16-17 जून, 2013 की अंधेरी रात उत्तराखंड में भयावह आफत लाई। रातों-रात यह आफत देवभूमि की अब तक की सबसे बड़ी त्रासदी बन गई। हजारों लोग मां अलकनंदा, मंदाकिनी, भागीरथी सहित माता गंगा के पेट में समा गए, अनेक व्यक्ति जीवित दफन हो गए, असंख्य का अब तक कोई अता-पता नहीं है। हादसे को 12 दिन बीत रहे हैं, इन सभी के परिवार और परिजन बेहद तकलीफ के दौर से गुजर रहे हैं।

मुसीबत की इन घड़ियों में समूचा देश आपदा पीड़ितों के साथ आ खड़ा हुआ है। सरकारें हों या व्यावसायिक संस्थाएं, आध्यात्मिक संस्थाएं हों या सामाजिक संगठन, सभी इस त्रासदी से ग्रसित लोगों की मदद व सेवा के लिए दौड़ पड़े हैं, लेकिन ढेरों जटिलताओं वाले पहाड़ी क्षेत्रों में तात्कालिक और सबसे ज्यादा जरूरी सेवा जो दे पा रहे हैं वे हैं भारतीय सेना और केंद्रीय अ‌र्द्धसैनिक बल। सेना के जांबाज अफसरों और जवानों की भूमिका त्रासदी से निजात दिलाने में सबसे महत्वपूर्ण हो गई है। साथ में एनडीआरएफ और आइटीबीपी आदि ने कंधे से कंधा मिलाकर राहत सेवा का एक नया इतिहास लिख दिया है।

जीव कोई भी हो, इंसान हो या पशु-पक्षी, सभी को जान प्यारी होती है। अपनी जान को जोखिम में डालकर वायुसेना, थलसेना और केंद्रीय अ‌र्द्धसैनिक बलों के जवानों और अधिकारियों ने जो जज्बा, जुनून, जोश और बहादुरी दिखाई है, उसे सलाम करने का मन हर भारतवासी का हो रहा है। बीते 25 जून को मौसम की मार बचाव व राहत दे रहे इन नौजवानों को भी झेलनी पड़ी। राहत कार्यो में लगा एक हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया और इसमें सवार सभी 20 जवान कुछ ही पलों में काल कवलित हो गए, किंतु इस हादसे के बाद भी वायुसेना, थलसेना, नौसेना, एनडीआरएफ और आइटीबीपी आदि अ‌र्द्धसैन्य बलों में से किसी के हौसले में रत्ती भर भी कमी नहीं आई। इन बलों ने और अधिक जोशोखरोश के साथ बचाव तथा राहत कार्यो में तेजी ला दी। स्वार्थ से डूबे लोगों और समय के बीच परमार्थ की ऐसी ज्योति जलाने वाले इन सुरक्षा बलों तथा इनके जांबाज जवानों को मैं हार्दिक बधाई और शाबासी देता हूं तथा पूरा गंगा एक्शन परिवार, परमार्थ निकेतन उन्हें अपने हृदय की गहराइयों से सलाम करता है। यह कल्पना की जा सकती है कि अगर सेना और आइटीबीपी के जवानों तथा राहत एवं बचाव कार्यो में लगे अन्य लोगों ने इतना साहस और संकल्प नहीं दिखाया होता तो जनहानि का आंकड़ा कितना अधिक होता। यह उनकी इस अप्रतिम भूमिका का ही नतीजा था कि हजारों जिंदगियां बचा ली गईं। फिर भी यह त्रासदी इतनी बड़ी है कि उसमें फंसे सभी लोगों को कुछ न कुछ गंवाना पड़ा। उत्तराखंड में जो आपदा आई वह देश और विदेश में चर्चा का विषय बनी हुई है और लोग अपने-अपने स्तर पर इसके कारणों की खोज कर रहे हैं, लेकिन हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि संकट की इस घड़ी में जवानों ने कितना बड़ा योगदान दिया है।

विगत दिनों बदरीनाथ धाम में फंसे एक संत ने हैलीपैड पर उतरते समय प्रतिक्रिया दी कि सेना के जवान पीड़ितजनों की इतनी सेवा कर रहे हैं जितनी सगा बेटा भी मां-बाप की नहीं करता। जवानों के ऐसे सेवाभाव का हृदय की गहराइयों से अभिनंदन एवं पूरे देश का वंदन है। आध्यात्मिक क्षेत्र में अक्सर लोग कहा करते हैं कि व्यक्ति को लोकेषणा, पुत्रेषणा और वित्तेषणा से मुक्त होना चाहिए। देखा जाए तो वास्तव में सेना के ये जवान धन, शक्ति, यश जैसी कामनाओं से मुक्त होकर निष्काम सेवा में जुटे हैं। ऐसे कर्मवीरों और कर्मयोगियों को कृतज्ञ राष्ट्र नमन करता है। इन कर्मवीरों ने जितना बड़ा कार्य किया है उसकी मिसाल मिलनी मुश्किल है, क्योंकि यह सब जिन परिस्थितियों में हुआ वे बहुत ही विषम और जटिल थीं। ये ऐसी परिस्थितियां थीं जिनमें साहसी से साहसी व्यक्ति का भरोसा डिग जाता।

आज जरूरत है कि भारत की सभी संस्थाएं, चाहे वे राजनीतिक हों या सामाजिक, अपने-अपने दल की बातें बंद करके दर्द बांटने की बात करें। दर्द बांटने से ही कम होता है। आइए! हम सब मिलकर आपदा पीड़ितों का दर्द बांट लें और भविष्य का उत्तराखंड ऐसा बनाएं, जिसे ग्रीन उत्तराखंड के नाम से जाना जाए। ग्रीन टूरिज्म और ग्रीन पिलग्रिमेज तीर्थाटन का स्वर्ग देवभूमि उत्तराखंड का सर्वाधिक प्रचलित नारा बन जाए। केदारनाथ के पुनर्निर्माण के समय हम सब अपने उन बहादुर जवानों को न भूल जाएं, जिन्होंने त्रासदी के पीड़ितों को बचाने के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।

हम उन वीरों को कदापि न भूलें, जिनका पसीना देवभूमि के हर पर्वत, हर घाटी और हर झील पर पड़ा है। हम इनकी स्मृति में केदारनाथ क्षेत्र में स्मृति वन लगाएं और इस स्मृति वन के हर पौधे में रोज इस भाव से जल दें मानो हम इन वीर जवानों को अपनी जलांजलि अर्पित कर रहे हैं, उनकी सेवा कर रहे हैं।

[स्वामी चिदानंद सरस्वती, लेखक गंगा एक्शन परिवार, परमार्थ निकेतन, ऋषिकेश के संस्थापक एवं अध्यक्ष हैं]

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