कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को गांधी जी की हत्या का जिम्मेदार बताकर और फिर अपने इस कथन पर अड़े रहकर नई बहस छेड़ दी है। यह एक संवेदनशील मुद्दा है और कांग्रेस को इससे नुकसान हो सकता है। 2014 में भिवंडी रैली में राहुल ने कहा था, 'संघ के लोगों ने गांधी जी को गोली मारी।' इस पर स्थानीय संघ सचिव राजेश कुंटे ने राहुल पर संघ को बदनाम करने के लिए मानहानि का मुकदमा किया। इस मुकदमे के खिलाफ बंबई उच्च न्यायालय से राहत न मिलने पर राहुल ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील की। 24 अगस्त को उन्होंने कहा कि उनका मंतव्य गांधी की हत्या के लिए पूरे संघ को नहीं, बल्कि उससे जुड़े कुछ लोगों को जिम्मेदार ठहराना था। इस पर न्यायालय ने कुंटे के वकील से कहा कि यदि वह सहमत हों तो केस खत्म किया जाए। एक सितंबर को कुंटे के वकील ने कहा कि यदि राहुल यह कहें कि वह संघ को गांधी की हत्या का दोषी नहीं मानते तो वादी को कोर्ट का सुझाव स्वीकार्य है, लेकिन राहुल ने अपना 'स्टैंड' बदल दिया। उनके वकील ने न्यायालय को बताया कि राहुल अपने बयान पर अक्षरश: कायम हैं। अब भिवंडी ट्रायल-कोर्ट में उन पर मानहानि का मुकदमा चलेगा। वहां गांधी की हत्या के मुद्दे पर बहस आगे जाएगी। पिछले 69 वर्षों में गांधी के हत्या को लेकर एक बिंब बन गया था कि नाथूराम गोडसे ने उनकी हत्या की जो हिंदू-महासभा और उसके पहले संघ संबद्ध था। गोडसे ने न्यायालय में अंतिम वक्तव्य में कहा था कि उसने गांधी की हत्या की और उसकी नैतिक चेतना उसे दोषी नहीं मानती।

क्या नाथूराम गोडसे ही गांधी का हत्यारा था या उसमें अन्य लोगों ने दुष्प्रेरण (एबेटमेंट) किया? क्या ऐसी शक्तियां थीं जिनको बापू से परेशानी थी? हत्या से पूर्व गांधी पर 5-6 हमले हो चुके थे जिनका पता नेहरू और सरदार पटेल को था। हत्या के दस दिन पहले 20 जनवरी 1948 को भी हमला हुआ था, जिसमें पुलिस ने मदनलाल पाहवा और उसके साथियों को गिरफ्तार किया। उनसे चाकू और बम बरामद किए, लेकिन इस आधार पर छोड़ दिया कि इसका प्रमाण नहीं मिला कि चाकू और बम उनके ही थे। यह अप्रत्याशित था, क्योंकि 20 जनवरी की रात ही मदनलाल ने पूरे षड्यंत्र का विवरण, दुष्प्रेरकों के नाम, वित्तीय एवं अन्य मदद देने वालों की जानकारी पुलिस को दे दी थी। दिल्ली पुलिस का दावा है कि उसने मदनलाल का बयान 21 जनवरी की शाम बंबई पुलिस को भेज दिया था। भारत सरकार के तत्कालीन गृहसचिव आरएन बनर्जी ने अपनी पुस्तक 'दी सिविल सर्वेंट इन इंडिया' में इस सबका उल्लेख किया है। यदि बंबई पुलिस ने इसका संज्ञान लिया होता तो गोडसे और आप्टे को आसानी से पकड़ा जा सकता था और गांधी की हत्या रोकी जा सकती थी।

अभियोजन पक्ष के प्रमुख गवाह डॉ. जगदीश चंद्र जैन की पुस्तक 'मैं बापू को न बचा सका' में संकेत है कि उन्हें मदनलाल के षड्यंत्र का पता था जिसे उन्होंने बंबई सरकार को बता दिया था। राज्य के गृहमंत्री मोरारजी देसाई ने केंद्र सरकार को इस सबसे अवगत कराया। 20 जनवरी के हमले में मदनलाल की संलिप्तता के मद्देनजर केंद्र सरकार को इसे गंभीरता से लेना चाहिए था, लेकिन दिल्ली में गृह-सचिवालय को इसका भान भी न था। दिल्ली पुलिस प्रधान ने उसे इसकी सूचना नहीं दी। वह पुलिस-प्रधान कुछ माह पूर्व ही नियुक्त हुआ था। जब गांधी की हत्या हुई उस समय सांप्रदायिकता और बिगड़ती शांति-व्यवस्था से घबरा कर नेहरू ने माउंटबेटन को सेना ओर पुलिस की कमान सौंप रखी थी। पुलिस-गुप्तचरी भी अंग्रेजों के पास थी। तो क्या अंग्रेजों को गांधी से भय था कि कहीं वे अपनी अहिंसात्मक शैली से भारत-पाक विभाजन को निरस्त न करा दें और उनके 'डिवाइड एंड रूलÓ के फॉर्मूले को संकट में न डाल दें?

बिरला हाउस में 30 जनवरी 1948 गृहमंत्री सरदार पटेल की गांधी जी से मुलाकात हुई जो शाम पांच बजे के बाद भी 10 मिनट तक चली। इससे गांधी को प्रार्थना सभा में पहुंचने में विलंब हुआ। क्या थी वह मीटिंग? किस बात के लिए पटेल उन्हें मना रहे थे? गांधी कांग्रेस को राष्ट्रीय-आंदोलन मानते थे जिसमें सभी विचारधाराओं के लोग थे। वे कांग्रेस को राजनीतिक दल के रूप में नहीं देखना चाहते थे। उनका मानना था कि यदि कांग्रेस एक दल की भूमिका में रहेगी तो अन्य दल पनप नहीं पाएंगे जो लोकतंत्र के लिए अहितकारी होगा। उनकी इच्छा थी कि कांग्रेस को विघटित कर उसे 'लोक-सेवक-संघ' में परिवर्तित कर दिया जाये और नेहरू एवं पटेल के नेतृत्व में एक नई पार्टी बने, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व को लगता था कि इससे अराजकता फैल जाएगी और शासन चलाना मुश्किल हो जाएगा। नेहरू-पटेल जानते थे कि गांधी अंतत: अपनी बात मनवा लेंगे। कहा जाता है कि गांधी जी 30 जनवरी 1948 की प्रार्थना सभा के बाद कांग्रेस के विघटन की घोषणा करने वाले थे। क्या वाकई ऐसा था?

ऐसे ही कुछ और सवाल हैं: गांधी का पोस्टमॉर्टम नहीं हुआ और किसी को पता नहीं कि उन्हें कितनी गोली लगीं? विभिन्न अखबारों ने दो से लेकर चार गोली लगने का समाचार छापा। यदि गांधी को चार गोली लगीं तो कोई दूसरा कातिल भी था। वह कौन था? गोली किस हथियार से चली? कोर्ट में इटली की बरीटा 0.9 एमएम पिस्टल और तीन रिवाल्वर जमा हुईं। यदि कातिल एक तो असलहे अनेक कैसे? गांधी के शरीर के घाव किसी भी जमा असलहे से नहीं मिले। क्या कोई ऐसा भी अज्ञात कातिल था जिसका असलहा बरामद ही नहीं हुआ? एक अनजान व्यक्ति ने पुलिस को बयान दिया कि गांधी को तीन गोली लगीं। उसके बयान को उसी से तस्दीक करा कर पुलिस ने उसे ही एफआइआर मान लिया। एफआइआर उर्दू और फारसी में दर्ज हुई। 1999 में किरण बेदी ने उसका अनुवाद कराया। पंचनामे का आज तक पता नहीं। क्या बिना उच्चतम राजनीतिक हस्तक्षेप के ऐसा हो सकता है? राहुल ऐसे कई सवालों से न्यायालय में दो-चार हो सकते हैं। राहुल गांधी की राजनीति में उत्साह ज्यादा और गहराई कम है। उन्हें अपने शब्दों के प्रयोग पर सतर्क रहने की जरूरत है, अन्यथा राजनीतिक लाभ के लिए अनावश्यक विवाद खड़ा करने से उनका अपना, कांगे्रस पार्टी और देश का नुकसान हो सकता है।

[ लेखक डॉ. एके वर्मा, सेंटर फॉर द स्टडी एंड पॉलिटिक्स के निदेशक हैं ]

Posted By: Bhupendra Singh

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