नई दिल्ली [ डॉ. भीम सिंह ]। न्याय मिलने में देरी न्याय न मिलने के समान है। नागरिक अधिकारों और नैतिकता का तकाजा है कि आरोपितों को भी शीघ्र न्याय मिले। अपने देश में लाखों लोग वर्षों से न्याय पाने के लिए कतार में लगे हैं, लेकिन कतार खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। लंबित मुकदमों के मामले में नेशनल जुडिश्यरी डेटा ग्रिड के ताजा आंकड़े चिंतित करने वाले हैैं। जहां करोड़ों मामले लंबित हैैं वही सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की स्वीकृत पदों की संख्या 31 में से 6 पद, उच्च न्यायालयों के लिए स्वीकृत 1048 पदों में से 389 पद और अधीनस्थ न्यायालयों के लिए स्वीकृत 22,677 पदों में से 5,984 पद रिक्त पड़े हैं। स्पष्ट है कि जजों को काम के बोझ के तले काम करना पड़ रहा है। हालांकि स्पीडी ट्रायल, वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये सुनवाई, ट्रिब्यूनल्स एवं विशेष न्यायालयों के गठन, जजों द्वारा अतिरिक्त कार्य संपादन, लोक अदालतें, मोबाइल कोर्ट जैसे कई कदम उठाए गए हैं ताकि लंबित मामलों का शीघ्र निपटारा किया जा सके, लेकिन लंबित मामले घटने का नाम नहीं ले रहे हैैं। आखिर इस समस्या का निदान क्या है?

न्यायालयों में करोड़ों मामले लंबित होने के कारण रिक्त पड़े जजों के पद भरे जाने चाहिए

सबसे पहले तो रिक्त पड़े जजों के पद भरे जाने चाहिए। फिर आबादी के हिसाब से जजों के स्वीकृत पदों की बढोतरी की जाए, न्यायिक कार्य अवधि एवं दिनों में वृद्धि की जाए और किसी अतिरिक्त एवं वैकल्पिक न्यायप्रणाली पर भी विचार किया जाए। अतिरिक्त न्यायप्रणाली की चर्चा से पहले बेहतर होगा कि उन कारणों पर भी एक नजर डाल ली जाए जिसके चलते लंबित मामलों की संख्या बढ़ती जा रही है।

लंबित मामले कम करने के लिए निचली अदालतों में मामूली विवादों में सुलह हो सकती है

अगर निचली अदालतों में लंबित मामलों को देखें तो लगेगा कि तमाम मामले ऐसे हैं जिन्हें स्थानीय स्तर पर सुलह या मामूली आर्थिक दंड द्वारा हल किया जा सकता है, लेकिन उचित प्रावधान के अभाव मेंं मामूली मामले थाने होते हुए न्यायालय पहुुंच जाते हैैं। एक उदाहरण देखें: एक आदमी की बकरी दूसरे की थोड़ी सी फसल चर गई। दोनों के बीच वाद-विवाद हाथापाई में बदला। कोई थाने चला गया। मुकदमा दर्ज हो गया और इस तरह एक और केस बढ़ गया। एक अन्य उदाहरण: एक व्यक्ति ने दूसरे से दस हजार रुपये उधार लिए। समय पर नहीं लौटा सका तो दोनों में मामूली झगड़ा हुआ और फिर विवाद थाना होते हुए न्यायालय पहुंच गया। इस प्रकार एक और केस बढ़ गया।

वैकल्पिक एवं अतिरिक्त न्याय प्रणाली

यह सिलसिला कायम रहता है। यदि हम वैकल्पिक एवं अतिरिक्त न्याय प्रणाली की बात करते हैं तो नजर बिहार पर जाती है। बिहार में प्रत्येक ग्राम पंचायत के स्तर पर एक न्याय पंचायत का भी गठन किया गया है। न्याय पंचायत का अध्यक्ष सरपंच होता है जिसका चुनाव उस पंचायत के मतदाता करते हैं। इसके अतिरिक्त हर पांच सौ की आबादी पर एक-एक पंच का भी चुनाव किया जाता है। बिहार ग्राम पंचायत अधिनियम के तहत इन न्याय पंचायतों को आइपीसी की 40 धाराओं और दस हजार रुपये तक के सिविल मामलों को सुलझाने का अधिकार दिया गया है। अधिनियम में प्रावधान है कि न्याय पंचायत की अधिकारिता वाले मामले को लेकर यदि कोई वादी थाने जाए तो थाना उस मामले को संज्ञान में लेकर समुचित कार्रवाई हेतु संबंधित न्याय पंचायत को वापस कर देगा। कोई पक्षकार अपना पक्ष रखने के लिए वकील की सेवा प्राप्त नहीं कर सकता। उसे अपना पक्ष खुद अपनी बोलचाल की भाषा मे रखना होता है। इसका उद्देश्य न्याय पंचायतों को नाहक जिरह का अखाड़ा बनने से रोकना है। न्यायपीठ को मामले की कानूनी स्थिति की जानकारी उपलब्ध हो, इसके लिए सरकारी खर्च पर न्याय पंचायत को एक-एक विधि स्नातक न्याय मित्र की सेवा उपलब्ध है। पंचायतों को नोटिस की तामीली के लिए चौकीदार सेवा भी हासिल है। ये चौकीदार राज्य सरकार के चतुर्थश्रेणी कर्मचारी होते हैं।

ग्राम पंचायतों के स्तर पर न्याय पंचायतों का गठन किया जाना चाहिए

न्याय पंचायतें खंडपीठ और पूर्णपीठ के माध्यम से कार्य करती और फैसला सुनाती हैं। अगर कोई पक्ष न्याय पंचायत के फैसले से असंतुष्ट हो तो सात दिनों के अंदर वह पूर्णपीठ के समक्ष अपील दायर कर सकता है। पूर्णपीठ के फैसले के खिलाफ सिविल मामलों में सब-जज के कोर्ट में और आपराधिक मामलों में डिस्ट्रिक्ट एंड सेशन जज के कोर्ट में 30 दिनों के अंदर अपील दायर हो सकती है। ग्राम कचहरी कही जाने वाली इन न्याय पंचायतों में भी सुधार की जरूरत है। 73 वें संविधान संशोधन के पहले ग्राम पंचायतों को संवैधानिक दर्जा हासिल नहीं था। इसमें एक अनुसूची भी जोड़ी गईं। इस अनुसूची के द्वारा ग्राम पंचायतों के अधिकारिता के विषय निर्धारित कर दिए गए हैं। समय आ गया है कि संविधान में एक और संशोधन के जरिए पूरे देश में ग्राम पंचायतों के स्तर पर न्याय पंचायतों का गठन किया जाए। किसी प्रकार की अस्पष्टता न रहे और देश मे समरूपता बनी रहे, इसलिए इनके अधिकार एवं कर्तव्य भी सुस्पष्ट कर दिए जाएं।

न्याय पंचायतें असंज्ञेय मामलों को बेहतर ढंग से सुलझा सकती हैैं

जैसा कि नाम से ही ध्वनित होता है, ये न्याय पंचायतें दंडात्मक दृष्टिकोण से फैसला करने के बजाय पक्षकारों के मध्य सुलह-समझौते पर ज्यादा ध्यान देंगी। न्याय पंचायतों के माध्यम से कई मामले और खासकर असंज्ञेय मामले बेहतर ढंग से सुलझाए जा सकते हैैं। इनके गठन से न केवल न्यायालयों का बोझ कम होगा बल्कि लाखों लोगों को त्वरित न्याय भी मिल सकेगा। इस दिशा में केंद्र सरकार को पहल करनी चाहिए।

[ लेखक बिहार के पंचायती राज विभाग के पूर्व मंत्री हैैं ]

Posted By: Bhupendra Singh