[ रुचि सिंह ]: नेपाल में सरकार का बनना और गिरना एक खेल सा बन चुका है। यह खेल एक अर्से से चल रहा है और कहना कठिन है कि कब तक चलता रहेगा। पिछले चुनाव में केपी शर्मा ओली की पार्टी-नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले) को 80 सीटें मिली थीं और पुष्प कमल दहल प्रचंड की पार्टी-नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) को 36 सीटें। मिलकर चुनाव लड़ने के बाद सरकार बनाने के लिए दोनों ने अपनी-अपनी पार्टी का विलय कर एक नई पार्टी बनाई, लेकिन प्रचंड आरंभ से ही ओली के कार्यों से खुश नहीं रहे।

पूर्व प्रधानमंत्री प्रचंड चाहते हैं कि ओली जनसंवाद रखें और मिलकर फैसले लें

पूर्व प्रधानमंत्री प्रचंड चाहते हैं कि ओली जनसंवाद रखें और मिलकर फैसले लें, लेकिन ओली अपने ही हिसाब से चलना पसंद करते हैं। इसके चलते ही उनके खिलाफ असंतोष बढ़ता जा रहा है। गत दिनों जब ओली ने भारत पर आरोप लगाया कि वह उन्हें प्रधानमंत्री पद से हटाने की साजिश रच रहा है तो वह एक तरह से अपनी ही पार्टी के नेताओं को कठघरे में खड़ा कर रहे थे। हैरानी नहीं कि उनके इस आरोप के बाद नेपाल की राजनीति में तूफान उठ खड़ा हुआ। इस तूफान से ओली की कुर्सी डगमगा रही है।

प्रधानमंत्री ओली इस्तीफा देने के मूड में नहीं

नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के ज्यादातर सदस्य प्रधानमंत्री ओली से इस्तीफे की मांग कर रहे हैं, लेकिन ओली फिलहाल इस्तीफा देने के मूड में नहीं हैं। वह अपनी कुर्सी बचाने के लिए हर तरह के दांव चल रहे हैं। हालांकि ओली अपनी कुर्सी बचाने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं, लेकिन लगता नहीं कि उनसे नाराज पुष्प कमल दहल, माधव नेपाल और अन्य वरिष्ठ नेता अपना रुख नरम करने वाले हैं। मौजूदा हालात यही बयान कर रहे हैं कि कम्युनिस्ट पार्टी में टूट लगभग तय है।

सत्ताधारी पार्टी की स्टैंडिंग कमेटी पीएम ओली के खिलाफ

ओली राजनीतिक रूप से इसलिए कमजोर दिख रहे हैं, क्योंकि सत्ताधारी पार्टी की स्टैंडिंग कमेटी के अधिकांश सदस्य उनके खिलाफ हो गए हैं। इस कमेटी के साथ ही सेंट्रल कमेटी में भी ओली का समर्थन घट गया है। प्रधानमंत्री ओली इस कोशिश में हैं कि यदि उनकी पार्टी टूट भी जाए तो वह अन्य दलों से मिलकर अपनी सरकार बना लें। ओली को लगता है कि उनकी सरकार को बचाने में चीन भी उनकी मदद करेगा।

नेपाल में चीन का दखल बढ़ा

ध्यान रहे हाल के समय में नेपाल में चीन का दखल बढ़ा है। चीनी राजदूत नेपाल के आंतरिक मामलों को सुलटाने के लिए सक्रिय रही हैं। ओली नेपाली जनता के बीच भी ऐसे आरोपों का सामना कर रहे हैं कि वह सत्ता के लालच में चीन की गोद में जाकर बैठ गए हैं। वह भारत से तो सीमा विवाद को लेकर तल्ख हैं, लेकिन चीन से सीमा विवाद के मामले में मौन साधे हुए हैं।

नेपाली जनता के बीच ओली की लोकप्रियता तेजी के साथ घटती जा रही

ओली नेपाल के हितों की चाहे जितनी दुहाई दें, सच यह है कि नेपाली जनता के बीच उनकी लोकप्रियता तेजी के साथ घटती जा रही है। नेपाली लोगों की नजर में ओली देश हित की अनदेखी कर हर हाल में सत्ता सुख भोगना चाहते हैं। उनकी सरकार की नाकामी से नाराज लोग लगातार सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन ओली ऐसा दिखा रहे हैं जैसे उन पर इस सबका का को कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। अन्य देशों की तरह नेपाल भी कोरोना महामारी से जूझ रहा है, लेकिन सरकार लोगों के उपचार की पर्याप्त व्यवस्था नहीं कर पा रही है। इससे भी लोग ओली सरकार से खफा हैं।

ओली ने एक साथ कई मोर्चे खोलकर अपने लिए मुसीबत खड़ी कर ली

वास्तव में ओली ने एक साथ कई मोर्चे खोलकर अपने लिए मुसीबत खड़ी कर ली है। एक तो उन्होंने भारत से सीमा विवाद को तूल दे दिया और फिर अपनी मनमानी से अपने लोगों को भी नाराज कर दिया। उनकी सरकार ने नेपाल का नया नक्शा जारी करके भारत को घेरने की जो कोशिश की उसे लेकर यही संदेश उभरा कि यह काम चीन के इशारे पर किया गया।

ओली कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा पर दावा कर रहे हैं, सुबूत के लिए समिति गठित

ओली एक ओर कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा पर दावा कर रहे हैं और दूसरी ओर उन्होंने इस दावे के लिए सुबूत जमा करने के लिए नौ सदस्यों की एक समिति भी गठित कर दी है। सवाल उठ रहा है कि जब नेपाल इन क्षेत्रों पर अपना दावा कर रहा है तो फिर सुबूत तलाशने की क्या जरूरत आ गई? नेपाल के राजनीतिक विश्लेषक भी ओली सरकार के इस रवैये का विरोध कर रहे हैं। वे इस मसले को कूटनीति के जरिये हल करना चाहते हैं, लेकिन ओली इसके खिलाफ हैं।

नेपाली संसद में हिंदी को प्रतिबंधित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाना नेपाल की जनता को रास नहीं आया

नेपाली संसद में हिंदी को प्रतिबंधित करने के लिए नेकपा-एमाले का सुप्रीम कोर्ट जाना भी नेपाल की तमाम जनता को रास नहीं आया है। नेपाल का मधेशी समुदाय यह मानता है कि यह भारत से दूरी बढ़ाने वाला एक और कदम है और इसके पीछे भी ओली की शह है। सबसे खराब बात यह हुई कि ओली सरकार मधेशियों को फिर से दोयम दर्जे का नागरिक बनाने की कोशिश करती दिख रही है।

ओली सरकार नागरिकता कानून में  फेरबदल करने की कोशिश में

नेपाल में 15 साल पहले मधेशियों के आंदोलन के फलस्वरूप जो नागरिकता संबंधी कानून बना था और जिसे सभी पार्टियों ने मिलकर बनाया था, ओली सरकार उसमें फेरबदल करने की कोशिश में है। ओली सरकार चाहती है कि यदि कोई विदेशी महिला वह चाहे भारत की हो या अन्य देश की, किसी नेपाली नागरिक से विवाह करती है तो उसे नागरिकता सात वर्ष बाद दी जाएगी। यह एक तरह से मधेशियों का अपमान है। पहले नागरिकता मात्र छह महीने में मिल जाती थी।

ओली और प्रचंड के बीच बढ़ी दूरियां, ओली की कुर्सी बचना कठिन

ओली और प्रचंड के बीच दूरियां इस कदर बढ़ गई हैं कि प्रचंड समर्थकों को यह लगने लगा है कि ओली उनके नेता पर भष्टाचार का आरोप लगाकर उन्हें जेल भिजवा सकते हैं। चूंकि ओली के समर्थक कम होते जा रहे हैं इसलिए उनकी कुर्सी बचना कठिन है। समस्या यह है कि ओली के हटने के बाद भी नेपाल के राजनीतिक हालात में सुधार के आसार कम हैं। फिलहाल जनता पशुपतिनाथ की ओर इस आस से निहार रही है कि वही देश की नैया पार लगाएं।

( लेखिका नेपाल की जनता समाजवादी पार्टी की प्रचार प्रमुख हैं )

Posted By: Bhupendra Singh

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