जिसका जलवा कायम है उसका पिता मुलायम है.. के नारे ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को समाजवादी पार्टी के केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया है, लेकिन आजकल ये नारे वही लोग लगा रहे हैं जो कल तक ‘जिसका जलवा कायम है उसका नाम मुलायम है’ के नारे लगाते थकते नहीं थे। एक जनवरी 2017 को सपा के इतिहास में ऐसे दिन के रूप में याद किया जाएगा जिस दिन इस नारे ने सपा में एक युगांतकारी परिवर्तन कर दिया और पार्टी के तथाकथित असंवैधानिक राष्ट्रीय सम्मेलन में मुलायम सिंह यादव के स्थान पर अखिलेश को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया। ऐसा लग सकता है कि सपा में तख्ता पलट हुआ है और पुत्र ने पिता को विस्थापित कर दिया है, लेकिन शायद यह मुलायम का राजनीतिक मास्टर स्ट्रोक है जिससे उन्होंने एक साथ कई लक्ष्य हासिल कर लिए हैं। सबसे बड़ी चुनौती सपा में विरासत को निपटाने की थी जो हल हो गई और अखिलेश के प्रतिद्वंद्वी उनके चाचा शिवपाल उफ तक न कर सके। मुलायम ने 1967 में उत्तर प्रदेश विधानसभा का पहला चुनाव जीता था। उन्होंने डॉ. राममनोहर लोहिया से समाजवाद का ककहरा सीखा, लेकिन कुछ महीनों बाद ही डॉ. लोहिया के निधन से उनके ऊपर से मार्ग-दर्शक का साया उठ गया जिससे उनकी राजनीति लोहियावाद से भटकती चली गई। मुलायम की राजनीति पर जातिवाद, परिवारवाद, मुस्लिम तुष्टीकरण और अपराधियों को संरक्षण देने जैसे आरोप लगने लगे। मुलायम के व्यक्तित्व के आगे ये आरोप धूमिल पड़ते रहे, लेकिन अब शायद उनको समझ में आ गया होगा कि ऐसी छवि के बलबूते सपा आगे की पारी नहीं खेल सकेगी।
जिस तरह से लोगों का रुझान विकास और साफ-सुथरी राजनीति की तरफ हुआ है उससे स्पष्ट हो गया कि शिवपाल की बजाय अखिलेश को ही आगे करना ठीक रहेगा। इसकी शुरुआत 2012 में अचानक अखिलेश को मुख्यमंत्री बना कर कर दी गई, लेकिन अखिलेश पर यह दाग लगा रहा कि वह अपने बलबूते न तो सरकार चला सकते हैं और न ही पार्टी। इससे निपटने के लिए एक ओर अखिलेश ने विकासवादी और साफ-सुथरी राजनीति करने वाले नेता की छवि अर्जित की, वहीं दूसरी ओर शिवपाल यादव को मंत्रिमंडल से बाहर कर सरकार पर अपनी मजबूत पकड़ का संदेश दे दिया। इसके बाद उनको पार्टी पर अपना वर्चस्व स्थापित करने की जरूरत थी जिसका अवसर उनको पार्टी से निकाल कर दिया गया। जिस तरह पार्टी-कार्यकर्ता और नेता मुलायम और शिवपाल की बजाय अखिलेश की ओर मुड़े उससे अखिलेश में यह आत्म-विश्वास आया कि वे पार्टी संविधान के इतर जाकर राष्ट्रीय सम्मलेन आहूत करवा सकें और न केवल पिता मुलायम को हटाकर स्वयं राष्ट्रीय अध्यक्ष बनें वरन चाचा शिवपाल को प्रदेश अध्यक्ष पद से भी हटा दें। इस तरह मुलायम के आशीर्वाद से अखिलेश ने पार्टी की विचारधारा, संगठन और सरकार तीनों पर अपना आधिपत्य जमाकर ऐसी हैट्रिक लगाई कि सैफई का टीपू सपा का सुल्तान बन गया। इस पर मुलायम से ज्यादा और कौन खुश हो सकता है?
मुलायम सिंह का दूसरा लक्ष्य आगामी चुनाव में विजय के लिए सपा की पृष्ठभूमि तैयार करना था। इसमें कई पेंच थे। अखिलेश के विकास के दावों के बावजूद प्रदेश की कानून-व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह था और पार्टी की आपराधिक छवि के चलते आम मतदाता पार्टी से छिटका हुआ था। विगत 8 नवंबर के बाद केवल विमुद्रीकरण और मोदी ही चर्चा के केंद्र में थे और किसी पार्टी या नेता की कोई चर्चा ही नहीं हो रही थी। अचानक मुलायम ने मोदी और विमुद्रीकरण को विस्थापित कर अखिलेश और सपा को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। अखिलेश सरकार के विगत पांच वर्षों के क्रिया-कलापों और विकास के दावों की जांच करने की बजाय मीडिया से लेकर गली-मुहल्लों और चौपालोंं में केवल और केवल सपा और अखिलेश की ही चर्चा हो रही है। चुनावी दृष्टिकोण से यह सपा के लिए बहुत लाभकारी स्थिति है।
समाजवादी पार्टी में टिकट वितरण से लोगों में यह संदेश चला गया था कि पार्टी में माफिया राज चलता रहेगा। मुख्तार अंसारी के कौमी एकता दल के सपा में विलय और माफिया अतीक अहमद और अमनमणि त्रिपाठी जैसों को टिकट देकर सपा लोगों को क्या संदेश देना चाहती थी? अखिलेश का ऐसे लोगों से शुरू से विरोध रहा है। 2012 चुनावों के समय भी उन्होंने बाहुबली नेता डीपी यादव को सपा में प्रवेश नहीं करने दिया था। इस बार भी कौमी एकता दल के विलय या अतीक अहमद को टिकट देने पर उनकी सहमति नहीं थी। क्या ऐसा नहीं लगता कि मुलायम ने पहले ऐसे सभी तत्वों को अपने पाले में किया और फिर अखिलेश को अपने से अलग होने देने का वातावरण बना कर यह सुनिश्चित किया कि ऐसे तत्व अखिलेश से अलग हो जाएं? अगर यह दांव सफल रहा तो मुलायम का तीसरा लक्ष्य हासिल हो जाएगा और सपा हमेशा के लिए अपनी आपराधिक छवि त्याग कर उस आरोप से मुक्त हो जाएगी जो पार्टी और उसकी सरकार के सभी किये-धरे पर पानी फेरता रहा है। यह सब करने में मुलायम को अपनी संपूर्ण राजनीतिक समझ का प्रयोग करना पड़ा होगा और उन तमाम तत्वों को बड़ी शिद्दत से यह भी जताना पड़ा होगा कि वे वास्तव में अखिलेश के विरुद्ध और उनके साथ खड़े हैं। अखिलेश न केवल राजनीतिक रूप से मजबूत हुए हैं, वरन वे लोकप्रिय भी हुए हैं और उन्होंने जनता की सहानुभूति भी प्राप्त की है। अब आगे की लड़ाई उनको खुद लड़नी है, चाहे पार्टी पर नियंत्रण करना हो या फिर कार्यकर्ताओं का दिल जीतना हो, चुनाव चिन्ह की दावेदारी हो या उम्मीदवारों के चयन और चुनाव संचालन का सवाल हो। यदि पार्टी में विभाजन के विवाद के चलते चुनाव आयोग सपा का चुनाव चिन्ह जब्त कर लेता है अथवा उनको साइकिल चुनाव-चिन्ह नहीं भी मिलता तो भी 1969 की नजीर सामने है जब इंदिरा गांधी को कांग्रेस पार्टी में विभाजन पर कांग्रेस के चुनाव चिन्ह की बजाय गाय-बछड़ा चुनाव चिन्ह मिला और वही उन्हें चुनाव में जीत दिलाने में सहायक बना। राजनीति में चुनाव चिन्ह से ज्यादा दल-समर्थन और जन-समर्थन महत्वपूर्ण है इसलिए अखिलेश के लिए यही बेहतर होगा कि वह इन सब विवादों में न पड़ कर आगे चुनावों को साधने की रणनीति में समय और ध्यान लगाएं। क्योंकि अब चुनाव तिथियों की घोषणा हो गई है।
सबसे महत्वपूर्ण यह है कि क्या अखिलेश अपने को 1967 के मुलायम व उनके राजनीतिक गुरु डॉ. लोहिया और उनकी विचारधारा से जोड़ कर राजनीति करने का साहस रखते हैं? वह कल के समाजवाद को आज के विकासवाद से संबद्ध कर एक ऐसे नव समाजवाद का सूत्रपात कर सकते हैं जिसमें संकीर्ण जातिवादी राजनीति से निकल कर किसानों, मजदूरों, गरीबों और महिलाओं के व्यापक हितों के संवर्धन और समावेशी राजनीति की खुशबू आती हो? क्या चुनाव जीतने के एजेंडे से आगे बढ़ कर अखिलेश ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के समानांतर विकास और सुशासन की ओर रुख कर सकेंगे? यदि ऐसा हो सका तो न केवल प्रदेश वरन आगे देश की राजनीति में भी अखिलेश एक मजबूत और लंबी पारी खेल सकेंगे।
[ लेखक डॉ. एके वर्मा, सेंटर फॉर द स्टडी अॉफ सोसायटी एंड पॉलिटिक्स के निदेशक हैं ]

Posted By: Bhupendra Singh

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