भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच प्रस्तावित बातचीत को लेकर असमंजस कायम रहने का समापन पाकिस्तान के पीछे हटने से हुआ। भारत आने को तैयार दिख रहे पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज ने भारत के सख्त रुख के बाद नई दिल्ली न आने में ही अपनी भलाई समझी। पिछली बार भारत ने पाकिस्तान के हुर्रियत पे्रम के चलते विदेश सचिव स्तर की वार्ता रद्द की थी। इस बार यही काम पाकिस्तान ने किया। कुछ दिनों पहले दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों में रूस के उफा शहर में मुलाकात के बाद यह तय हुआ था कि भारत-पाक के सुरक्षा सलाहकारों के बीच बात होगी। उफा की यह मुलाकात भारतीय प्रधानमंत्री की पहल पर तो हुई, लेकिन उसमें तय यही हुआ कि बातचीत का मुद्दा आतंकवाद होगा। इसी कारण तत्काल ही ऐसे सवाल भी उठे कि आखिर नवाज शरीफ ऐसे संयुक्त बयान पर कैसे राजी हो गए जिसमें कश्मीर का जिक्र किए बगैर दोनों देश आगे की बातचीत जारी रखने पर सहमत हुए?

चूंकि उफा में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री मुंबई हमले की साजिश रचने वाले आतंकी लखवी की आवाज का नमूना देने पर भी सहमत हो गए इसलिए ऐसा लगा कि पाकिस्तान संबंध सुधारने को लेकर गंभीर है, लेकिन जैसी आशंका थी इस्लामाबाद पहुंचते ही सरताज अजीज ने कहा कि लखवी की आवाज के नमूने नहीं दिए जाएंगे और भारत से बातचीत कश्मीर मसले पर भी होगी। माना यह गया कि ऐसा बयान पाकिस्तान की जनता, खासकर वहां के कट्टरपंथी तबके और वहां की सेना तथा उसकी खुफिया एजेंसी आइएसआइ को संतुष्ट करने के लिए दिया गया है, लेकिन जल्द ही सीमा पर गोलाबारी का सिलसिला फिर से कायम हो गया। इसके कुछ दिनों बाद पाकिस्तान से आए आतंकियों ने गुरदासपुर में हमला किया। इसके चंद दिनों बाद ऊधमपुर में पाकिस्तानी आतंकियों ने हमला बोला। इस दौरान एक पाकिस्तानी आतंकी को पकड़ा गया। इससे पाकिस्तान की नई सिरे से पोल खुली और इसी के साथ वह बातचीत से पीछे हटने की कोशिश करता दिखाई देने लगा।

भारत के सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल से मुलाकात के मकसद के सरताज अजीज की नई दिल्ली यात्रा के ठीक पहले पाकिस्तानी उच्चायोग ने कश्मीर के हुर्रियत नेताओं को बातचीत के लिए निमंत्रण भेज दिया। ऐसा इसके बावजूद किया गया कि पिछली बार भारत ने विदेश सचिव स्तर की बातचीत पाकिस्तान की ओर से हुर्रियत नेताओं को अहमियत देने के कारण ही रद की थी। हुर्रियत नेताओं से नई दिल्ली में मुलाकात करने पर आमादा पाकिस्तान को भारत ने यह जो सख्त संदेश दिया कि इस तरह की मुलाकात का कोई औचित्य नहीं और यह उफा में व्यक्त की गई प्रतिबद्धता के भी खिलाफ है, उसके जवाब में पाकिस्तान के सुरक्षा सलाहकार ने कहा कि वह कश्मीर समस्या के समाधान के सिलसिले में हुर्रियत नेताओं से बातचीत करना जरूरी समझते हैं। उनके इस बयान के पहले दाऊद इब्राहिम के कराची में होने-रहने के नए और पुख्ता प्रमाण सामने आ चुके थे। शायद यही कारण रहा कि सरताज अजीज ने भी यह कहा कि उनके पास भी ऐसे दस्तावेज तैयार हैं जिनसे यह पता चलता है कि भारत बलूचिस्तान में हस्तक्षेप कर रहा है। उन्होंने इन दस्तावेजों की कथित फाइल भी टीवी कैमरों के सामने लहराई। इससे पाकिस्तान की बचकानी कूटनीति का ही प्रमाण मिला। सरताज अजीज के बयान के जवाब में सुषमा स्वराज ने स्पष्ट कर दिया कि हुर्रियत नेताओं को बातचीत का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता और बात उफा में तय एजेंडे यानी आतंकवाद पर ही केंद्रित होगी। इस तरह भारत ने कुछ ही घंटों के अंदर एक बार फिर गेंद उसके पाले में डाल दी और उसका जवाब उसने बातचीत से पीछे हटने के रूप में दिया।

यदि पाकिस्तान सुरक्षा सलाहकार स्तर की बात के पहले हुर्रियत नेताओं से मुलाकात करने की जिद नहीं पकड़ता और हुर्रियत नेता भी उसके खेल का हिस्सा बनना पसंद नहीं करते तो बातचीत की संभावनाएं बनी रहतीं। अगर हुर्रियत नेता सुरक्षा सलाहकारों की मुलाकात के बाद सरताज अजीज से बात करने को राजी हो जाते तो बीच का एक रास्ता निकल सकता था। पाकिस्तान ने ऐसे किसी रास्ते की तलाश करने के बजाय यह दिखाया कि वह आतंकवाद का साथ छोडऩे के लिए तैयार नहीं। उसके इस रवैये की पुष्टि अमेरिका की ओर से दी गई यह चेतावनी भी थी कि यदि उसने आतंकी संगठन हक्कानी नेटवर्क के खिलाफ ठोस कार्रवाई नहीं की तो उसे आर्थिक मदद नहीं दी जाएगी। अमेरिका ने यह पाया कि पाकिस्तान ने इस आतंकी संगठन के खिलाफ कार्रवाई का जो वादा किया था उसे पूरी नहीं किया। अमेरिका की चेतावनी पर बहुत उत्साहित नहीं हुआ जा सकता, क्योंकि पिछले वर्षों में कई बार यह देखने को मिला है कि उसने पाकिस्तान के आतंकवाद विरोधी कदमों से नाखुश होने के बावजूद उसे आर्थिक मदद दी है। अमेरिका एक तरह से जानबूझकर पाकिस्तान के हाथों ब्लैकमेल होता रहा है। उसने यह जानते हुए भी पाकिस्तान को अरबों डालर की मदद दी है कि उसका इस्तेमाल भारत और अफगानिस्तान को निशाना बनाने वाले आतंकी संगठनों को मजबूत करने के लिए किया गया है।

पाकिस्तान के प्रति मोदी सरकार के रुख-रवैये से दुनिया के समक्ष यह स्पष्ट हो गया कि इस सरकार ने पिछली सरकारों के मुकाबले पाकिस्तान के मामले में अपनी नीति बदली है। नीति में यह बदलाव इस रूप में दिख रहा था कि सीमा पर गोलाबारी और आतंकी हमलों के बावजूद पाकिस्तान सरकार से बात के विकल्प को खुला रखा जाए। शायद इसका उद्देश्य आतंकवाद के लिए जिम्मेदार पाकिस्तानी सेना और उसकी खुफिया एजेंसी को अलग-थलग करना था। यह नीति कारगर हो सकती थी, यदि वहां की सरकार भारत से रिश्ते सुधारने की थोड़ी इच्छाशक्ति दिखाती। अगर नवाज शरीफ सरकार अपनी सेना के दबाव से मुक्त होने के लिए तैयार होती तो बात बन भी सकती थी। बहुत कुछ नवाज शरीफ के रुख पर निर्भर था। वह नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में सेना के दबाव के बावजूद नई दिल्ली आने में तो समर्थ रहे थे, लेकिन सेना को संघर्ष विराम का उल्लंघन करने से नहीं रोक पाए।

यदि विश्व समुदाय और विशेष रूप से अमेरिका पाकिस्तानी सेना के खेल को समझ सके तो यह सबके हित में होगा। भारत और पाकिस्तान में सामान्य रिश्ते दक्षिण एशिया और विश्व शांति में भी सहायक होंगे। अच्छा होगा कि भारत विश्व समुदाय के सामने नए सिरे से यह स्थापित करे कि पाकिस्तानी सेना भारत विरोधी रुख छोडऩे को तैयार नहीं। आमने-सामने की लड़ाई और कारगिल के छद्म युद्ध में भारत के हाथों शिकस्त खा चुके पाकिस्तान के सैन्य अधिकारियों या फिर उनके भाई-भतीजों का वहां की सेना में वर्चस्व है। ये सभी भारत को शत्रु के रूप में तो देखते ही हैं, उससे बदला लेने की भी फिराक में रहते हैं। चूंकि एक बार फिर पाकिस्तान सेना की ही चली इसलिए यह अंदेशा और बढ़ गया है कि पाकिस्तान सरकार हाल फिलहाल अपनी सेना के दबाव से मुक्त नहीं हो सकती।

[लेखक संजय गुप्त, दैनिक जागरण के प्रधान संपादक हैं]

Posted By: Bhupendra Singh