मोदी सरकार - 2.0 के 100 दिन

एमजे अकबर। आम चुनावों में बड़े विरोधाभास दिख रहे हैं। चुनावी पंडितों का अनुमान है कि भारतीय मुसलमान प्रधानमंत्री मोदी के पक्ष में मतदान नहीं करेंगे। दूसरी ओर किसी अन्य प्रधानमंत्री को मुस्लिम जगत से उतना समर्थन नहीं मिला जितना पीएम मोदी को मिला। संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब के नेतृत्व में खाड़ी देशों ने पीएम मोदी के पहले कार्यकाल के दौरान कई मोर्चों पर भारत में भारी निवेश किया है।

आज भारत में यूएई के तेल का संचित भंडार मौजूद है। भारत, सऊदी अरब और यूएई 44 अरब डॉलर की लागत से बनने वाली रिफाइनरी बनाने के लिए सहमत हुए हैं। उनके प्रत्यक्ष निवेश का आंकड़ा भी 10 अरब डॉलर से अधिक हो गया है। मोरक्को में हमने आधुनिक तकनीक वाले पुल बनाए हैं। साथ ही उत्तरी और सब-सहारा अफ्रीका में हमारी मौजूदगी बढ़ी है। इंडोनेशिया के साथ संबंधों में व्यापक सुधार हुआ है। पश्चिम एशिया के साथ संबंध भी पटरी पर लौटे हैं। सुरक्षा और आतंकवाद के मसले पर हम अधिकांश शक्तिशाली अरब देशों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहे हैं। बीते चार साल में जो भगोड़े सुरक्षित ठिकाने की आस में खाड़ी देशों में गए थे, उन्हें वापस लाया जा रहा है। पाकिस्तान को छोड़कर समस्त मुस्लिम जगत इस समय सीमा-पार आतंकवाद को लेकर भारत के रुख का समर्थन कर रहा है।

एक समय दुबई को लेकर यह धारणा थी कि वह भारत से वित्तीय घपले करके भागने वालों का सुरक्षित ठिकाना है, लेकिन आज ऐसे भगोड़े भारत को सौंपे जा रहे हैं। इससे उन ताकतवर नेताओं के साथ उनके गहरे जुड़ाव की परतें भी खुल रही हैं जिन्हें उन्होंने रिश्वत खिलाई थी। एक वक्त कांग्रेस ने बिचौलियों को देश से भागने में मदद की, लेकिन अब अगस्ता हेलीकॉप्टर मामले में दलाली खाने वालों को भारत में वापस लाने में सफलता मिली। पीएम मोदी की विदेश नीति और उसका शानदार प्रबंधन करने वाली विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की सबसे बड़ी सफलता यह है कि उन्होंने सभी पक्षों को अद्भुत तरीके से साधा। इजरायल से हमारे रिश्ते और परवान चढ़े। बेंजामिन नेतन्याहू भारत का दौरा करने वाले पहले इजरायली पीएम बने। इसके साथ ही इजरायल के इर्दगिर्द अरब जगत के साथ हमारे रिश्तों की बुनियाद और मजबूत होती गई।

2018 में मोदी फलस्तीन का दौरा करने वाले भारत के पहले प्रधानमंत्री बने। उन्हें वहां का सर्वोच्च नागरिक सम्मान मिला। इसके बाद सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने भी उन्हें अपने सबसे बड़े सम्मान से नवाजा। इसी दौरान ईरान के साथ हमारे संबंध और प्रगाढ़ हुए। चाबहार बंदरगाह के विचार ने भी मूर्त रूप ले लिया। यह कूटनीति की उत्कृष्टता का प्रमाण है। यह कोई संयोग नहीं कि यूएई ने अपनी जमीन पर पहर्ला हिंदू मंदिर बनाने की स्वीकृति दी। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के नेतृत्व में यूएई ने स्थानीर्य हिंदुओं की एक बड़ी आबादी की जरूरत पर उचित प्रतिक्रिया दी। इसमें पीएम मोदी के साथ उनकी मित्रता ने अप्रत्याशित भूमिका निभाई।

जरा अतीत के असंतुलन से तुलना कीजिए जब अक्सर लगता था मानो हम एक ही दिशा में चले जा रहे हैं। जवाहरलाल नेहरू मिस्न के राष्ट्रपति नासिर के इतने अनन्य मित्र थे कि इस दोस्ती की खातिर भारत ने इजरायल से कोई रिश्ता ही नहीं रखा, जबकि 1950 के दशक में अधिकांश अरब देशों की पसंद पाकिस्तान हुआ करता था। उस समय सऊदी अरब का दिल्ली के साथ नाममात्र का ही रिश्ता था। नेहरू की विदेश नीति की कड़वी हकीकत उनके निधन के एक साल बाद तब सामने आई जब 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के दौरान इंडोनेशिया, ईरान, जॉर्डन और सऊदी जैसे मुस्लिम देशों ने पाकिस्तान का समर्थन किया।

नेहरू ने कई साल सुकर्णों के नाम किए थे। इंदिरा गांधी ने भले ही यासिर अराफात को फलस्तीन का नायक बताकर पलक-पांवड़े बिछा दिए हों, लेकिन मुस्लिम जगत ने 1968 में उन्हें सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा ही किया जब ओआइसी में शामिल होने के लिए गए भारतीय प्रतिनिधिमंडल को पाकिस्तानी तानाशाह याह्या खान की खुशामद के लिए अलग-थलग कर दिया गया। 1970 के दशक में लीबिया ने भारत के खिलाफ परमाणु हथियारों का जखीरा बनाने के लिए पाकिस्तान को वित्तीय मदद पहुंचाई। उस समय सीरिया और इराक जैसे अरब देश ही भारत के पक्ष में खड़े थे। पड़ोसी बांग्लादेश के साथ हमारे संबंध बड़ी सावधानी के साथ आगे बढ़े, लेकिन पीएम मोदी के दौर में उन्हें एक नया क्षितिज मिला।

पूरब की ओर बढ़ें तो इंडोनेशिया के साथ हमारे रिश्ते आज इतने सकारात्मक पड़ाव पर हैं कि उसके साथ व्यापार में बहुत तेजी आई है। इंडोनेशिया अंडमान से लगा हुआ है और हम इस विस्तृत द्वीप समूह में एक बंदरगाह विकसित करने पर काम कर रहे हैं। मोदी जो बदलाव लाना चाहते थे उसे उन्होंने अपनी विलक्षण निजी कूटनीति के जरिये भी अंजाम दिया। बीते 36 वर्षों में यूएई का दौरा करने वाले वह पहले प्रधानमंत्री बने। उनसे पहले जब सोनिया और राहुल सत्ता की कमान और डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री पद संभाले हुए थे तब दस साल तक भारतीय प्रधानमंत्री के पास उस देश का दौरा करने का वक्त नहीं था जहां लाखों भारतीय आजीविका के लिए बसे हैं।

मुस्लिमों के प्रति कांग्रेस की नीति केवल अतीत की औपचारिक निरंतरता वाली ही रही जिसमें कल्पनाशीलता और नई पहल का अभाव होने के कारण वह शिथिल पड़ गई। इस बदलाव को हाल में आयोजित इस्लामिक देशों के संगठन में भारत को मिले आमंत्रण से बेहतर कुछ और नहीं दर्शा सकता। 1968 में इसी समूह ने भारत के लिए दरवाजे बंद कर दिए थे। अब उसने एक खिड़की खोली है। 1968 में पाक ने भारत का बहिष्कार कराया था। 2019 में पाकिस्तान ने धमकी दी कि अगर सुषमा स्वराज को ओआइसी के मंच पर बोलने दिया गया तो वह इस आयोजन का बहिष्कार करेगा। ओआइसी के 57 में से 56 देशों ने पाकिस्तान को स्पष्ट कह दिया कि वह ऐसा करना चाहता है तो करे, लेकिन भारत को भेजा बुलावा निरस्त नहीं किया जाएगा।

इसे किसी भी भाषा में बड़ी कूटनीतिक विजय ही कहा जाएगा। पाक को छोड़कर दुनिया के तमाम मुस्लिम देश पीएम मोदी पर भरोसा कर रहे हैं। आखिर वे मोदी के साथ काम क्यों करना चाह रहे हैं? पहला कारण यह है कि वे जानते हैं कि भारतीय पीएम पक्षपाती नहीं हैं। वे यह समझते हैं कि मोदी का एकमात्र मकसद है भारतीय हितों की रक्षा करना। दूसरा कारण यह है कि उन्होंने महसूस किया है कि मोदी के नेतृत्व में भारत एशिया और दुनिया की बड़ी आर्थिक-सामरिक ताकत बनने की राह पर है। मैं नहीं मानता कि भारतीय मुस्लिम उस बात को नहीं समझते जो शेष दुनिया के मुस्लिम समझ पा रहे हैं।

किसी भी लोकतंत्र में एक खास चीज होती है जिसे अदृश्य वोट कहा जाता है, जो कई कारणों से खुद को प्रदर्शित नहीं करता। यह बात भारतीय मुसलमानों पर भी लागू होती है। 23 मई को नतीजे सामने आने के बाद जब चुनावी विशेषज्ञ आंकड़ों की छानबीन करेंगे तो वे मोदी के पक्ष में पड़े अदृश्य वोट देख पाएंगे। हर सर्वे में मोदी को फिर से चुने जाने के कारणों में विदेश नीति का उल्लेख प्रमुखता से हो रहा है। भारतीय मुसलमानों पर असर डालने वाला यह एक अतिरिक्त पहलू है।

 (लेखक पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं) 

Posted By: Dhyanendra Singh

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