[ ब्रिगेडियर आरपी सिंह ]: कश्मीर पर अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने में नाकाम रहे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान को तुर्की, मलेशिया और चीन से जो समर्थन मिला वह डूबते को तिनके का सहारा जैसा है। मलेशियाई प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद ने कश्मीर को लेकर संयुक्त राष्ट्र में भारत को निशाना बनाया। बीते कई दशकों में यह किसी गैर-पाकिस्तानी नेता के इस मुद्दे पर सबसे तल्ख तेवर थे। उन्होंने जम्मू-कश्मीर को एक देश बताया जहां भारत ने घुसपैठ की। महातिर ने कहा, ‘संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों की अनदेखी उसके प्रति अनादर और कानून तोड़ने वाली है।’ साफ है कि उन्हें यह पता ही नहीं कि जम्मू-कश्मीर कोई देश नहीं, बल्कि ब्रिटिश भारत में एक रियासत थी और उसके शासक ने भारत के साथ विलय की संधि की थी। वास्तव में पाकिस्तान ने आक्रमण करके कश्मीर के हिस्से अवैध रूप से कब्जा लिए। महातिर का भारत को आक्रांता और कश्मीर को देश बताना यही दर्शाता है कि या तो उन्हें गलत जानकारी दी गई या बढ़ती उम्र के साथ उनकी बुद्धि उनका साथ नहीं दे रही है।

मलेशिया ने हमेशा पाकिस्तान का साथ दिया

अगर 1965 के भारत-पाक युद्ध को छोड़ दें तो घरेलू राजनीतिक-धार्मिक दबावों के चलते मलेशिया ने हमेशा पाकिस्तान का साथ दिया है। मलेशिया की 61.3 प्रतिशत जनसंख्या सुन्नी मुसलमानों की है और पाकिस्तान की तरह यहां की बहुसंख्यक आबादी इस्लाम की सलाफी और वहाबी विचारधारा को मानती है। महातिर उस पख्तन हरप्पन (पीएच) गठबंधन के मुखिया हैं जिसने भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरी नजीब रजाक सरकार को सत्ता से बेदखल कर जीत हासिल की। पीएच के अधिकांश घटक मुस्लिम बहुल दलों के हैं जो इस्लामिक शरीया कानूनों का समर्थन करते हैं। कश्मीर पर अपनी टिप्पणियों से महातिर ने रूढ़िवादी मलय मुसलमानों की खुशामद का प्रयास किया है।

भारत हर साल मलेशिया से पाम ऑयल आयात करता है

संयुक्त राष्ट्र में महातिर के भाषण से पहले मोदी ने उनसे मुलाकात कर उन्हें अनुच्छेद 370 का मुद्दा समझाया। मोदी ने जाकिर नाइक के प्रत्यर्पण की मांग भी रखी जिस पर महातिर पहले ही अपनी टांग अड़ा चुके थे। मलेशिया की सिंगापुर और इंडोनेशिया के साथ क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता रही है। भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सबसे बड़ा क्षेत्रीय खिलाड़ी है जो मलेशिया का संतुलन बिगाड़ सकता है। 2018-19 में भारत ने मलेशिया से 10.8 अरब डॉलर का आयात और मलेशिया को 6.4 अरब डॉलर का निर्यात किया। इसकी तुलना में मलेशिया-पाकिस्तान द्विपक्षीय व्यापार तकरीबन 1.3 अरब डॉलर है। भारत मलेशिया से हर साल 2.5 अरब डॉलर का पाम ऑयल आयात करता है। यदि इसे वह इंडोनेशिया या अन्य देशों से आयात करना शुरू कर दें तो मलेशिया को बड़ा झटका लगेगा।

भारत दे सकता है मलेशिया को जोर का झटका

सुखोई विमानों के रखरखाव से लेकर मलेशिया के साथ कई रक्षा सहयोग परियोजनाएं चल रही हैं। कुआलालंपुर भारत को पुराने मिग-29 विमान बेचना चाहता है। यह सौदा भी खटाई में पड़ सकता है। हालांकि द्विपक्षीय रिश्तों के कुछ सकारात्मक पहलू भी हैं। मलेशिया की कुल आबादी में आठ प्रतिशत हिस्सेदारी भारतीय मूल के लोगों की है। उन्हें मलेशिया के तमाम क्षेत्रों में बराबरी का दर्जा हासिल है।

तुर्की पाकिस्तान का पुराना और वफादार दोस्त है

महातिर की तर्ज पर तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने संयुक्त राष्ट्र संबोधन में कहा था कि ‘आठ लाख कश्मीरियों को एक तरह से कैद रखना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।’ इस मुद्दे को तवज्जो न देने के लिए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी खूब खरीखोटी सुनाई। तुर्की पाकिस्तान का पुराना और वफादार दोस्त है। वह पाक के गठन के बाद उसे मान्यता देने वाले शुरुआती देशों में से एक था। पाक को संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता दिलाने में भी तुर्की ने पूरा सहयोग किया। दोनों देश शीत युद्ध के समय सेंट्रल ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन यानी सेंटो वाले पश्चिमी गठजोड़ के सदस्य थे। 1955 में इसकी स्थापना ईरान, इराक, तुर्की, पाकिस्तान और ब्रिटेन द्वारा की गई थी और 1979 में इसे भंग कर दिया गया। तुर्की ने 1965 और 1971 के युद्ध में पाकिस्तान को अपने विमान और अन्य रक्षा साजोसामान की मदद मुहैया कराई थी। उसने हमेशा पाकिस्तान के उस रुख का समर्थन किया है जिसमें पाक संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में जनमत संग्र्रह कराने पर जोर देता आया है। नवंबर 2016 में पाकिस्तान दौरे में वहां की संसद को संबोधित करते हुए एर्दोगन ने यही दोहराया था। तुर्की एनएसजी में पाक को शामिल कराने का समर्थक रहा है।

कश्मीर पर एर्दोगन का बयान

कश्मीर पर एर्दोगन का बयान चीन में प्रताड़ना केंद्रों में रखे गए दस लाख से अधिक उइगर मुसलमानों पर साधी गई चुप्पी के एकदम उलट है। जबकि बीते एक साल तक वह इस मुद्दे को पूरी सहानुभूति के साथ उठाते थे। तुर्की इकलौता मुस्लिम-बहुसंख्यक आबादी वाला देश है जिसका उइगर-तुर्किश नस्लीय समूह से सीधा ताल्लुक है।

मानवाधिकारों के मसले पर तुर्की का रिकॉर्ड बेहद खराब

मानवाधिकारों के मसले पर तुर्की का अपना रिकॉर्ड भी बेहद खराब है। तुर्की की 20 फीसद आबादी कुर्दों की है जिनका बीती दो सदियों से दमन किया जा रहा है। कुर्दिश भाषा, संस्कृति, गाने, संगीत और यहां तक कि कुर्दिश नाम भी प्रतिबंधित हैं। उन्हें अल्पसंख्यकों का दर्जा तक नहीं मिला और उन्हें कुर्दिश पहाड़ी लोग कहा जाता है। कश्मीर को लेकर एर्दोगन की टिप्पणियों के बाद संयुक्त राष्ट्र में मोदी ने ग्र्रीस, साइप्रस और आर्मेनिया जैसे तुर्की के प्रतिद्वंद्वी देशों के प्रमुखों के साथ बैठक की थी। ये बैठकें तुर्की को यह सख्त संदेश देने के लिए ही की गईं कि वैचारिक मुद्दों के बजाय वास्तविक मसले ही कूटनीतिक दिशा तय करते हैं।

मुस्लिम जगत के रहनुमा बनने की कोशिश

महातिर मोहम्मद, एर्दोगन और इमरान खान मुस्लिम जगत के रहनुमा बनने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने दुनिया में बढ़ते इस्लामोफोबिया को दूर करने के लिए साझा पहल पर सहमति जताई है, लेकिन किसी ने भी चीन में उइगर मुसलमानों के उत्पीड़न पर कुछ नहीं कहा। भारत जहां तीन ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था वाला बड़ा देश है जबकि पाकिस्तान, मलेशिया और तुर्की की अर्थव्यवस्थाएं मिलाकर भी एक ट्रिलियन डॉलर की नहीं हैं। जब छोटे-मोटे देश दोस्ताना रिश्तों का गलत फायदा उठाने लगें तो नई दिल्ली को भी उन पर अपना शिकंजा निश्चित रूप से कसना चाहिए।

पाक की चीन पर हद से ज्यादा निर्भरता

चीन के लिए अपने आर्थिक साम्राज्यवादी एजेंडे को सिरे चढ़ाने में पाकिस्तान बहुत उपयोगी है। इस कड़ी में शी चिनफिंग की महत्वाकांक्षी बीआरआइ परियोजना के लिए चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा किसी जीवनरेखा से कम नहीं। पाक की चीन पर हद से ज्यादा निर्भरता शी के सपने को साकार करने में सहायक बनी है। बीजिंग के लिए पाकिस्तानी आतंक भारत के खिलाफ एक बड़ा हथियार है। इमरान के हालिया बीजिंग दौरे में कश्मीर पर शी की आश्वस्ति से यह एक बार फिर पुष्ट हुआ। चीन को यह याद दिलाना होगा कि शीशे के घर में बैठकर वह भारत पर पत्थर नहीं फेंक सकता। भारत को इस पर भी ध्यान देना होगा कि चीन, तुर्की और मलेशिया जैसे परंपरागत दोस्तों की मेहरबानी से ही पाक एफएटीएफ की काली सूची में जाने से बच रहा है।

( लेखक सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी हैं )

Posted By: Bhupendra Singh

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