[अनुराग चतुर्वेदी]। महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा के चुनाव नतीजे अप्रत्याशित हैं। चुनावों की घोषणा के बाद लग रहा था कि ये चुनाव मात्र औपचारिकता हैं और पूर्ववर्ती सरकारें और ज्यादा बहुमत से पुन: सत्ता में आ जाएंगी, लेकिन मतदाता के मन की थाह लेना इतना आसान नहीं है। यही लोकतंत्र की खूबसूरती भी है। लोकतंत्र में लोक अपनी खुशी या नाराजगी अपने वोट के माध्यम से बताता है।

महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना गठबंधन ने बहुमत जरूर हासिल कर लिया, परंतु चुनाव के नतीजे बता रहे हैं कि भाजपा पिछले चुनाव के मुकाबले कमजोर हो गई है और हाशिये पर चली गई, शिवसेना पुन: अपनी कुछ ताकत पाने में सफल रही, बल्कि अब वह अपनी शर्तों पर सरकार में भागीदारी करने के संकेत भी दे रही है। यही स्थिति हरियाणा की है, जहां पर ‘इस बार 75 पार’ का नारा देने वाली भाजपा बहुमत के आंकड़े से भी दूर रह गई। वहां उसका कोई घोषित सहयोगी भी नहीं है। दूसरी ओर कांग्रेस ने अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन किया और अब वहां सत्ता की कुंजी छोटे दलों और निर्दलीय विधायकों के हाथ में रहने वाली है।

आखिर ऐसे अप्रत्याशित नतीजे क्यों रहे। क्या यह मंदी की मार है? क्या यह राज्यों की चुनावी राजनीति में राष्ट्रीय मुद्दों को लाने का नतीजा है? क्या यह सरकार के खिलाफ निराशा और गुस्से में किया गया मतदान है? महाराष्ट्र चुनाव का मैन ऑफ द मैच शरद पवार को कहा जा सकता है, तो हरियाणा में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा कांग्रेस के बेहतर प्रदर्शन के शिल्पकार रहे। महाराष्ट्र में शरद पवार ने न केवल अपनी पार्टी को बेहतर सीटें दिलवाईं, बल्कि कांग्रेस पार्टी की साख भी बचा ली।

महाराष्ट्र में उम्मीद की जा रही थी कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस अपनी राजनीतिक ताकत में इजाफा करेंगे, लेकिन हुआ उल्टा। अब उन्हें शिवसेना के साथ सत्ता को बांटना पड़ेगा, बल्कि उसे वह सम्मान भी देना होगा, जो वे अभी तक नहीं दे रहे थे। भाजपा का इन चुनाव में मराठवाड़ा और उत्तर महाराष्ट्र में खराब प्रदर्शन रहा। जिस प्रकार राकांपा के सातारा के सांसद उदयराज भोसले को भाजपा में शामिल कर उपचुनाव कराया गया, वह शरद पवार के लिए कम चुनौती नहीं थी। शरद पवार ने इस चुनौती को स्वीकार किया और जिन नेताओं ने उन्हें छोड़ दिया, उन्हें पवार ने हरादिया। शरद पवार के प्रचार के कारण थकीहारी, नेतृत्वहीन कांग्रेस भी एक सम्मानजनक हालत में आ गई। सबसे बड़ी बात यह है कि लगभग 80 वर्ष के शरद पवार अभी भी राजनीतिक लड़ाई लड़ने को तैयार हैं।

हालांकि महाराष्ट्र में भाजपा ने शुरू से आक्रामक रणनीति अख्तियार की, जिसके चलते वह अपने विरोधियों से आगे बढ़ती नजर आई। उसने कई विरोधियों को अपने साथ मिला लिया, जिससे विपक्ष पूरी तरह नि:शक्त लगने लगा। कई प्रमुख विपक्षी नेता चुनाव के पूर्व न केवल सत्तारूढ़ दल में शामिल हो गए, बल्कि मंत्री तक बन गए। विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे राधाकृष्ण विखे पाटील का बेटा शिर्डी संसदीय सीट से भाजपा का उम्मीदवार बन चुनाव जीत गया। बाद में राधाकृष्ण खुद भी भाजपा में चले गए और महाराष्ट्र सरकार में मंत्री बने।

महाराष्ट्र में शिवसेना सरकार में शामिल जरूर रही, लेकिन पूरे पांच साल तक एक तरह से उसने विपक्ष की भूमिका ही निभाई। राष्ट्रीय दल क्षेत्रीय दलों से मजबूरी में ही रिश्ता बनाते हैं और भाजपा भी इसका अपवाद नहीं। शिवसेना और भाजपा का रिश्ता उनकी हिंदुत्व से जुड़ी गर्भनाल से है। शिवसेना में परिवारवाद भी गजब का है, जिसका भाजपा सैद्धांतिक रूप से विरोध करती है। यह अलग बात है कि महाराष्ट्र भाजपा में भी परिवारवाद और बाहर से आए नेताओं के परिवार हैं। नारायण राणे पहले शिवसेना में रहे, फिर कांग्रेस में और चुनाव से पहले अपने दोनों बेटों समेत भाजपा में शामिल हो गए। इतना ही नहीं, वह चुनाव टिकट भी पा गए।

एक समय शिवसेना महाराष्ट्र में भाजपा से बड़ी और प्रभावी हैसियत रखती थी। किंतु मोदी-शाह की अगुआई में देश भर में भाजपा के उभार के दौर में महाराष्ट्र में शिवसेना का वर्चस्व भी कम हुआ। इन चुनावों में पहली बार शिवसेना ने भाजपा से कम सीटों पर चुनाव लड़ा और इतना ही नहीं, पुणे, नासिक, नागपुर समेत राज्य के कई महानगरों में अपने उम्मीदवार भी नहीं उतारे। शिवसेना इस बार न केवल झुकी हुई, बल्कि टूटी और हताश भी लगी। उसका वाक्युद्ध अब हास्यास्पद हो गया है। वह सिर्फ मुंबई और ठाणे में सिमटकर रह गई है।

इन चुनावों में विपक्ष को तकरीबन खारिज किया जा रहा था और भाजपा के पिछली बार से भी बड़ी जीत के दावे किए जा रहे थे। विपक्ष भी उत्साहहीन नजर आ रहा था। सरकारी एजेंसियों का डर और लोकसभा चुनाव में हुई करारी हार ने विपक्ष को न केवल निराश कर दिया, बल्कि उसकी कोई रणनीति भी नजर नहीं आ रही थी। ऐसे में अदालत के एक निर्णय ने महाराष्ट्र में विपक्ष में जान फूंक दी। अदालत ने सहकारी संस्थाओं में हुए उस घोटाले की जांच के लिए प्रवर्तन निदेशालय को कहा, जिसमें राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के सुप्रीमो शरद पवार भी लपेटे में आ रहे थे। लेकिन मतदाताओं को राकांपा यह संदेश देने में सफल रही कि सरकार बदले की भावना के चलते शरद पवार को शिकंजे में लेना चाहती है। शरद पवार मराठा अस्मिता के प्रतीक हैं और वे ग्रेट मराठा के रूप में जाने जाते हैं। शरद पवार ने इस मौके का राजनीतिक फायदा उठाते हुए अपनी पार्टी में फिर से जान डाल दी और 78 वर्ष का जवान पवार एक बार फिर खड़ा हो गया।

बहरहाल, कहना होगा कि महाराष्ट्र और हरियाणा दोनों राज्यों में भाजपा नेताओं का अति-आत्मविश्वास भारी पड़ा। भले ही वह दोनों राज्यों में सबसे बड़े दल के रूप में उभरी हो, लेकिन उसकी ताकत घटी है। वहीं इन नतीजों से विपक्षी दलों को संजीवनी मिली है।

[वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार]

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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