[ विवेक काटजू ]: वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी पर चीन की आक्रामकता जारी है। वह हांगकांग, ताइवान से लेकर दक्षिण चीन सागर में भी बदनीयती दिखाता रहा है। यह अच्छी बात है कि मौजूदा गतिरोध पर भारत और चीन सैन्य और कूटनीतिक दोनों मोर्चों पर वार्ता कर रहे हैं, लेकिन यह ध्यान रहे कि हालिया तनाव चीन की करतूतों का ही परिणाम है। समूचे दक्षिण एशिया में चीनी आक्रामकता की धमक सुनी जा सकती है। चूंकि अमेरिका अफगानिस्तान में अपना दायरा घटा रहा है ऐसे में भारत के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है कि वह वहां लगातार बढ़ते चीनी हितों की थाह ले। पाकिस्तान तो पहले से ही वहां बहुत दखल देता आया है। ऐसे में भविष्य को देखते हुए भारत को अपनी अफगान नीति तैयार कर लेनी चाहिए।

अमेरिका-तालिबान समझौता लागू होने पर निर्भर करेगा ट्रंप की अफगान नीति कितनी सफल

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप यह दर्शाने के लिए प्रतिबद्ध हैं कि उनकी अफगान नीति एकदम सफल है। यह बहुत हद तक इस पर निर्भर करेगा कि अमेरिका और तालिबान के बीच हुआ समझौता किस तरह परवान चढ़ पाता है। इस समझौते में अमेरिकी सैनिकों की वापसी का प्रावधान है जिन्हें ट्रंप नवंबर में राष्ट्रपति चुनाव से पहले स्वदेश बुलाना चाहते हैं।

समझौते को मूर्त रूप देने में अफगान राष्ट्रपति को मनाना ट्रंप के लिए आसान नहीं होगा 

इस समझौते को मूर्त रूप देने में अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी को मनाना ट्रंप के लिए आसान नहीं होगा, क्योंकि तालिबान अफगान सुरक्षा बलों को निशाना बनाने से बाज नहीं आ रहा और गनी भी तालिबान कैदियों की रिहाई में ढिलाई कर रहे हैं। साथ ही अफगानिस्तान में राजनीतिक बिरादरी के साथ वार्ता भी शुरू नहीं हो सकी, क्योंकि पिछले साल हुए राष्ट्रपति चुनावों के नतीजे विवादों में घिर गए। अफगान चुनाव आयोग ने अशरफ गनी को विजयी बताया, लेकिन उनके प्रतिद्वंद्वी डॉ. अब्दुल्ला ने नतीजों को नकार कर खुद को राष्ट्रपति घोषित कर दिया। अमेरिका ने दोनों पर मतभेद दूर करने के लिए दबाव डाला।

नई सहमति के अनुसार गनी राष्ट्रपति बने रहेंगे वहीं कैबिनेट में आधे पद अब्दुल्ला समर्थकों को मिलेंगे

नई सहमति के अनुसार अब गनी राष्ट्रपति बने रहेंगे वहीं कैबिनेट में आधे पद अब्दुल्ला समर्थकों को मिलेंगे। तालिबान के साथ वार्ता की कमान भी अब्दुल्ला संभालेंगे। तालिबान ने ईद तक के लिए जो संघर्षविराम घोषित किया उसने वार्ता के लिए सही माहौल बनाया।

बातचीत शुरू भी होती है तो शांति और स्थायित्व की गारंटी नहीं

यदि बातचीत शुरू भी होती है तो यह शांति और स्थायित्व की गारंटी नहीं होगी। अफगानिस्तान कई वर्षों से उथलपुथल का शिकार है। पाक लगातार उसके आंतरिक मामलों में दखल देता रहा है। आतंकवाद और चरमपंथी इस्लामिक विचारधारा ने अफगान समाज के कुछ वर्गों में पैठ बना ली है। चीन भी वहां अपना प्रभाव जमाने की कोशिश में है। तालिबान के सफाये के साथ यह उम्मीद जताई गई थी कि 2003 में अपनाए गए नए संविधान के तहत अफगानिस्तान शांति एवं स्थायित्व से लैस इस्लामिक गणराज्य बनेगा। ऐसा संभव नहीं हो सका, क्योंकि अमेरिका अफगानिस्तान से बचकर पाकिस्तान में शरण लेने वाले तालिबान का फन कुचलने का इच्छुक नहीं दिखा। तालिबान को पाक में न केवल पनाह मिली, बल्कि इस दौरान नई शक्ति हासिल करके उसने अफगानिस्तान में अमेरिकी और अफगान सरकार के खिलाफ नए सिरे से मोर्चा खोला। इस प्रकार तालिबान के साथ हुआ समझौता जितना अमेरिका की रणनीतिक नाकामी को दर्शाता है उतना ही तालिबान की कामयाबी को।

पाक और अल कायदा की मदद से तालिबान ने  अफगानिस्तान के 90 प्रतिशत हिस्से को कब्जा लिया

अफगान परिदृश्य में तालिबान का उभार 1994 में हुआ था। उसे पाक की पूरी शह मिली हुई थी। पाक और अल कायदा की मदद से अगले पांच वर्षों में उसने अफगानिस्तान के 90 प्रतिशत हिस्से को कब्जा लिया। तब ईरान और रूस के साथ मिलकर भारत ने उसका पुरजोर विरोध किया। उसने तालिबान विरोधी समूहों के नेता अहमद शाह मसूद को समर्थन दिया। शेष विश्व ने भी तब तालिबान को तवज्जो नहीं दी। केवल पाकिस्तान, सऊदी अरब और यूएई से ही उसे मान्यता मिली। उस समय भारत ने वैश्विक रुझान के अनुसार अफगानिस्तान को लेकर एकदम दुरुस्त और कामयाब रणनीति अपनाई।

कूटनीतिक समीकरणों के बदलने से देशों ने नई रणनीति अपनाई

आज दुनिया के तमाम देशों ने 1990 के दशक की तुलना में अपनी अफगान नीति की दिशा पूरी तरह बदल दी है। हिंसक और कट्टर इस्लामिक सोच के बावजूद तालिबान को आज कूटनीतिक मान्यता मिल रही है। अमेरिका-तालिबान समझौता इस परिवर्तन का सबसे बड़ा प्रमाण है। पहले विरोधी रहे ईरान और रूस भी उसके साथ हो लिए हैं। दरअसल कूटनीतिक समीकरणों के बदलने से देशों ने उसी के मुताबिक नई रणनीति अपनाई है। बदलाव न करने का खामियाजा भी भुगता है।

भारत का तालिबान के साथ कोई सीधा संपर्क नहीं है

भारत का तालिबान के साथ कोई सीधा संपर्क नहीं है। उधर तालिबान भारत को परोक्ष रूप से संदेश देता आया है कि वह उसे पाकिस्तान के हाथों की कठपुतली न समझे। तालिबान से भारत की नाराजगी समझ आती है, क्योंकि हक्कानी नेटवर्क जैसे उसके धड़ों ने पाकिस्तान की शह पर भारतीय हितों को नुकसान पहुंचाया। वैसे किसी पहलू को लेकर कुपित बने रहने से हितों को सुरक्षित नहीं रखा जा सकता और विदेश नीति का तो सबका ही हितों की रक्षा और उनकी पूर्ति से है। 

भारत को तालिबान से वार्ता का सुझाव दिया गया

सात हफ्ते पहले संयुक्त राष्ट्र सचिवालय द्वारा अफगान मसले पर बुलाई बैठक में चीन, अमेरिका, रूस और अफगान सरकार को आमंत्रित किया गया। बीते 18 वर्षों से अफगानिस्तान में भारी मदद के बावजूद भारत को इसमें नहीं बुलाया गया। एक अमेरिकी राजनयिक ने कहा कि अफगानिस्तान के भविष्य को लेकर भारत को इसलिए नहीं शामिल किया गया, क्योंकि वह सभी अफगान पक्षों के साथ नहीं जुड़ सका है। वहां सार्वजनिक रूप से भारत को तालिबान से वार्ता का सुझाव दिया गया।

तालिबान से वार्ता का फैसला भारत को किसी के निर्देश पर नहीं करना चाहिए

तालिबान से वार्ता का फैसला भारत को किसी के निर्देश के बजाय स्वयं ही करना चाहिए। मेरी राय में भारत को विकल्प खोलने चाहिए, क्योंकि अफगानिस्तान अब अफगान से इतर पक्षों के साथ वार्ता के नए दौर में दाखिल हो रहा है और इसमें तालिबान सबसे अहम पक्ष है। ऐसे में यदि भारत उससे संपर्क नहीं करेगा तो अपने कूटनीतिक विकल्पों को सीमित कर देगा।

भारत चीन के इरादों को भांपकर अफगानिस्तान में कूटनीतिक सक्रियता दिखाए

बातचीत का अर्थ यह भी नहीं कि इससे तालिबानी विचारधारा या पाक से उसकी नजदीकी को भी स्वीकृति मिल जाएगी। इसका यह अर्थ नहीं कि इस दुरभिसंधि को लेकर भारत की चिंताएं भी दूर हो जाएंगी। इससे अफगान सरकार और अन्य अफगान पक्षों को लेकर समर्थन की डोर भी कमजोर नहीं पड़ेगी। यह समय की मांग है कि भारत चीन के इरादों को सही तरह से भांपने के साथ ही अफगानिस्तान में वहां के सभी पक्षों के साथ कूटनीतिक सक्रियता दिखाए।

( लेखक विदेश मंत्रालय में सचिव रहे हैं )

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