निभानी होगी। चूंकि भारत की वहां पहले से ही मौजूदगी है तो उसके सहयोग की भी दरकार होगी।’

कुरैशी की टिप्पणियां अफगानिस्तान के वर्तमान एवं ऐतिहासिक हालात की हकीकत के एकदम उलट हैं। अफगान लोगों के अंतहीन दुखों का इकलौता जिम्मेदार कोई और देश नहीं, बल्कि पाकिस्तान ही है। वह अपने छद्म संगठनों द्वारा अफगानिस्तान के आंतरिक मामलों में लगातार दखल दे रहा है। 1980 के दशक में सोवियत विरोधी जिहाद के दौर में गुलबुद्दीन हिकमतयार पाकिस्तान का प्रिय हुआ करता था। 1989 में अफगानिस्तान से सोवियत संघ की विदाई के बाद पाकिस्तान ने अहमद शाह मसूद के खिलाफ उसका समर्थन किया। जब हिकमतयार से बात नहीं बनी तो 1994 में उसने तालिबान को बढ़ावा देकर उसके विस्तार में मदद की। वह समर्थन तबसे अब तक जारी है। यहां तक कि 2001 में जब अफगानिस्तान से तालिबान को खदेड़ दिया गया तो पाकिस्तान ने उसे शरण देने के साथ ही हरसंभव मदद मुहैया कराई ताकि वह फिर मजबूती से खड़ा हो सके।

अब पाकिस्तान ऐसे बर्ताव कर रहा है मानों सभी देशों ने ऐसे ही हस्तक्षेप करने वाली नीतियां अपनाई हों। इस सूची में चीन को शामिल करना उसे कुपित ही करेगा, लेकिन यह ध्यान भटकाने की ही कोशिश है। निश्चित रूप से कुरैशी का जोर इस पर भी है कि भारत अफगानिस्तान के आंतरिक मामलों में दखल देता आया है। यह सच नहीं है। अफगानी खुद भारत को बहुत सम्मान देते आए हैं। भारत ने तालिबान को छोड़कर अफगान सरकारों के साथ ही स्थानीय समाज के सभी तबकों से बढ़िया रिश्ते बनाकर रखे हैं। वहां 1996 से 2001 के बीच काबिज रही तालिबान सरकार को भारत ही नहीं, व्यापक अंतरराष्ट्रीय बिरादरी ने भी मान्यता नहीं दी थी।

वास्तव में अगर कुरैशी की टिप्पणियों के पीछे पाकिस्तान की मंशा यही दर्शाने की थी कि अफगानिस्तान में भारत की भूमिका को लेकर पाकिस्तान के नजरिये में बदलाव आया है तो उन्हें यह पेशकश करनी चाहिए थी कि भारत और पाकिस्तान को कूटनीतिक माध्यमों के जरिये अफगानिस्तान पर विचार विनिमय करना चाहिए। फिलहाल भारत पाकिस्तान के साथ वार्ता के लिए तैयार नहीं। उसकी शर्त है कि पहले पाकिस्तान अपनी आतंकी नीतियों को बदले। भारत ने अफगानिस्तान में अपनी गतिविधियों को लेकर पाकिस्तान से वार्ता के लिए बीते दस वर्षों के दौरान कई बार कोशिश की, लेकिन पाकिस्तान से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली। पाकिस्तान अफगानिस्तान में भारत की भूमिका को लेकर दुष्प्रचार में लगा रहा। अफगान एजेंसियों द्वारा भारतीय मदद की वास्तविक तस्वीर दिखाने के बावजूद पाकिस्तान अपनी इस मुहिम में जुटा रहा। जबकि अफगान एजेंसियां यही बताती रहीं कि भारत वैसे ही मदद कर रहा है जैसा वे उससे चाहती हैं।

कुरैशी की टिप्पणियों को काबुल में हुई चीन-पाकिस्तान-अफगानिस्तान के विदेश मंत्रियों की अहम बैठक के आलोक में भी देखना होगा। संभव है कि वह अपने अफगानी समकक्ष के समक्ष यह संकेत देना चाहते हों कि उन्हें शांति बहाली की पूरी जिम्मेदारी पाकिस्तान पर नहीं थोपनी चाहिए, बल्कि इसमें भारत की भूमिका पर भी गौर करना चाहिए। इस तरह उन्होंने अमेरिकियों को भी संदेश दे दिया कि अफगानिस्तान के संदर्भ में उन्हें भारत पर भी ध्यान देना चाहिए।

ट्रंप की शुरुआती अफगान और दक्षिण एशिया नीति में यही जताया गया था कि भारत को अफगानिस्तान में अपनी आर्थिक गतिविधियां बढ़ानी चाहिए। यह पाकिस्तान को रास नहीं आया। वह चाहता था कि भारत की भूमिका सीमित रहे और सुरक्षा मामलों से तो उसका कोई सरोकार ही न हो। द्विपक्षीय रिश्तों की दिशा तय करने का अधिकार भारत और अफगानिस्तान का है। इसमें पाकिस्तान या किसी अन्य देश की कोई भूमिका नहीं। पाकिस्तान कई वर्षों से यह राग अलाप रहा है कि भारत अफगान इलाकों के जरिये पाकिस्तान को विशेषकर उसके बलूचिस्तान प्रांत को अस्थिर करने की कोशिश में जुटा है।

वास्तव में इस इलाके की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि भारत के लिए अफगानिस्तान के माध्यम से पाकिस्तान को चोट पहुंचाना संभव ही नहीं। फिर भी पाकिस्तान यह हौवा खड़ा करने में जुटा है। अगर पाकिस्तान से यह पूछा जाए कि अफगानिस्तान में शांति बहाली की दिशा में वह भारत से किस भूमिका की अपेक्षा करता है तो संभवत: उसकी पहली मांग यही होगी कि वह अफगानिस्तान की धरती से पाकिस्तान विरोधी गतिविधियों पर विराम लगाए।

कुरैशी के बयान की आधिकारिक रूप से अनदेखी कर भारत ने ठीक ही किया। यदि भारतीय अधिकारियों को उनकी मंशा पर संदेह है तो यही सही रवैया है। अफगानिस्तान में दखल और भारत विरोधी नीतियों को लेकर पाकिस्तान का रवैया जगजाहिर है। पाकिस्तानी शासकों ने कभी दूरदर्शिता नहीं दिखाई। यह पहले भी दिखा है और अभी तब दिखा जब पाकिस्तान के आंतरिक मामलों के एक मंत्री का वह बयान वायरल हुआ जिसमें वह आतंकी सरगना हाफिज सईद की हिफाजत करने की हामी भर रहे हैैं।

( लेखक विदेश मंत्रालय में सचिव रहे हैं )

Posted By: Bhupendra Singh

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