स्वस्थ रहने का प्रसन्न रहने से सीधा-सीधा संबंध है जो केवल उपयुक्त खाने-पीने तक से संभव नही है। यद्यपि पर्याप्त और संतुलित भोजन अच्छे स्वास्थ्य की पहली आवश्यकता है फिर भी कुछ बातें ऐसी भी हैं जो भोजन से परे हैं। यह सवाल इसलिए और भी जरूरी हो जाता है जब इन दिनों शारीरिक के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य की चिंता बच्चों तक में दृष्टिगत होने लगी है। समुचित मात्रा में खाद्य पदार्थ जीव को शारीरिक तंदरुस्ती के लिए आवश्यक तत्व प्रदान करते हैं, लेकिन अच्छे स्वास्थ्य के लिए कुछ तत्व ऐसे भी हैं जो खुश रहने से ही मिलते हैं और जिनके बारे मे मानव सभ्यता के विकास के दौरान चिंतनशील लोगों ने समय-समय पर चेताया है।

मानसिक दुख का शरीर पर प्रतिकूल असर पड़ता है

जब हम किसी बीमारी के कारण कष्ट में होते हैं तो इस कष्ट की शरीर पर दोहरी मार पड़ती है। एक तो शरीर जैविक तौर पर बीमारी से जूझता है और दूसरे बीमारी से उत्पन्न होने वाले मानसिक दुख का भी शरीर पर काफी प्रतिकूल असर पड़ता है। बीमारी के जैविक पहलू को तो डॉक्टरों और दवाओं से संभाला जा सकता है, लेकिन बीमारी से उत्पन्न कष्ट के कारण हो रही हानि को न तो डॉक्टर और न ही दवाएं ठीक कर सकती है और इसीलिए हम अक्सर डॉक्टरों से यह सलाह सुनते हैं कि हौसला रखिए, बीमारी को भूले रहिए आदि-आदि। इसके पीछे विचार यही है कि मानसिक कष्ट की दवा डॉक्टर के पास भी नहीं होती है और यदि वह कहीं है तो वह हमारे पास ही है जिसे समझने भर की जरूरत है। जो व्यक्ति इसे समझ लेता है उसका हौसला बड़ी से बड़ी बीमारी भी नहीं डिगा सकती।

प्रतिकूल परिस्थितियों में भी खुश रहना चाहिए

कभी-कभी होता है कि कोई व्यक्ति किसी बीमारी से पीड़ित होता है, लेकिन जब तक उसे उस बीमारी का ज्ञान नही होता है तब तक उसका शरीर उससे अंदरूनी तौर पर जूझ रहा होता है और उस पर उस बीमारी का कोई प्रतिकूल असर भी नही होता है, लेकिन जैसे ही उसे उस बीमारी का पता लगता है वह अच्छी डॉक्टरी देखभाल के बावजूद लड़खड़ा जाता है। कारण यही है कि जैसे ही बीमारी के मानसिक कष्ट की वजह से व्यक्ति दुखी होने लगता है तो वह बहुत से स्वत: प्रवृत्त रक्षात्मक उपायों से अपने शरीर को वंचित कर देता है। इसलिए प्रतिकूल परिस्थितियों में भी खुश रहकर इसके सकारात्मक असर का कमाल देखिए।

[ डॉ. महेश भारद्वाज ]

Posted By: Bhupendra Singh