चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की महत्वपूर्ण भारत यात्रा के समग्र प्रभाव का विश्लेषण कर रहे हैं जबिन टी. जैकब

चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग का तीन दिवसीय भारत दौरा संपन्न होगा। इसे कई कारणों से खासी ख्याति मिली। हालांकि ठोस नतीजों की बात करें तो इससे कोई बहुत महत्वपूर्ण दिशा उभरती दिखाई नहीं दी। सालों से चीन ने जिन चीजों के लिए प्रसिद्धि हासिल की है वे हैं इसकी परियोजनाओं का वृहद आकार, तीव्र महत्वाकांक्षाएं और इन्हें पूरा करने की तेज रफ्तार। इन तमाम मुद्दों पर चीन के राष्ट्रपति का भारत दौरा खरा नहीं उतरता।

शी चिनफिंग और नरेंद्र मोदी, दोनों नेता अपने-अपने देश में मजबूत माने जाते हैं और इसलिए लंबे समय से लंबित सीमा विवाद का राजनीतिक हल निकालने की स्थिति में नजर आते हैं। हालांकि विश्लेषकों ने चीन के राष्ट्रपति की इस यात्रा के दौरान सीमा विवाद पर किसी बड़ी सफलता की उम्मीद नहीं की थी। हालांकि इस दौरे से आर्थिक मोर्चे पर बड़ी उम्मीदें थीं, क्योंकि यात्रा से पहले मुंबई में चीनी महावाणिज्य दूत ने चीन द्वारा भारत में सौ अरब डॉलर के निवेश की उम्मीद जताई थी।

ऐसे में केवल 20 अरब डॉलर के निवेश का वादा काफी निराशाजनक है। ऐसा क्यों हुआ? सबसे पहले तो चीनी दूत ने इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश के आंकड़े को एक तय समयसीमा में नहीं बांधा था, बल्कि भविष्य में निवेश की बात कही थी। इसके अलावा, शी चिनफिंग की हालिया यात्रा में इस निवेश के होने की उम्मीद भी नहीं थी। किंतु इससे पहले हम निराशा में पूरी तरह डूब जाएं, आर्थिक प्रकृति के कुछ अन्य महत्वपूर्ण सवालों के जवाब ढूंढ़ना भी जरूरी है। क्या चीनी उद्योग जगत उतना ही मुनाफाखोर है जितना कि पश्चिमी। और आम धारणा के विपरीत वह कौन है जो कम्युनिस्ट पार्टी या चीनी सरकार के दुमछल्ले के तौर पर कार्य नहीं करता और जिसके पास अपनी मर्जी से फैसले की छूट है।

निश्चित ही चीन का उद्योग जगत जानता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था और बाजार में कई तरह के प्रतिबंध हैं जो इतनी बड़ी राशि के निवेश की घोषणा की राह की बाधा हैं। इसी आलोक में देखा जाना चाहिए कि दो औद्योगिक पार्को की महत्वपूर्ण पहल गुजरात और महाराष्ट्र के पुणे में करने की घोषणा की गई है। ये दोनों क्षेत्र इंफ्रास्ट्रक्चरऔर मानव संसाधन क्षमताओं के नजरिये से उद्योग और निवेश के लिए उपयुक्त हैं।

दूसरे शब्दों में चीन भारत की केंद्र और राज्य सरकारों से नीतिगत समर्थन के बिना पूंजी और ढांचागत विकास के लिए भंडारा खोलने नहीं जा रहा है। वह यह भी देखना चाहता है कि इस प्रकार के इंफ्रास्ट्रक्चर विकास से उसे क्या हासिल होने जा रहा है। इस संदर्भ में केवल गुजरात और कुछ अन्य राज्यों का ही साफ-सुथरा रिकॉर्ड है। यही कारण है कि जापानी निवेश भी गुजरात और तमिलनाडु जैसे राज्यों में होने की योजना है जहां पहले से ही ढांचागत विकास हो चुका है और जो निवेश के लिए बेहतर विकल्प हैं। देश के अन्य राज्यों को सुशासन, इंफ्रास्ट्रक्चर और सामाजिक व आर्थिक नीतियों के परिप्रेक्ष्य में निवेशकों का विश्वास जीतने के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना है। चाहे निवेश चीनी हो, जापानी हो या फिर किसी अन्य देश का, इन राज्यों को खुद को इसके लिए तैयार करना पड़ेगा। किंतु सवाल खड़ा होता है कि क्षेत्रीय और वैश्विक राजनीति में ताकतवर होने के अभिलाषी चीन ने अगर जापान से अधिक नहीं, तो कम से कम उसके बराबर के निवेश की घोषणा क्यों नहीं की?

निश्चित तौर पर उसके पास साधन हैं और वह चाहता तो ऐसा कर सकता था। भारत एक ऐसी जगह है जहां निवेश से क्षेत्रीय और वैश्विक प्रभाव में बढ़ोतरी होती और यह चीन के लिए फायदेमंद होता। लगता है कि यहीं राजनीति बीच में आ गई। इंडियन काउंसिल ऑफ व‌र्ल्ड अफेयर द्वारा आयोजित कार्यक्रम में, जिसकी अध्यक्षता भारत के उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने की थी, शी चिनफिंग ने कहा कि चीन दक्षिण एशिया में 30 अरब डॉलर का निवेश करने जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि अगले पांच साल में चीन का इरादा इस क्षेत्र में अपने व्यापार को बढ़ाकर 150 अरब डॉलर करने का है। दूसरे शब्दों में चीनी राष्ट्रपति ने संदेश दिया कि चीन की पूंजी उन्हीं देशों में जाएगी जहां के आर्थिक और राजनीतिक हालात चीनी हितों के अनुकूल होंगे।

दौरे की समाप्ति पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान पर गौर करें। अहमदाबाद में स्वागत-सत्कार में कोई कोर-कसर न छोड़ने वाले मोदी ने चुनार और देपसंग में हालिया घुसपैठ को लेकर कोई नरमी नहीं दिखाई। चीन ने अपने राष्ट्रपति की भारत यात्रा के दौरान हालात को जटिल बनाने की कोशिश क्यों की? स्पष्ट है कि चीन भारत को संकेत दे रहा है कि चीनी प्रधानमंत्री ली कछ्यांग और राष्ट्रपति शी चिनफिंग की यात्रा पर ऐसी घुसपैठ की छाया रही जिसकी प्रकृति लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल पर घुसपैठ की सामान्य घटनाओं से अलग और विशिष्ट है। इन दलीलों में दम नहीं है कि चीनी नेतृत्व पीपुल्स लिबरेशन आर्मी पर नियंत्रण में अक्षम है, जिस कारण इस तरह की घुसपैठ की घटनाएं हो रही हैं। इसका सीधा सा कारण यह है कि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की निष्ठा चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से गहरे जुड़ी हुई है और इन दोनों के साझा हित हैं। इसलिए शी चिनफिंग को पता ही होगा कि चीनी सेना भारत में घुसपैठ करेगी।

तब इसका क्या संकेत है? अगर कुछ भारतीय विश्लेषकों की बात पर यकीन कर भी लें कि शी चिनफिंग की चीनी सेना पर पकड़ मजबूत नहीं है तो यह केवल भारत के लिए ही नहीं, बल्कि चीन के तमाम पड़ोसियों के लिए गंभीर चिंता का विषय है। या फिर चीन का पक्का विश्वास है कि भारत चीन की हरकतों की कड़ी प्रतिक्रिया देने की स्थिति में नहीं है या फिर इसके गंभीर दुष्परिणाम नहीं होंगे? या फिर उसके जेहन में यह है कि भारत को चीनी पूंजी की उतनी ही आवश्यकता है जितनी कि चीन को विदेश में निवेश करने की? स्पष्ट है कि यह मसला जितना सरल दिखता है उतना ही जटिल है। यात्रा के दौरान नरेंद्र मोदी ने कड़ा बयान जारी किया, जो सीमा विवाद के शीघ्र निपटारे पर जोर देता है। ऐसा ही बयान शी ने भी आइसीडब्ल्यूए के कार्यक्रम में दिया था। उन्होंने लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल को स्पष्ट करने पर जोर दिया था। मोदी ने चीन की वीजा नीति और दोनों देशों के बीच बहने वालीं नदियों के पानी के मुद्दे को भी उठाया। दूसरे शब्दों ने मोदी ने हर उस प्रमुख मुद्दे को उठाया जो दोनों पक्षों के बीच समस्या बना हुआ है और शी को इन मुद्दों से कन्नी काटने का मौका नहीं दिया। भारत अपने मुद्दों को और बेहतर ढंग व जोरदारी के साथ रख सकता था या फिर उसने इस यात्रा के दौरान कुछ गंवा दिया है, यह सवाल किसी और दिन के लिए।

(लेखक इंस्टीट्यूट ऑफ चाइनीज स्टडीज, दिल्ली में असिस्टेंट डायरेक्टर हैं)