विमल मिश्र। India-Nepal News सोसायटी में आते और जाते समय रोज सलाम ठोकने वाला खुशमिजाज चौकीदार जीतबहादुर गुरुंग इन दिनों चुप सा है। किसी अव्यक्त सी पीड़ा से गुजरता हुआ। अपनी हंसमुख टीका-टिप्पणी और भोले कौतूहल से गुदगुदा देने वाले इस शख्स के दिल की जुबान हैं उसकी उदास आंखें जो मानों यह पूछ रहीं हैं, शाब जी, ये क्या हो रहा है?

नेपाली नागरिकता की नई मियाद: दरअसल जीतबहादुर गुरुंग देश भर में फैले उन लगभग 60 लाख नेपाली नागरिकों में से है, जो भारत में रहते और काम करते हैं तथा जिनके मन में ना तो कभी अपनी जन्मभूमि और कर्मभूमि में अंतर समझ में आया, ना कभी भारतभूमि छोड़ने का विचार आया। नेपाली प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के भारत व हिंदीद्वेषी बयानों और वहां राजनीतिक उठा-पटक, भूमि-विवाद को लेकर नेपाली संसद में संविधान संशोधन, सीमा पर झड़प, आशंकाओं के कोहरे में हेलिपैड व रास्तों का निर्माण, पिथौरागढ़ में काली नदी का पुल बंद किए जाने, भारतीय बहुओं के लिए नेपाली नागरिकता की नई मियाद तय करने और सबसे ताजा नेपाल द्वारा चीन को अपनी जमीन भेंट करने जैसी खबरें उन्हें अपने भविष्य के लिए जितना चिंतित करती हैं, उससे कहीं अधिक उन्हें दोनों देशों के आपसी ऐतिहासिक रिश्तों की दास्तान संबंधों को बांधे रखने का काम करती है। इस आश्वस्ति की वजह केवल खुली सीमा और पासपोर्ट-वीजा की बाध्यता न होना ही नहीं, बल्कि कॉमन हिंदू धर्म भी है। सिर्फ हिंदू धर्म ही नहीं, बौद्ध भी। भारत जिस बौद्ध धर्म की जन्मभूमि है, उसके प्रवर्तक बुद्ध का जन्मस्थान लुम्बिनी जहां नेपाल में है, वहीं उनका निर्वाण-स्थल भारत स्थित कुशीनगर में।

लेकिन भारत-नेपाल संबंधों का मौजूदा घटनाक्रम भारत में बसे गोरखाओं को डरा रहा है। करीब दो वर्ष पहले मधेसी आंदोलन पर भारत और नेपाल के बीच गतिरोध की खबरों को लेकर उनमें तनाव की जो स्थिति पैदा हुई थी, वह दोबारा लौट आई है। मुंबई महानगर में ही पचास हजार से अधिक नेपाली गोरखाओं का घर है। शायद देश में किसी भी और शहर से ज्यादा। इनमें से ज्यादातर वॉचमैन और कुक जैसे कामों में लगे हुए हैं। ये गोरखे कोंकण में रायगड, रत्नागिरी और सिंधुदुर्ग के ग्राम्य अंचल तक फैले हुए हैं।

मुंबई के गोरखा अधिक शिक्षित: महाराष्ट्र के तमाम शहरों में तीन से चार लाख तक नेपाली गोरखा हैं। मुंबई के गोरखा अधिक शिक्षित हैं और बेहतर काम-धंधों में हैं। इनमें कई मध्य और उच्च वर्ग से ताल्लुक रखते हैं। गोपीकृष्ण, सितारा देवी, रणजीत बारोट, विनोद प्रधान, सुषमा श्रेष्ठ (नृत्य, संगीत, फिल्म) जीतू राय, शिव थापा व सुनील छेत्री (शूटर, बॉक्सर और फुटबॉलर) लक्ष्मण श्रेष्ठ (कला) जैसे नामचीन भी हैं। रक्षा क्षेत्र, सिक्योरिटी एजेंसीज और होटल उद्योग में शेफ, कुक व वेटर्स के रूप में बहुतायत के बाद यह समुदाय अब व्यापार और उद्योग क्षेत्र में भी पहचान बनाने की कोशिश कर रहा है। आप नेपाली युवाओं को डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक व अन्य उच्च पदों पर भी आसीन देख सकते हैं। मैं ऐसे कई नेपालियों को जानता हूं जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में संघर्ष और जीवट से अपना मुकाम बनाया है।

जरूरत पूर्वाग्रह मिटाने की : पूर्वाग्रहों ने हमारे मन में छवि बना रखी है कि अगर कोई गोरखा है तो जरूर वॉचमैन, वेटर या मेहनत-मजदूरी के छोटे-मोटे काम करने वाला होगा। हम गोरखाओं की सबसे बड़ी विशेषता को भूल जाते हैं, जो है उनकी निडरता, कर्मठता, स्वामीभक्ति और ईमानदारी। देशसेवा और राष्ट्रभक्ति में गोरखाओं का योगदान किसी अन्य समाज से कम नहीं है। हम भूल जाते हैं कि देश की सशस्त्र सेनाओं के सबसे बहादुर सैनिकों में गोरखाओं की गणना होती है। फिर क्यों ऐसा है कि नेपाली गोरखे घर, पड़ोस और ऑफिस में अपनी पहचान छिपाते फिरते हैं? अब तो खैर, सुधार है, पर एक वक्त ऐसा रहा है कि समुदाय के लोग सरेआम नेपाली बोलने और खुलकर अपने उत्सव मनाने में भी हिचका करते थे कि कहीं कोई जान न जाए। ऐसे मलाल कई हैं।

भारतीय गोरखा एकता संघ के ज्वाइंट सेक्रेटरी रोहित प्रधान कहते हैं, कई बार तो हमें चाइनीज कहकर पुकारा जाता है। एक और मुद्दा है मुंबई व अन्य शहरों के के रेड लाइट इलाकों में दारुण गरीबी, शोषण और यौन रोगों से जूझती हजारों नेपाली लड़कियों का। जहां तक नागरिकता का मुद्दा है, भारत में बसे गोरखाओं की चिंताएं समय-समय पर जारी सरकारी घोषणाओं से अब दूर हो जानी चाहिए। मसलन असम समेत कई राज्यों में कुछ मुद्दों को लेकर उनकी भारतीय नागरिकता पर उठे सवालों के बीच उनके मामले विदेशी ट्रिब्यूनलों के हवाले कर दिए जाने पर केंद्रीय गृह मंत्रालय का यह बयान कि अगर कोई गोरखा भारत में रह रहा है और उसके पास अपनी नेपाली नागरिकता सिद्ध करने के लिए मान्य दस्तावेज हैं तो उसे अवैध प्रवासी नहीं माना जाएगा। दरअसल यह 1950 की मैत्री और शांति संधि से ही चला आ रहा है जिसके तहत नेपाली नागरिकों को भारतीय नागरिकों के बराबर सुविधाओं का लाभ हासिल है।

अटूट रिश्ते की डोर : मौजूदा विवाद गंभीर होता जा रहा है। इस संबंध में कोई भी कदम उठाने से पहले हमें सोचना चाहिए कि क्षेत्रीय राष्ट्रवाद पर जिस तरह दोनों तरफ से अटपटी बयानबाजी हो रही है, क्या वह दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों के लिए माकूल है? सदियों से चले आ रहे भौगोलिक, धार्मिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संबंधों के कारण नेपाल हमारी विदेश नीति के लिहाज से विशेष महत्व रखता है। दोनों देशों के मध्य बिगड़े संबंध अवैध प्रवासी, जाली मुद्रा, ड्रग और मानव तस्करी जैसे खतरों के लिहाज से भी सिर-दर्द बन सकते हैं। भारत में रह रहे गोरखाओं को इसका अहसास है।

[स्वतंत्र टिप्पणीकार]

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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