मोदी सरकार - 2.0 के 100 दिन

डॉ.नीलम महेंद्र। देश के पूर्व वित्त मंत्री रहे पी चिदंबरम आइएनएक्स मीडिया मामले में दोषी हैं या नहीं यह फैसला तो न्यायालय करेगा, लेकिन खुद एक वकील होने के बावजूद कानून से भागने की कोशिश करना और उन्हें गिरफ्तार करने के लिए सीबीआइ अफसरों का उनके घर की दीवार फांद कर अंदर जाना समझ से परे है। 

भ्रष्टाचार के कई अलग अलग मामलों में पी चिदंबरम, उनकी पत्नी, पुत्र और पुत्रवधू जांच के दायरे में हैं। खुद चिदंबरम को इन मामलों में लगभग 27 बार कोर्ट से अग्रिम जमानत मिल चुकी थी, लेकिन इस बार उन्हें कोर्ट से झटका मिला। वक्त का सितम देखिए कि कांग्रेस के जो वकील आधी रात को भी सुप्रीम कोर्ट के ताले खुलवा लेते थे, दिन भर की मशक्कत के बावजूद अपने नेता की जमानत याचिका पर सुनवाई नहीं करवा पाए।

अंतत: देर रात चिदंबरम को सीबीआइ द्वारा नाटकीय घटनाक्रम के तहत गिरफ्तार कर लिया जाता है। कांग्रेस ने भले ही इस ‘नाटकीय घटनाक्रम’ को चिदंबरम के साथ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर पूरे प्रकरण को ‘विक्टिम कार्ड’ खेलते हुए ‘राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित’ कदम बताने की कोशिश की हो, लेकिन देश की सबसे पुरानी पार्टी होने के नाते उसकी यह प्रेस कॉन्फ्रेंस प्रश्नों के उत्तर देने के बजाय अनेक प्रश्न खड़े कर गई। 

चिदंबरम का लापता होना कई प्रश्न छोड़ गया

चिदंबरम ने भले ही संविधान के अनुच्छेद 21 का सहारा लेकर इस देश के एक नागरिक के नाते अपनी स्वतंत्रता के अधिकार की दुहाई देते हुए इसे अपने ‘लापता’ होने को जायज ठहराने का आधार बनाया हो, लेकिन देश के पूर्व वित्त मंत्री होने के नाते उनका यह आचरण अनेक अनुत्तरित प्रश्न छोड़ गया। आखिर सार्वजनिक जीवन जीने वाला एक नेता देश को अपने इस आचरण से क्या संदेश दे रहा है?

क्यों लेनी पड़ी अग्रिम जमानत

आज जिस संविधान की वो बात कर रहे हैं, उसमें विधि के समक्ष देश के सभी नागरिक समान हैं तो क्या किसी आम आदमी को भी किसी आपराधिक मामले में 27 बार अग्रिम जमानत मिलती? शायद इसीलिए कोर्ट ने सरकार से कहा है कि अब समय आ गया है कि प्री अरेस्ट कानून में बदलाव लाकर आर्थिक अपराध के हाइ प्रोफाइल मामलों में इसे निष्प्रभावी कर दिया जाए ताकि इसका दुरुपयोग बंद हो।

चिदंबरम के वित्त मंत्री रहते हुए उनके द्वारा अपने पद का दुरुपयोग तो जांच का विषय है, लेकिन उनका जांच में ही सहयोग नहीं करना अनेक शंकाओं को जन्म दे गया। सवाल तो अनेक हैं। जब कांग्रेस का कहना है कि चिदंबरम का चार्जशीट में नाम ही नहीं है तो सीबीआइ गिरफ्तार क्यों करना चाहती है तो सवाल उठता है कि जब चार्जशीट में नाम ही नहीं है तो कांग्रेस चिदंबरम के लिए अग्रिम जमानत क्यों लेना चाहती है? आखिर क्यों उन्हें 27 बार अग्रिम जमानत लेनी पड़ी? चिदंबरम का कहना है कि उन्हें झूठा फसाया जा रहा है तो यह आरोप वो सरकार पर लगा रहे हैं या न्यायालय पर? अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई न करके गिरफ्तारी का रास्ता न्यायालय ने साफ किया है, सरकार ने नहीं। 

क्यों गायब हुए चिदंबरम? 

अगर चिदंबरम के पास छुपाने के लिए कुछ नहीं था तो वे गायब क्यों हुए थे? कांग्रेस जब भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे अपने नेता के साथ खड़ी होती है तो क्या बताना चाहती है? यह कि वो भ्रष्टाचार का समर्थन करती है या उसे देश की न्याय व्यवस्था पर भरोसा नहीं है?कांग्रेस को समझना चाहिए कि अपने नेता के साथ खड़ा होना और उसे क्लीन चिट देकर ‘निदरेष’ होने का एकतरफा फैसला सुनाना दो अलग अलग बातें हैं। बेहतर होता कि कांग्रेस न्याय व्यवस्था पर भरोसा जताती और अपने नेता के निदरेष होने या न होने का फैसला न्यायालय पर छोड़ती।

एक आर्थिक अपराध के मामले को सरकार द्वारा राजनीतिक विद्वेष का मामला बनाकर कांग्रेस खुद मामले का राजनीतिकरण कर रही है। देश ने सालों से यही राजनीति देखी है कि छोटी मोटी मछलियां तो जाल में फंस जाती थीं, लेकिन मगरमच्छ के लिए जाल छोटा पड़ जाता था। देश को उम्मीद जगी है कि जो भ्रष्टाचार देश की जड़ें खोद रहा था आज खुद उसकी जड़ें खोदी जा रही हैं। ऐसे समय में कानूनी प्रक्रिया का विरोध कहीं कांग्रेस को भारी न पड़ जाए।

लेखिका एक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। 

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Posted By: Ayushi Tyagi

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